भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1726

राक्षसीने कहा— बृहद्रथ! यह तुम्हारा पुत्र है, जिसे मैंने तुम्हें दिया है। तुम इसे ग्रहण करो। ब्रह्मर्षिके वरदान एवं आशीर्वादसे तुम्हारी पत्नियोंके गर्भसे इसका जन्म हुआ है। धायोंने इसे घरके बाहर लाकर डाल दिया था; किंतु मैंने इसकी रक्षा की है ।। ४९ ।।

श्रीकृष्ण उवाच

ततस्ते भरतश्रेष्ठ काशिराजसुते शुभे ।
तं बालमभिपद्याशु प्रस्रवैरभ्यषिञ्चताम् ।। ५० ।।
श्रीकृष्ण कहते हैं— भरतकुलभूषण! तब काशिराजकी उन दोनों शुभलक्षणा कन्याओंने उस बालकको तुरंत गोदमें लेकर उसे स्तनोंके दूधसे सींच दिया ।। ५० ।।

ततः स राजा संहृष्टः सर्वं तदुपलभ्य च ।
अपृच्छद्धेमगर्भाभां राक्षसीं तामराक्षसीम् ।। ५१ ।।
यह सब देख-सुनकर राजाके हर्षकी सीमा न रही। उन्होंने सुवर्णकी-सी कान्तिवाली उस राक्षसीसे, जो स्वरूप-से राक्षसी नहीं जान पड़ती थी, इस प्रकार पूछा ।। ५१ ।।

राजोवाच

का त्वं कमलगर्भाभे मम पुत्रप्रदायिनी ।
कामया ब्रूहि कल्याणि देवता प्रतिभासि मे ।। ५२ ।।
राजाने कहा— कमलके भीतरी भागके समान मनोहर कान्तिवाली कल्याणी! मुझे पुत्र प्रदान करनेवाली तुम कौन हो? बताओ। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम इच्छानुसार विचरनेवाली कोई देवी हो ।। ५२ ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरासंधोत्पत्तौ सप्तदशोऽध्यायः
।। १७ ।।

इस प्रकार श्रीमद्भारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें जरासंधकी उत्पत्तिविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ६१ १/३ श्लोक हैं)