महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजमार्गेण गच्छन्तः कृष्णभीमधनंजयाः । बलाद् गृहीत्वा माल्यानि मालाकारान्महाबलाः ॥ २६ ॥ उन्होंने खाने-पीनेकी वस्तुओं, फूल-मालाओं तथा अन्य आवश्यक पदार्थोंकी दूकानोंसे सजे हुए हाट-बाटकी अपूर्व शोभा और सम्पदा देखी। नगरका वह वैभव बहुत बढ़ा-चढ़ा, सर्वगुणसम्पन्न तथा समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला था। उस गलीकी अद्भुत समृद्धिको देखकर वे महाबली नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन एक मालीसे बलपूर्वक बहुत-सी मालाएँ लेकर नगरकी प्रधान सड़कसे चलने लगे ॥ २५-२६ ॥ विरागवसनाः सर्वे स्रग्विणो मृष्टकुण्डलाः । निवेशनमथाजग्मुर्जरासंधस्य धीमतः ॥ २७ ॥ उन सबके वस्त्र अनेक रंगके थे। उन्होंने गलेमें हार और कानोंमें चमकीले कुण्डल पहन रखे थे। वे क्रमशः बुद्धिमान् राजा जरासंधके महलके समीप जा पहुँचे ॥ २७ ॥ गोवासमिव वीक्षन्तः सिंहा हैमवता यथा । शालस्तम्भनिभास्तेषां चन्दनागुरुरूषिताः ॥ २८ ॥ अशोभन्त महाराज बाहवो युद्धशालिनाम् । जैसे हिमालयकी गुफाओंमें रहनेवाले सिंह गौओंका स्थान ढूँढ़ते हुए आगे बढ़ते हों, उसी प्रकार वे तीनों वीर राजभवनकी तलाश करते हुए वहाँ पहुँचे थे। महाराज! युद्धमें विशेष शोभा पानेवाले उन तीनों वीरोंकी भुजाएँ साखूके लट्ठे-जैसी सुशोभित हो रही थीं। उनपर चन्दन और अगुरुका लेप किया गया था ॥ २८ १/२ ॥ तान् दृष्ट्वा द्विरदप्रख्याञ्शालस्कन्धानिवोद्गतान् । व्यूढोरस्कान् मागधानां विस्मयः समपद्यत ॥ २९ ॥ शालवृक्षके तनेके समान ऊँचे डील और चौड़ी छातीवाले गजराजसदृश उन बलवान् वीरोंको देखकर मगधनिवासियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ २९ ॥ ते त्वतीत्य जनाकीर्णाः कक्षास्तिस्रो नरर्षभाः । अहंकारेण राजानमुपतस्थुर्गतव्यथाः ॥ ३० ॥ वे नरश्रेष्ठ लोगोंसे भरी हुई तीन ड्योढ़ियोंको पार करके निर्भय एवं निश्चिन्त हो बड़े अभिमानके साथ राजा जरासंधके निकट गये ॥ ३० ॥ तान् पाद्यमधुपर्कार्हान् गवार्हान् सत्कृतिं गतान् । प्रत्युत्थाय जरासंध उपतस्थे यथाविधि ॥ ३१ ॥ वे पाद्य, मधुपर्क और गोदान पानेके योग्य थे। उनका सर्वत्र सत्कार होता था। उन्हें आया देख जरासंध उठकर खड़ा हो गया और उसने विधिपूर्वक उनका आतिथ्य-सत्कार किया ॥ ३१ ॥ उवाच चैतान् राजासौ स्वागतं वोऽस्त्विति प्रभुः । मौनमासीत् तदा पार्थभीमयोर्जनमेजय ॥ ३२ ॥