भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 171

आश्रमं तस्य रक्षोऽथ पुलोमाभ्याजगाम ह ।। १५ ।। भृगुवंशशिरोमणे! पुलोमा यशस्वी भृगुकी अनुकूल शील-स्वभाववाली धर्मपत्नी थी। उसकी कुक्षिमें उस गर्भके प्रकट होनेपर एक समय धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भृगुजी स्नान करनेके लिये आश्रमसे बाहर निकले। उस समय एक राक्षस, जिसका नाम भी पुलोमा ही था, उनके आश्रमपर आया ।। १४-१५ ।।

तं प्रविश्याश्रमं दृष्ट्वा भृगोर्भार्यामनिन्दिताम् । हृच्छयेन समाविष्टो विचेताः समपद्यत ।। १६ ।। आश्रममें प्रवेश करते ही उसकी दृष्टि महर्षि भृगुकी पतिव्रता पत्नीपर पड़ी और वह कामदेवके वशीभूत हो अपनी सुध-बुध खो बैठा ।। १६ ।।

अभ्यागतं तु तद्रक्षः पुलोमा चारुदर्शना । न्यमन्त्रयत वन्येन फलमूलादिना तदा ।। १७ ।। सुन्दरी पुलोमाने उस राक्षसको अभ्यागत अतिथि मानकर वनके फल-मूल आदिसे उसका सत्कार करनेके लिये उसे न्योता दिया ।। १७ ।।

तां तु रक्षस्तदा ब्रह्मन् हृच्छयेनाभिपीडितम् । दृष्ट्वा हृष्टमभूद् राजन् जिहीर्षुस्तामनिन्दिताम् ।। १८ ।। ब्रह्मन्! वह राक्षस कामसे पीड़ित हो रहा था। उस समय उसने वहाँ पुलोमाको अकेली देख बड़े हर्षका अनुभव किया, क्योंकि वह सती-साध्वी पुलोमाको हर ले जाना चाहता था ।। १८ ।।

जातमित्यब्रवीत् कार्यं जिहीर्षुर्मुदितः शुभाम् । सा हि पूर्वं वृता तेन पुलोम्ना तु शुचिस्मिता ।। १९ ।। मनमें उस शुभलक्षणा सतीके अपहरणकी इच्छा रखकर वह प्रसन्नतासे फूल उठा और मन-ही-मन बोला, 'मेरा तो काम बन गया।' पवित्र मुसकानवाली पुलोमाको पहले उस पुलोमा नामक राक्षसने वरण-* किया था ।। १९ ।।

तां तु प्रादात् पिता पश्चाद् भृगवे शास्त्रवत्तदा । तस्य तत् किल्बिषं नित्यं हृदि वर्तति भार्गव ।। २० ।। किंतु पीछे उसके पिताने शास्त्रविधिके अनुसार महर्षि भृगुके साथ उसका विवाह कर दिया। भृगुनन्दन! उसके पिताका वह अपराध राक्षसके हृदयमें सदा काँटे-सा कसकता रहता था ।। २० ।।

इदमन्तरमित्येवं हर्तुं चक्रे मनस्तदा । अथाग्निशरणेऽपश्यज्ज्वलन्तं जातवेदसम् ।। २१ ।। यही अच्छा मौका है, ऐसा विचारकर उसने उस समय पुलोमाको हर ले जानेका पक्का निश्चय कर लिया। इतनेहीमें राक्षसने देखा, अग्निहोत्र-गृहमें अग्निदेव प्रज्वलित हो रहे हैं ।। २१ ।।