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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

तदस्य मृत्युर्विहितः त्वदृते न महाबल। वायुं चिन्त्य महाबाहो जहीमं मगधाधिपम्॥) 'महाबली भीम! तुम्हारे सिवा और किसीके द्वारा इसकी मृत्यु नहीं होनेवाली है। महाबाहो! तुम वायुदेवका चिन्तन करके इस मगधराजको मार डालो'।

एवमुक्तस्तदा भीमो जरासंधमरिंदमः। उत्क्षिप्य भ्रामयामास बलवन्तं महाबलः ॥ ५ ॥ उनके इस तरह संकेत करनेपर शत्रुओंका दमन करनेवाले महाबली भीमने उस समय बलवान् जरासंधको उठाकर आकाशमें वेगसे घुमाना आरम्भ किया ॥ ५ ॥

(ततस्तु भगवान् कृष्णो जरासंधजिघांसया। भीमसेनं समालोक्य नलं जग्राह पाणिना ॥ द्विधा चिच्छेद वै तत् तु जरासंधवधं प्रति ।) तब भगवान् श्रीकृष्णने जरासंधका वध करानेकी इच्छासे भीमसेनकी ओर देखकर एक नरकट* हाथमें ले लिया और उसे (दातुनकी भाँति) दो टुकड़ोंमें चीर डाला (तथा उसे फेंक दिया)। यह जरासंधको मारनेके लिये एक संकेत था।

भ्रामयित्वा शतगुणं जानुभ्यां भरतर्षभ। बभञ्ज पृष्ठं संक्षिप्य निष्पिष्य विननाद च ॥ ६ ॥ भरतश्रेष्ठ जनमेजय! (भीमने उनके संकेतको समझ लिया और) उन्होंने सौ बार घुमाकर उसे धरतीपर पटक दिया और उसकी पीठको धनुषकी तरह मोड़कर दोनों घुटनोंकी चोटसे उसकी रीढ़ तोड़ डाली, फिर अपने शरीरकी रगड़से पीसते हुए भीमने बड़े जोरसे सिंहनाद किया ॥ ६ ॥

करे गृहीत्वा चरणं द्वेधा चक्रे महाबलः ॥ ७ ॥ इसके बाद अपने एक हाथसे उसका एक पैर पकड़कर और दूसरे पैरपर अपना पैर रखकर महाबली भीमने उसे दो खण्डोंमें चीर डाला ॥ ७ ॥

(पुनः संधाय तु तदा जरासंधः प्रतापवान् ॥ भीमेन च समागम्य बाहुयुद्धं चकार ह। तयोः समभवद् युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥ सर्वलोकक्षयकरं सर्वभूतभयावहम्। पुनः कृष्णस्तमिरिणं द्विधा विच्छिद्य माधवः ॥ व्यत्यस्य प्राक्षिपत् तत् तु जरासंधवधेप्सया। तब वे दोनों टुकड़े फिरसे जुड़ गये और प्रतापी जरासंध भीमसे भिड़कर बाहुयुद्ध करने लगा। उन दोनों वीरोंका वह युद्ध अत्यन्त भयंकर और रोमांचकारी था। उसे देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो सम्पूर्ण जगत्का संहार हो जायगा। वह द्वन्द्वयुद्ध सम्पूर्ण प्राणियोंके भयको बढ़ानेवाला था। उस समय भगवान् श्रीकृष्णने पुनः एक नरकट लेकर

