भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1766

उन महात्माओंका वह युद्ध इसी रूपमें त्रयोदशी-तक होता रहा। चतुर्दशीकी रातमें मगधनरेश जरासंध क्लेशसे थककर युद्धसे निवृत्त-सा होने लगा॥ ३०॥ तं राजानं तथा क्लान्तं दृष्ट्वा राजञ्जनार्दनः। उवाच भीमकर्मार्णं भीमं सम्बोधयन्निव॥ ३१॥ राजन्! उसे इस प्रकार थका देख भगवान् श्रीकृष्ण भयानक कर्म करनेवाले भीमसेनको समझाते हुए-से बोले—॥ ३१॥ क्लान्तः शत्रुर्न कौन्तेय लभ्यः पीडयितुं रणे। पीड्यमानो हि कात्स्न्र्येन जह्याज्जीवितमात्मनः॥ ३२॥ ‘कुन्तीनन्दन! शत्रु थक गया हो तो युद्धमें उसे अधिक पीड़ा देना उचित नहीं है। यदि उसे पूर्णतः पीड़ा दी जाय तो वह अपने प्राण त्याग देगा॥ ३२॥ तस्मात् ते नैव कौन्तेय पीडनीयो जनाधिपः। सममेतेन युध्यस्व बाहुभ्यां भरतर्षभ॥ ३३॥ ‘अतः पार्थ! तुम्हें राजा जरासंधको अधिक पीड़ा नहीं देनी चाहिये। भरतश्रेष्ठ! तुम अपनी भुजाओंद्वारा इनके साथ समभावसे ही युद्ध करो’॥ ३३॥ एवमुक्तः स कृष्णेन पाण्डवः परवीरहा। जरासंधस्य तद् रूपं ज्ञात्वा चक्रे मतिं वधे॥ ३४॥ भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले पाण्डुकुमार भीमसेनने जरासंधको थका हुआ जानकर उसके वधका विचार किया॥ ३४॥ ततस्तमजितं जेतुं जरासंधं वृकोदरः। संरम्भं बलिनां श्रेष्ठो जग्राह कुरुनन्दनः॥ ३५॥ तदनन्तर कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले बलवानोंमें श्रेष्ठ वृकोदरने उस अपराजित शत्रु जरासंधको जीतनेके लिये भारी क्रोध धारण किया॥ ३५॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि जरासंधवधपर्वणि जरासंधक्लान्तौ त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत जरासंधवधपर्वमें जरासंधकी थकावटसे सम्बन्ध रखनेवाला तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३॥


* दोनों हाथोंसे शत्रु का कंधा पकड़कर खींचने और उसे नीचे मुख गिरानेकी चेष्टाका नाम ‘निग्रह’ है तथा शत्रुको उत्तान गिरा देनेके लिये उसके पैरोंको पकड़कर खींचना ‘प्रग्रह’ कहलाता है।