महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1727, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः
जरा राक्षसीका अपना परिचय देना और उसीके नामपर बालकका नामकरण होना
राक्षस्युवाच जरा नामास्मि भद्रं ते राक्षसी कामरूपिणी । तव वेश्मनि राजेन्द्र पूजिता न्यवसं सुखम् ॥ १ ॥ राक्षसीने कहा—राजेन्द्र! तुम्हारा कल्याण हो। मेरा नाम जरा है। मैं इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली राक्षसी हूँ और तुम्हारे घरमें पूजित हो सुखपूर्वक रहती चली आयी हूँ॥ १ ॥ गृहे गृहे मनुष्याणां नित्यं तिष्ठामि राक्षसी । गृहदेवीति नाम्ना वै पुरा सृष्टा स्वयंभुवा ॥ २ ॥ मैं मनुष्योंके घर-घरमें सदा मौजूद रहती हूँ। कहनेको मैं राक्षसी ही हूँ; किंतु पूर्वकालमें ब्रह्माजीने गृहदेवीके नामसे मेरी सृष्टि की थी ॥ २ ॥ दानवानां विनाशाय स्थापिता दिव्यरूपिणी । यो मां भक्त्या लिखेत् कुड्ये सपुत्रां यौवनान्विताम् ॥ ३ ॥ गृहे तस्य भवेद् वृद्धिरन्यथा क्षयमाप्नुयात् । त्वद्गृहे तिष्ठमानाहं पूजिताहं सदा विभो ॥ ४ ॥ और उन्होंने मुझे दानवोंके विनाशके लिये नियुक्त किया था। मैं दिव्य रूप धारण करनेवाली हूँ। जो अपने घरकी दीवारपर मुझे अनेक पुत्रोंसहित युवती स्त्रीके रूपमें भक्तिपूर्वक लिखता है (मेरा चित्र अंकित करता है), उसके घरमें सदा वृद्धि होती है; अन्यथा उसे हानि उठानी पड़ती है। प्रभो! मैं तुम्हारे घरमें रहकर सदा पूजित होती चली आयी हूँ ॥ ३-४ ॥ लिखिता चैव कुड्येषु पुत्रैर्बहुभिरावृता । गन्धपुष्पैस्तथा धूपैर्भक्ष्यभोज्यैः सुपूजिता ॥ ५ ॥ एवं तुम्हारे घरकी दीवारोंपर मेरा ऐसा चित्र अंकित किया गया है, जिसमें मैं अनेक पुत्रोंसे घिरी हुई खड़ी हूँ। उस चित्रके रूपमें मेरा गन्ध, पुष्प, धूप और भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंद्वारा भलीभाँति पूजन होता आ रहा है ॥ ५ ॥ साहं प्रत्युपकारार्थं चिन्तयाम्यनिशं तव । तवेमे पुत्रशकले दृष्टवत्यस्मि धार्मिक ॥ ६ ॥ संश्लेषिते मया दैवात् कुमारः समपद्यत ।