महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1769, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहलेकी ही भाँति चीरकर उसके दो टुकड़े कर दिये और उन दोनों टुकड़ोंको अलग-अलग विपरीत दिशामें फेंक दिया। जरासंधके वधके लिये यह दूसरा संकेत था।
भीमसेनस्तदा ज्ञात्वा निर्बिभेद च मागधम् ।।
द्विधा व्यत्यस्य पादेन प्राक्षिपच्च ननाद ह ।
भीमसेनने उसे समझकर पुनः मगधराजको दो टुकड़ोंमें चीर डाला और पैरसे ही उन दोनों टुकड़ोंको विपरीत दिशाओंमें करके फेंक दिया। इसके बाद वे विकट गर्जना करने लगे।
शुष्कमांसास्थिमेदस्त्वग्भिन्नमस्तिष्कपिण्डकः ।।
शवभूतस्तदा राजन् पिण्डीकृत इवाबभौ ।)
राजन्! उस समय जरासंधका शरीर शवरूप होकर मांसके लोंदे-सा जान पड़ने लगा। उसके शरीरके मांस, हड्डियाँ, मेदा और चमड़ा सभी सूख गये थे। मस्तिष्क और शरीर दो भागोंमें विदीर्ण हो गये थे।
तस्य निष्पिष्यमाणस्य पाण्डवस्य च गर्जतः ।
अभवत् तुमुलो नादः सर्वप्राणिभयंकरः ।। ८ ।।
वित्रेसुर्मगधाः सर्वे स्त्रीणां गर्भाश्च सुस्रुवुः ।
भीमसेनस्य नादेन जरासंधस्य चैव ह ।। ९ ।।
जब जरासंध रगड़ा जा रहा था और पाण्डुकुमार गर्ज-गर्जकर उसे पीसे डालते थे, उस समय भीमसेनकी गर्जना और जरासंधकी चीत्कारसे जो तुमुल नाद प्रकट हुआ, वह समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला था। उसे सुनकर सभी मगधनिवासी भयसे थर्रा उठे। स्त्रियोंके तो गर्भतक गिर गये ।। ८-९ ।।
किं नु स्याद्धिमवान् भिन्नः किं नु स्विद् दीर्यते मही ।
इति वै मागधा जज्ञुर्भीमसेनस्य निःस्वनात् ।। १० ।।
भीमसेनकी गर्जना सुनकर मगधके लोग भयभीत होकर सोचने लगे कि 'कहीं हिमालय पहाड़ तो नहीं फट पड़ा? कहीं पृथ्वी तो विदीर्ण नहीं हो रही है? ।। १० ।।
ततो राज्ञः कुलद्वारि प्रसुप्तमिव तं नृपम् ।
रात्रौ गतासुमुत्सृज्य निष्क्रमुररिंदमाः ।। ११ ।।
तदनन्तर शत्रुओंका दमन करनेवाले वे तीनों वीर रातमें राजा जरासंधके प्राणहीन शरीरको सोते हुएके समान राजभवनके द्वारपर छोड़कर वहाँसे चल दिये ।। ११ ।।
जरासंधरथं कृष्णो योजयित्वा पताकिनम् ।
आरोप्य भ्रातरौ चैव मोक्षयामास बान्धवान् ।। १२ ।।
श्रीकृष्णने जरासंधके ध्वजा-पताकामण्डित दिव्य रथको जोत लिया और उसपर दोनों भाई भीमसेन और अर्जुनको बिठाकर पहाड़ी खोहके पास जा वहाँ कैदमें पड़े हुए अपने बान्धवस्वरूप समस्त राजाओंको छुड़ाया ।। १२ ।।