महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1765, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतयोरथ भुजाघातान्निग्रहप्रग्रहात् तथा । आसीत् सुभीमसम्पातो वज्रपर्वतयोरिव ॥ २३ ॥ उन दोनोंकी भुजाओंके आघातसे तथा एक-दूसरेके निग्रह-प्रग्रहसे* ऐसा भयंकर चटचट शब्द होता था, मानो वज्र और पर्वत परस्पर टकरा रहे हों ॥ २३ ॥
उभौ परमसंहृष्टौ बलेन बलिनां वरौ । अन्योन्यस्यान्तरं प्रेप्सू परस्परजयैषिणौ ॥ २४ ॥ बलवानोंमें श्रेष्ठ वे दोनों वीर अत्यन्त हर्ष एवं उत्साहमें भरे हुए थे और एक-दूसरेकी दुर्बलता या असावधानीपर दृष्टि रखते हुए परस्पर बलपूर्वक विजय पानेकी इच्छा रखते थे ॥ २४ ॥
तद् भीममुत्सार्यजनं युद्धमासीदुपप्लवे । बलिनोः संयुगे राजन् वृत्रवासवयोरिव ॥ २५ ॥ राजन्! उस समरभूमिमें जहाँ वृत्रासुर और इन्द्रकी भाँति उन दोनों बलवान् वीरोंमें संघर्ष छिड़ा था, ऐसा भयंकर युद्ध हुआ कि दर्शकलोग दूर भाग खड़े हुए ॥ २५ ॥
प्रकर्षणाकर्षणाभ्यामनुकर्षविकर्षणैः । आचकर्षतुरन्योन्यं जानुभिश्चावजघ्नतुः ॥ २६ ॥ वे एक-दूसरेको पीछे ढकेलते और आगे खींचते थे। बार-बार खींचतान और छीना-झपटी करते थे। दोनोंने अपने प्रहारोंसे एक-दूसरेके शरीरमें खरोंच एवं घाव पैदा कर दिये और दोनों दोनोंको पटककर घुटनोंसे मारने तथा रगड़ने लगे ॥ २६ ॥
ततः शब्देन महता भर्त्सयन्तौ परस्परम् । पाषाणसंघातनिभैः प्रहारैरभिजघ्नतुः ॥ २७ ॥ फिर बड़े भारी गर्जन-तर्जनके द्वारा आपसमें डाँट बताते हुए एक-दूसरेपर ऐसे प्रहार करने लगे मानो पत्थरोंकी वर्षा कर रहे हों ॥ २७ ॥
व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ नियुद्धकुशलावुभौ । बाहुभिः समसज्जेतामायसैः परिघैरिव ॥ २८ ॥ दोनोंकी छाती चौड़ी और भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं। दोनों ही मल्लयुद्धमें कुशल थे और लोहेकी परिघ-जैसी मोटी भुजाओंको भिड़ाकर आपसमें गुँथ जाते थे ॥ २८ ॥
कार्तिकस्य तु मासस्य प्रवृत्तं प्रथमेऽहनि । अनाहारं दिवारात्रमविश्रान्तमवर्तत ॥ २९ ॥ कार्तिक मासके पहले दिन उन दोनोंका युद्ध प्रारम्भ हुआ और दिन-रात बिना खाये-पिये अविरामगतिसे चलता रहा ॥ २९ ॥
तद् वृत्तं तु त्रयोदश्यां समवेतं महात्मनोः । चतुर्दश्यां निशायां तु निवृत्तो मागधः क्लमात् ॥ ३० ॥