भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1770, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1770

ते वै रत्नभुजं कृष्णं रत्नार्हाः पृथिवीश्वराः । राजानश्चक्रुरासाद्य मोक्षिता महतो भयात् ॥ १३ ॥ उस महान् भयसे छूटे हुए रत्नभोगी नरेशोंने भगवान् श्रीकृष्णसे मिलकर उन्हें विविध रत्नोंसे युक्त कर दिया ॥ १३ ॥

अक्षतः शस्त्रसम्पन्नो जितारिः सह राजभिः । रथमास्थाय तं दिव्यं निर्जगाम गिरिव्रजात् ॥ १४ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण क्षतरहित और अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे। वे शत्रुपर विजय पा चुके थे, उस अवस्थामें वे उस दिव्य रथपर आरूढ़ हो कैदसे छूटे हुए राजाओंके साथ गिरिव्रज नगरसे बाहर निकले ॥ १४ ॥

यः स सोदर्यवान् नाम द्वियोधी कृष्णसारथिः । अभ्यासघाती संदृश्यो दुर्जयः सर्वराजभिः ॥ १५ ॥ उस रथका नाम था सोदर्यवान्, उसमें दो महारथी योद्धा एक साथ बैठकर युद्ध कर सकते थे, इस समय भगवान् श्रीकृष्ण उसके सारथि थे। उस रथमें बार-बार शत्रुओंपर आघात करनेकी सुविधा थी तथा वह दर्शनीय होनेके साथ ही समस्त राजाओंके लिये दुर्जय था ॥ १५ ॥

भीमार्जुनभ्यां योधाभ्यामास्थितः कृष्णसारथिः । शुशुभे रथवर्योऽसौ दुर्जयः सर्वधन्विभिः ॥ १६ ॥ शक्रविष्णू हि संग्रामे चेरतुस्तारकामये । भीम और अर्जुन—से दो योद्धा उस रथपर बैठे थे, श्रीकृष्ण सारथिका काम सँभाल रहे थे, सम्पूर्ण धनुर्धर वीरोंके लिये भी उसे जीतना कठिन था। इन दोनों रथियोंके द्वारा उस श्रेष्ठ रथकी ऐसी शोभा हो रही थी मानो इन्द्र और विष्णु एक साथ बैठकर तारकामय संग्राममें विचर रहे हों ॥ १६ १/२ ॥

रथेन तेन वै कृष्ण उपारुह्य ययौ तदा ॥ १७ ॥ तप्तचामीकराभेण किङ्किणीजालमालिना । मेघनिर्घोषनादेन जैत्रेणामित्रघातिना ॥ १८ ॥ वह रथ तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् था। उसमें क्षुद्र घण्टिकाओंसे युक्त झालरें लगी थीं। उसकी घर्घरराहट मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान जान पड़ती थी। वह शत्रुओंका विघातक और विजय प्रदान करनेवाला था। उसी रथपर सवार हो उसके द्वारा श्रीकृष्णने उस समय यात्रा की ॥ १७-१८ ॥

येन शक्रो दानवानां जघान नवतीर्नव । तं प्राप्य समहृष्यन्त रथं ते पुरुषर्षभाः ॥ १९ ॥ यह वही रथ था, जिसके द्वारा इन्द्रने निन्यानबे दानवोंका वध किया था। उस रथको पाकर वे तीनों नरश्रेष्ठ बहुत प्रसन्न हुए ॥ १९ ॥