भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1724, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1724

सजीवे प्राणिशकले तत्त्यजाते सुदुःखिते ॥ ३७ ॥
उनका हृदय उद्विग्न हो उठा; अबला ही तो थीं। उन दोनों बहिनोंने अत्यन्त दुःखी होकर परस्पर सलाह करके उन दोनों टुकड़ोंको, जिनमें जीव तथा प्राण विद्यमान थे, त्याग दिया ॥ ३७ ॥
तयोर्धात्र्यौ सुसंवीते कृत्वा ते गर्भसम्प्लवे ।
निर्गम्यन्तःपुरद्वारात् समुत्सृज्याभिजग्मतुः ॥ ३८ ॥
उन दोनोंकी धायें गर्भके उन टुकड़ोंको कपड़ेसे ढककर अन्तःपुरके दरवाजेसे बाहर निकलीं और चौराहेपर फेंककर चली गयीं ॥ ३८ ॥
ते चतुष्पथनिक्षिप्ते जरा नामाथ राक्षसी ।
जग्राह मनुजव्याघ्र मांसशोणितभोजना ॥ ३९ ॥
पुरुषसिंह! चौराहेपर फेंके हुए उन टुकड़ोंको रक्त और मांस खानेवाली जरा नामकी एक राक्षसीने उठा लिया ॥ ३९ ॥
कर्तुकामा सुखवहे शकले सा तु राक्षसी ।
संयोजयामास तदा विधानबलचोदिता ॥ ४० ॥
विधाताके विधानसे प्रेरित होकर उस राक्षसीने उन दोनों टुकड़ोंको सुविधापूर्वक ले जानेयोग्य बनानेकी इच्छासे उस समय जोड़ दिया ॥ ४० ॥
ते समानीतमात्रे तु शकले पुरुषर्षभ ।
एकमूर्तिधरो वीरः कुमारः समपद्यत ॥ ४१ ॥
नरश्रेष्ठ! उन टुकड़ोंका परस्पर संयोग होते ही एक शरीरधारी वीर कुमार बन गया ॥ ४१ ॥

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