पहलेकी ही भाँति चीरकर उसके दो टुकड़े कर दिये और उन दोनों टुकड़ोंको अलग-अलग विपरीत दिशामें फेंक दिया। जरासंधके वधके लिये यह दूसरा संकेत था। भीमसेनस्तदा ज्ञात्वा निर्बिभेद च मागधम् ।।
द्विधा व्यत्यस्य पादेन प्राक्षिपच्च ननाद ह ।
भीमसेनने उसे समझकर पुनः मगधराजको दो टुकड़ोंमें चीर डाला और पैरसे ही उन दोनों टुकड़ोंको विपरीत दिशाओंमें करके फेंक दिया। इसके बाद वे विकट गर्जना करने लगे।
शुष्कमांसास्थिमेदस्त्वग्भिन्नमस्तिष्कपिण्डकः ।।
शवभूतस्तदा राजन् पिण्डीकृत इवाबभौ ।)
राजन्! उस समय जरासंधका शरीर शवरूप होकर मांसके लोंदे-सा जान पड़ने लगा। उसके शरीरके मांस, हड्डियाँ, मेदा और चमड़ा सभी सूख गये थे। मस्तिष्क और शरीर दो भागोंमें विदीर्ण हो गये थे।
तस्य निष्पिष्यमाणस्य पाण्डवस्य च गर्जतः ।
अभवत् तुमुलो नादः सर्वप्राणिभयंकरः ।। ८ ।।
वित्रेसुर्मगधाः सर्वे स्त्रीणां गर्भाश्च सुस्रुवुः ।
भीमसेनस्य नादेन जरासंधस्य चैव ह ।। ९ ।।
जब जरासंध रगड़ा जा रहा था और पाण्डुकुमार गर्ज-गर्जकर उसे पीसे डालते थे, उस समय भीमसेनकी गर्जना और जरासंधकी चीत्कारसे जो तुमुल नाद प्रकट हुआ, वह समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला था। उसे सुनकर सभी मगधनिवासी भयसे थर्रा उठे। स्त्रियोंके तो गर्भतक गिर गये ।। ८-९ ।।
किं नु स्याद्धिमवान् भिन्नः किं नु स्विद् दीर्यते मही ।
इति वै मागधा जज्ञुर्भीमसेनस्य निःस्वनात् ।। १० ।।
भीमसेनकी गर्जना सुनकर मगधके लोग भयभीत होकर सोचने लगे कि 'कहीं हिमालय पहाड़ तो नहीं फट पड़ा? कहीं पृथ्वी तो विदीर्ण नहीं हो रही है? ।। १० ।।
ततो राज्ञः कुलद्वारि प्रसुप्तमिव तं नृपम् ।
रात्रौ गतासुमुत्सृज्य निष्क्रमुररिंदमाः ।। ११ ।।
तदनन्तर शत्रुओंका दमन करनेवाले वे तीनों वीर रातमें राजा जरासंधके प्राणहीन शरीरको सोते हुएके समान राजभवनके द्वारपर छोड़कर वहाँसे चल दिये ।। ११ ।।
जरासंधरथं कृष्णो योजयित्वा पताकिनम् ।
आरोप्य भ्रातरौ चैव मोक्षयामास बान्धवान् ।। १२ ।।
श्रीकृष्णने जरासंधके ध्वजा-पताकामण्डित दिव्य रथको जोत लिया और उसपर दोनों भाई भीमसेन और अर्जुनको बिठाकर पहाड़ी खोहके पास जा वहाँ कैदमें पड़े हुए अपने बान्धवस्वरूप समस्त राजाओंको छुड़ाया ।। १२ ।।

ते वै रत्नभुजं कृष्णं रत्नार्हाः पृथिवीश्वराः । राजानश्चक्रुरासाद्य मोक्षिता महतो भयात् ॥ १३ ॥ उस महान् भयसे छूटे हुए रत्नभोगी नरेशोंने भगवान् श्रीकृष्णसे मिलकर उन्हें विविध रत्नोंसे युक्त कर दिया ॥ १३ ॥

अक्षतः शस्त्रसम्पन्नो जितारिः सह राजभिः । रथमास्थाय तं दिव्यं निर्जगाम गिरिव्रजात् ॥ १४ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण क्षतरहित और अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे। वे शत्रुपर विजय पा चुके थे, उस अवस्थामें वे उस दिव्य रथपर आरूढ़ हो कैदसे छूटे हुए राजाओंके साथ गिरिव्रज नगरसे बाहर निकले ॥ १४ ॥

