भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1743

मागधानां सुरुचिरं चैत्यकं तं समाद्रवन् । शिरसीव समाघ्नन्तो जरासंधं जिघांसवः ॥ १९ ॥ इन तीनों वीरोंने उपर्युक्त तीनों नगाड़ोंको फोड़कर चैत्यक पर्वतके परकोटेपर आक्रमण किया। उन सबने अनेक प्रकारके आयुध लेकर द्वारके सामने मगध-निवासियोंके परम प्रिय उस चैत्यक पर्वतपर धावा किया था। जरासंधको मारनेकी इच्छा रखकर मानो वे उसके मस्तकपर आघात कर रहे थे ॥ १८-१९ ॥ स्थिरं सुविपुलं शृङ्गं सुमहत् तत् पुरातनम् । अर्चितं गन्धमाल्यैश्च सततं सुप्रतिष्ठितम् ॥ २० ॥ विपुलैर्बाहुभिर्वीरास्तेऽभिहत्याभ्यपातयन् । ततस्ते मागधं हृष्टाः पुरं प्रविविशुस्तदा ॥ २१ ॥ उस चैत्यकका विशाल शिखर बहुत पुराना, किंतु सुदृढ़ था। मगधदेशमें उसकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। गन्ध और पुष्पकी मालाओंसे उसकी सदा पूजा की जाती थी। श्रीकृष्ण आदि तीनों वीरोंने अपनी विशाल भुजाओंसे टक्कर मारकर उस चैत्यक पर्वतके शिखरको गिरा दिया। तदनन्तर वे अत्यन्त प्रसन्न होकर मगधकी राजधानी गिरिव्रजके भीतर घुसे ॥ २०-२१ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु ब्राह्मणा वेदपारगाः । दृष्ट्वा तु दुर्निमित्तानि जरासंधमदर्शयन् ॥ २२ ॥ इसी समय वेदोंके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणोंने अनेक अपशकुन देखकर राजा जरासंधको उनके विषयमें सूचित किया ॥ २२ ॥ पर्यग्न्यकुर्वंश्च नृपं द्विरदस्थं पुरोहिताः । ततस्तच्छान्तये राजा जरासंधः प्रतापवान् । दीक्षितो नियमस्थोऽसावुपवासपरोऽभवत् ॥ २३ ॥ पुरोहितोंने राजाको हाथीपर बिठाकर उसके चारों ओर प्रज्वलित आग घुमायी। प्रतापी राजा जरासंधने अनिष्टकी शान्तिके लिये व्रतकी दीक्षा ले नियमोंका पालन करते हुए उपवास किया ॥ २३ ॥ स्नातकव्रतिनस्ते तु बाहुशस्त्रा निरायुधाः । युयुत्सवः प्रविविशुर्जरासंधेन भारत ॥ २४ ॥ भारत! इधर भगवान् श्रीकृष्ण, भीमसेन और अर्जुन स्नातक-व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणोंके वेषमें अस्त्र-शस्त्रोंका परित्याग करके अपनी भुजाओंसे ही आयुधोंका काम लेते हुए जरासंधके साथ युद्ध करनेकी इच्छा रखकर नगरमें प्रविष्ट हुए ॥ २४ ॥ भक्ष्यमाल्यापणानां च ददृशुः श्रियमुत्तमाम् । स्फीतां सर्वगुणोपेतां सर्वकामसमृद्धिनीम् ॥ २५ ॥ तां तु दृष्ट्वा समृद्धिं ते वीथ्यां तस्यां नरोत्तमाः ।