महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1768, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदस्य मृत्युर्विहितः त्वदृते न महाबल। वायुं चिन्त्य महाबाहो जहीमं मगधाधिपम्॥) 'महाबली भीम! तुम्हारे सिवा और किसीके द्वारा इसकी मृत्यु नहीं होनेवाली है। महाबाहो! तुम वायुदेवका चिन्तन करके इस मगधराजको मार डालो'।
एवमुक्तस्तदा भीमो जरासंधमरिंदमः। उत्क्षिप्य भ्रामयामास बलवन्तं महाबलः ॥ ५ ॥ उनके इस तरह संकेत करनेपर शत्रुओंका दमन करनेवाले महाबली भीमने उस समय बलवान् जरासंधको उठाकर आकाशमें वेगसे घुमाना आरम्भ किया ॥ ५ ॥
(ततस्तु भगवान् कृष्णो जरासंधजिघांसया। भीमसेनं समालोक्य नलं जग्राह पाणिना ॥ द्विधा चिच्छेद वै तत् तु जरासंधवधं प्रति ।) तब भगवान् श्रीकृष्णने जरासंधका वध करानेकी इच्छासे भीमसेनकी ओर देखकर एक नरकट* हाथमें ले लिया और उसे (दातुनकी भाँति) दो टुकड़ोंमें चीर डाला (तथा उसे फेंक दिया)। यह जरासंधको मारनेके लिये एक संकेत था।
भ्रामयित्वा शतगुणं जानुभ्यां भरतर्षभ। बभञ्ज पृष्ठं संक्षिप्य निष्पिष्य विननाद च ॥ ६ ॥ भरतश्रेष्ठ जनमेजय! (भीमने उनके संकेतको समझ लिया और) उन्होंने सौ बार घुमाकर उसे धरतीपर पटक दिया और उसकी पीठको धनुषकी तरह मोड़कर दोनों घुटनोंकी चोटसे उसकी रीढ़ तोड़ डाली, फिर अपने शरीरकी रगड़से पीसते हुए भीमने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ६ ॥
करे गृहीत्वा चरणं द्वेधा चक्रे महाबलः ॥ ७ ॥ इसके बाद अपने एक हाथसे उसका एक पैर पकड़कर और दूसरे पैरपर अपना पैर रखकर महाबली भीमने उसे दो खण्डोंमें चीर डाला ॥ ७ ॥
(पुनः संधाय तु तदा जरासंधः प्रतापवान् ॥ भीमेन च समागम्य बाहुयुद्धं चकार ह। तयोः समभवद् युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥ सर्वलोकक्षयकरं सर्वभूतभयावहम्। पुनः कृष्णस्तमिरिणं द्विधा विच्छिद्य माधवः ॥ व्यत्यस्य प्राक्षिपत् तत् तु जरासंधवधेप्सया। तब वे दोनों टुकड़े फिरसे जुड़ गये और प्रतापी जरासंध भीमसे भिड़कर बाहुयुद्ध करने लगा। उन दोनों वीरोंका वह युद्ध अत्यन्त भयंकर और रोमांचकारी था। उसे देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो सम्पूर्ण जगत्का संहार हो जायगा। वह द्वन्द्वयुद्ध सम्पूर्ण प्राणियोंके भयको बढ़ानेवाला था। उस समय भगवान् श्रीकृष्णने पुनः एक नरकट लेकर