भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 172

तमपृच्छत् ततो रक्षः पावकं ज्वलितं तदा । शंस मे कस्य भार्येयमग्ने पृच्छे ऋतेन वै ॥ २२ ॥ तब पुलोमाने उस समय उस प्रज्वलित पावकसे पूछा—'अग्निदेव! मैं सत्यकी शपथ देकर पूछता हूँ, बताओ, यह किसकी पत्नी है?' ॥ २२ ॥ मुखं त्वमसि देवानां वद पावक पृच्छते । मया हीयं वृता पूर्वं भार्यार्थे वरवर्णिनी ॥ २३ ॥ 'पावक! तुम देवताओंके मुख हो। अतः मेरे पूछनेपर ठीक-ठीक बताओ। पहले तो मैंने ही इस सुन्दरीको अपनी पत्नी बनानेके लिये वरण किया था ॥ २३ ॥ पश्चादिमां पिता प्रादाद् भृगवेऽनृतकारकः । सेयं यदि वरारोहा भृगोर्भार्या रहोगता ॥ २४ ॥ तथा सत्यं समाख्याहि जिहीर्षाम्याश्रमादिमाम् । स मन्युस्तत्र हृदयं प्रदहन्निव तिष्ठति । मत्पूर्वभार्या यदिमां भृगुराप सुमध्यमाम् ॥ २५ ॥ 'किंतु बादमें असत्य व्यवहार करनेवाले इसके पिताने भृगुके साथ इसका विवाह कर दिया। यदि यह एकान्तमें मिली हुई सुन्दरी भृगुकी भार्या है तो वैसी बात सच-सच बता दो; क्योंकि मैं इसे इस आश्रमसे हर ले जाना चाहता हूँ। वह क्रोध आज मेरे हृदयको दग्ध-सा कर रहा है; इस सुमध्यमाको, जो पहले मेरी भार्या थी, भृगुने अन्यायपूर्वक हड़प लिया है' ॥ २४-२५ ॥

सौतिरुवाच एवं रक्षस्तमामन्त्र्य ज्वलितं जातवेदसम् । शङ्कमानं भृगोर्भार्यां पुनः पुनरपृच्छत ॥ २६ ॥ उग्रश्रवाजी कहते हैं—इस प्रकार वह राक्षस भृगुकी पत्नीके प्रति, यह मेरी है या भृगुकी—ऐसा संशय रखते हुए, प्रज्वलित अग्निको सम्बोधित करके बार-बार पूछने लगा — ॥ २६ ॥ त्वमग्ने सर्वभूतानामन्तश्चरसि नित्यदा । साक्षिवत् पुण्यपापेषु सत्यं ब्रूहि कवे वचः ॥ २७ ॥ 'अग्निदेव! तुम सदा सब प्राणियोंके भीतर निवास करते हो। सर्वज्ञ अग्ने! तुम पुण्य और पापके विषयमें साक्षीकी भाँति स्थित रहते हो; अतः सच्ची बात बताओ ॥ २७ ॥ मत्पूर्वापहृता भार्या भृगुणानृतकारिणा । सेयं यदि तथा मे त्वं सत्यमाख्यातुमर्हसि ॥ २८ ॥ 'असत्य बर्ताव करनेवाले भृगुने, जो पहले मेरी ही थी, उस भार्याका अपहरण किया है। यदि यह वही है, तो वैसी बात ठीक-ठीक बता दो ॥ २८ ॥