यः स सोदर्यवान् नाम द्वियोधी कृष्णसारथिः । अभ्यासघाती संदृश्यो दुर्जयः सर्वराजभिः ॥ १५ ॥ उस रथका नाम था सोदर्यवान्, उसमें दो महारथी योद्धा एक साथ बैठकर युद्ध कर सकते थे, इस समय भगवान् श्रीकृष्ण उसके सारथि थे। उस रथमें बार-बार शत्रुओंपर आघात करनेकी सुविधा थी तथा वह दर्शनीय होनेके साथ ही समस्त राजाओंके लिये दुर्जय था ॥ १५ ॥

भीमार्जुनभ्यां योधाभ्यामास्थितः कृष्णसारथिः । शुशुभे रथवर्योऽसौ दुर्जयः सर्वधन्विभिः ॥ १६ ॥ शक्रविष्णू हि संग्रामे चेरतुस्तारकामये । भीम और अर्जुन—से दो योद्धा उस रथपर बैठे थे, श्रीकृष्ण सारथिका काम सँभाल रहे थे, सम्पूर्ण धनुर्धर वीरोंके लिये भी उसे जीतना कठिन था। इन दोनों रथियोंके द्वारा उस श्रेष्ठ रथकी ऐसी शोभा हो रही थी मानो इन्द्र और विष्णु एक साथ बैठकर तारकामय संग्राममें विचर रहे हों ॥ १६ १/२ ॥

रथेन तेन वै कृष्ण उपारुह्य ययौ तदा ॥ १७ ॥ तप्तचामीकराभेण किङ्किणीजालमालिना । मेघनिर्घोषनादेन जैत्रेणामित्रघातिना ॥ १८ ॥ वह रथ तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान् था। उसमें क्षुद्र घण्टिकाओंसे युक्त झालरें लगी थीं। उसकी घर्घरराहट मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान जान पड़ती थी। वह शत्रुओंका विघातक और विजय प्रदान करनेवाला था। उसी रथपर सवार हो उसके द्वारा श्रीकृष्णने उस समय यात्रा की ॥ १७-१८ ॥

येन शक्रो दानवानां जघान नवतीर्नव । तं प्राप्य समहृष्यन्त रथं ते पुरुषर्षभाः ॥ १९ ॥ यह वही रथ था, जिसके द्वारा इन्द्रने निन्यानबे दानवोंका वध किया था। उस रथको पाकर वे तीनों नरश्रेष्ठ बहुत प्रसन्न हुए ॥ १९ ॥

