महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1723, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंते तदाम्रं द्विधा कृत्वा भक्षयामासतुः शुभे । भावित्वादपि चार्थस्य सत्यवाक्यतया मुनेः ॥ ३३ ॥ तयोः समभवद् गर्भः फलप्राशनसम्भवः । ते च दृष्ट्वा स नृपतिः परां मुदमवाप ह ॥ ३४ ॥ उन दोनों शुभस्वरूपा रानियोंने उस आमके दो टुकड़े करके एक-एक टुकड़ा खा लिया। होनेवाली बात होकर ही रहती है, इसलिये तथा मुनिकी सत्यवादिताके प्रभावसे वह फल खानेके कारण दोनों रानियोंको गर्भ रह गये। उन्हें गर्भवती हुई देखकर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई ।। ३३-३४ ।।
अथ काले महाप्राज्ञ यथासमयमागते । प्रजायेतामुभे राजञ्शरीरशकले तदा ॥ ३५ ॥ महाप्राज्ञ युधिष्ठिर! प्रसवकाल पूर्ण होनेपर उन दोनों रानियोंने यथासमय अपने गर्भसे शरीरका एक-एक टुकड़ा पैदा किया ।। ३५ ।।
एकाक्षिबाहुचरणे अर्धोदरमुखस्फिचे । दृष्ट्वा शरीरशकले प्रवेपत्तुरुभे भृशम् ॥ ३६ ॥ प्रत्येक टुकड़ेमें एक आँख, एक हाथ, एक पैर, आधा पेट, आधा मुँह और कटिके नीचेका आधा भाग था। एक शरीरके उन टुकड़ोंको देखकर वे दोनों भयके मारे थर-थर काँपने लगीं ।। ३६ ।।
उद्विग्ने सह सम्मन्त्र्य ते भगिन्यौ तदाबले ।