महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1764, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वातिक्रान्तमर्यादं पृष्ठभङ्गं च चक्रतुः । सम्पूर्णमूर्च्छां बाहुभ्यां पूर्णकुम्भं प्रचक्रतुः ॥ १९ ॥
फिर वे सारी मर्यादाओंसे ऊँचे उठे हुए 'पृष्ठभंग' नामक दाँव-पेंचसे काम लेने लगे (अर्थात् एक-दूसरेकी पीठको धरतीसे लगा देनेकी चेष्टामें लग गये)। दोनों भुजाओंसे सम्पूर्ण मूर्च्छा (उदर आदिमें आघात करके मूर्च्छित करनेका प्रयत्न) तथा पूर्वोक्त पूर्णकुम्भका प्रयोग करने लगे ॥ १९ ॥
तृणपीडं यथाकामं पूर्णयोगं समुष्टिकम् । एवमादीनि युद्धानि प्रकुर्वन्तौ परस्परम् ॥ २० ॥
तदनन्तर वे अपनी इच्छाके अनुसार 'तृणपीड' (रस्सी बनानेके लिये बंटे जानेवाले तिनकोंकी भाँति हाथ-पैर आदिको ऐंठना) तथा मुष्टिकाघातसहित पूर्णयोग (मुक्केको एक अंगमें मारनेकी चेष्टा दिखाकर दूसरे अंगमें आघात करना) आदि युद्धके दाँव-पेंचोंका प्रयोग एक-दूसरेपर करने लगे ॥ २० ॥
तयोर्युद्धं ततो द्रष्टुं समेताः पुरवासिनः । ब्राह्मणा वणिजश्चैव क्षत्रियाश्च सहस्रशः ॥ २१ ॥ शूद्राश्च नरशार्दूल स्त्रियो वृद्धाश्च सर्वशः । निरन्तरमभूत् तत्र जनौघैरभिसंवृतम् ॥ २२ ॥
जनमेजय! उस समय उनका मल्लयुद्ध देखनेके लिये हजारों पुरवासी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्रियाँ एवं वृद्ध इकट्ठे हो गये। मनुष्योंकी अपार भीड़से वह स्थान ठसाठस भर गया ॥ २१-२२ ॥