ततः कृष्णं महाबाहुं भ्रातृभ्यां सहितं तदा ।
रथस्थं मागधा दृष्ट्वा समपद्यन्त विस्मिताः ॥ २० ॥
तदनन्तर दोनों फुफेरे भाइयोंके साथ रथपर बैठे हुए महाबाहु श्रीकृष्णको देखकर मगधके निवासी बड़े विस्मित हुए ॥ २० ॥
हयैर्दिव्यैः समायुक्तो रथो वायुसमो जवे ।
अधिष्ठितः स शुशुभे कृष्णेनातीव भारत ॥ २१ ॥
वह रथ वायुके समान वेगशाली था, उसमें दिव्य घोड़े जुते हुए थे। भारत! श्रीकृष्णके बैठ जानेसे उस दिव्य रथकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ २१ ॥
असङ्गो देवविहितस्तस्मिन् रथवरे ध्वजः ।
योजनाद् ददृशे श्रीमानिन्द्रायुधसमप्रभः ॥ २२ ॥
उस उत्तम रथपर देवनिर्मित ध्वज फहराता रहता था, जो रथसे अछूता था (रथके साथ उसका लगाव नहीं था, वह बिना आधारके ही उसके ऊपर लहराया करता था)। इन्द्रधनुषके समान प्रकाशमान बहुरंगी एवं शोभाशाली वह ध्वज एक योजन दूरसे ही दीखने लगता था ॥ २२ ॥
चिन्तयामास कृष्णोऽथ गरुत्मन्तं स चाभ्ययात् ।
क्षणे तस्मिन् स तेनासीच्चैत्यवृक्ष इवोत्थितः ॥ २३ ॥
व्यादितास्यैर्महानादैः सह भूतैर्ध्वजालयैः ।
तस्मिन् रथवरे तस्थौ गरुत्मान् पन्नगाशनः ॥ २४ ॥
उस समय भगवान् श्रीकृष्णने गरुडजीका स्मरण किया। गरुडजी उसी क्षण वहाँ आ गये। उस रथकी ध्वजामें बहुत-से भूत मुँह बाये हुए विकट गर्जना करते रहते थे। उन्हींके साथ सर्पभोजी गरुडजी भी उस श्रेष्ठ रथपर स्थित हो गये। उनके द्वारा वह ध्वज ऊँचे उठे हुए चैत्य वृक्षके समान सुशोभित हो गया ॥ २३-२४ ॥
दुर्निरीक्ष्यो हि भूतानां तेजसाभ्यधिकं बभौ ।
आदित्य इव मध्याह्ने सहस्रकिरणावृतः ॥ २५ ॥
न स सज्जति वृक्षेषु शस्त्रैश्चापि न रिष्यते ।
दिव्यो ध्वजवरो राजन् दृश्यते चेह मानुषैः ॥ २६ ॥
अब वह उत्तम ध्वज सहस्रों किरणोंसे आवृत मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति अपने तेजसे अधिक प्रकाशित होने लगा। प्राणियोंके लिये उसकी ओर देखना कठिन हो गया। वह वृक्षोंमें कहीं अटकता नहीं था, अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा कटता नहीं था। राजन्! वह दिव्य और श्रेष्ठ ध्वज इस लोकके मनुष्योंको दृष्टिगोचर मात्र होता था ॥ २५-२६ ॥
तमास्थाय रथं दिव्यं पर्जन्यसमनिःस्वनम् ।
निर्ययौ पुरुषव्याघ्रः पाण्डवाभ्यां सहाच्युतः ॥ २७ ॥

मेघके समान गम्भीर घर्घर ध्वनिसे परिपूर्ण उसी दिव्य रथपर भीमसेन और अर्जुनके साथ बैठे हुए पुरुषसिंह भगवान् श्रीकृष्ण नगरसे बाहर निकले ।। २७ ।।
यं लेभे वासवाद् राजा वसुस्तस्माद् बृहद्रथः ।
बृहद्रथात् क्रमेणैव प्राप्तो बार्हद्रथं नृप ।। २८ ।।
राजन्! इन्द्रसे उस रथको राजा वसुने प्राप्त किया था। फिर क्रमशः वसुसे बृहद्रथको और बृहद्रथसे जरासंधको वह रथ मिला था ।। २८ ।।
स निर्याय महाबाहुः पुण्डरीकेक्षणस्ततः ।
गिरिव्रजाद् बहिस्तस्थौ समदेशे महायशाः ।। २९ ।।
महायशस्वी कमलनयन महाबाहु श्रीकृष्ण गिरिव्रजसे बाहर आ समतल भूमिपर खड़े हुए ।। २९ ।।
तत्रैनं नागराः सर्वे सत्कारेणाभ्ययुस्तदा ।
ब्राह्मणप्रमुखा राजन् विधिदृष्टेन कर्मणा ।। ३० ।।
जनमेजय! वहाँ ब्राह्मण आदि सभी नागरिकोंने शास्त्रीय विधिसे उनका सत्कार एवं पूजन किया ।। ३० ।।
बन्धनाद् विप्रमुक्ताश्च राजानो मधुसूदनम् ।
पूजयामासुरूचुश्च स्तुतिपूर्वमिदं वचः ।। ३१ ।।
कैदसे छूटे हुए राजाओंने भी मधुसूदनकी पूजा की और उनकी स्तुति करते हुए इस प्रकार कहा— ।। ३१ ।।

