महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1725, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंततः सा राक्षसी राजन् विस्मयोत्फुल्लोचना । न शशाक समुद्धोढुं वज्रसारमयं शिशुम् ॥ ४२ ॥ राजन्! यह देखकर राक्षसीके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। उसे वह शिशु वज्रके सारतत्त्वका बना जान पड़ा। राक्षसी उसे उठाकर ले जानेमें असमर्थ हो गयी ॥ ४२ ॥
बालस्ताम्रतलं मुष्टिं कृत्वा चास्ये निधाय सः । प्राक्रोशदतिसंरब्धः सतोय इव तोयदः ॥ ४३ ॥ उस बालकने अपने लाल हथेलीवाले हाथोंकी मुट्ठी बाँधकर मुँहमें डाल ली और अत्यन्त क्रुद्ध होकर जलसे भरे मेघकी भाँति गम्भीर स्वरसे रोना शुरू कर दिया ॥ ४३ ॥
तेन शब्देन सम्भ्रान्तः सहसान्तःपुरे जनः । निर्जगाम नरव्याघ्र राज्ञा सह परंतप ॥ ४४ ॥ परंतप नरव्याघ्र! बालकके उस रोने-चिल्लानेके शब्दसे रनिवासकी सब स्त्रियाँ घबरा उठीं तथा राजाके साथ सहसा बाहर निकलीं ॥ ४४ ॥
ते चाबले परिम्लाने पयःपूर्णपयोधरे । निराशे पुत्रलाभाय सहसैवाभ्यगच्छताम् ॥ ४५ ॥ दूधसे भरे हुए स्तनोंवाली वे दोनों अबला रानियाँ भी, जो पुत्रप्राप्तिकी आशा छोड़ चुकी थीं, मलिन मुख हो सहसा बाहर निकल आयीं ॥ ४५ ॥
अथ दृष्ट्वा तथाभूते राजानं चेष्टसंततिम् । तं च बालं सुबलिनं चिन्तयामास राक्षसी ॥ ४६ ॥ नार्हामि विषये राज्ञो वसन्ती पुत्रगृद्धिनः । बालं पुत्रमिमं हन्तुं धार्मिकस्य महात्मनः ॥ ४७ ॥ उन दोनों रानियोंको उस प्रकार उदास, राजाको संतान पानेके लिये उत्सुक तथा उस बालकको अत्यन्त बलवान् देखकर राक्षसीने सोचा, 'मैं इस राजाके राज्यमें रहती हूँ। यह पुत्रकी इच्छा रखता है; अतः इस धर्मात्मा तथा महात्मा नरेशके बालक पुत्रकी हत्या करना मेरे लिये उचित नहीं है' ॥ ४६-४७ ॥
सा तं बालमुपादाय मेघलेखेव भास्करम् । कृत्वा च मानुषं रूपमुवाच वसुधाधिपम् ॥ ४८ ॥ ऐसा विचारकर उस राक्षसीने मानवीका रूप धारण किया और जैसे मेघमाला सूर्यको धारण करे, उसी प्रकार वह उस बालकको गोदमें उठाकर भूपालसे बोली ॥ ४८ ॥
राक्षस्युवाच
बृहद्रथ सुतस्तेऽयं मया दत्तः प्रगृह्यताम् । तव पत्नीद्वये जातो द्विजातिवरशासनात् । धात्रीजनपरित्यक्तो मयायं परिरक्षितः ॥ ४९ ॥