नैतच्चित्रं महाबाहो त्वयि देवकिनन्दने । भीमार्जुनबलोपेते धर्मस्य प्रतिपालनम् ॥ ३२ ॥ ‘महाबाहो! आप देवकी देवीको आनन्दित करनेवाले साक्षात् भगवान् हैं, भीमसेन और अर्जुनका बल भी आपके साथ है। आपके द्वारा जो धर्मकी रक्षा हो रही है, वह आप-सरीखे धर्मावतारके लिये आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ ३२ ॥

जरासंधह्रदे घोरे दुःखपङ्के निमज्जताम् । राज्ञां समभ्युद्धरणं यदिदं कृतमद्य वै ॥ ३३ ॥ ‘प्रभो! हम सब राजा दुःखरूपी पंकसे युक्त जरासंध-रूपी भयानक कुण्डमें डूब रहे थे, आपने जो आज हमारा यह उद्धार किया है, वह आपके योग्य ही है ॥ ३३ ॥

विष्णो समवसन्नानां गिरिदुर्गे सुदारुणे । दिष्ट्या मोक्षाद् यशो दीप्तमाप्तं ते यदुनन्दन ॥ ३४ ॥ ‘विष्णो! अत्यन्त भयंकर पहाड़ी किलेमें कैद हो हम बड़े दुःखसे दिन काट रहे थे। यदुनन्दन! आपने हमें इस संकटसे मुक्त करके अत्यन्त उज्ज्वल यश प्राप्त किया है; यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ ३४ ॥

किं कुर्मः पुरुषव्याघ्र शाधि नः प्रणतिस्थितान् । कृतमित्येव तद् विद्धि नृपैर्यद्यपि दुष्करम् ॥ ३५ ॥ ‘पुरुषसिंह! हम आपके चरणोंमें पड़े हैं। आप हमें आज्ञा दीजिये, हम क्या सेवा करें? कोई दुष्कर कार्य हो तो भी आपको यह समझना चाहिये मानो हम सब राजाओंने मिलकर उसे पूर्ण कर ही दिया' ॥ ३५ ॥

तानुवाच हृषीकेशः समाश्वास्य महामनाः । युधिष्ठिरो राजसूयं क्रतुमाहर्तुमिच्छति ॥ ३६ ॥ तब महामना भगवान् हृषीकेशने उन सबको आश्वासन देकर कहा—‘राजाओ! धर्मराज युधिष्ठिर राजसूययज्ञ करना चाहते हैं ॥ ३६ ॥

तस्य धर्मप्रवृत्तस्य पार्थिवत्वं चिकीर्षतः । सर्वैर्भवद्भिर्विज्ञाय साहाय्यं क्रियतामिति ॥ ३७ ॥ ‘धर्ममें तत्पर रहते हुए ही उन्हें सम्राट् पद प्राप्त करनेकी इच्छा हुई है। इस कार्यमें तुम सब लोग उनकी सहायता करो' ॥ ३७ ॥

ततः सुप्रीतमनसस्ते नृपा नृपसत्तम । तथेत्येवाब्रुवन् सर्वे प्रतिगृह्यास्य तां गिरम् ॥ ३८ ॥ नृपश्रेष्ठ जनमेजय! तब उन सभी राजाओंने प्रसन्नचित्त हो 'तथास्तु' कहकर भगवान्‌की वह आज्ञा शिरोधार्य कर ली ॥ ३८ ॥

रत्नभाजं च दाशार्हं चक्रुस्ते पृथिवीश्वराः । कृच्छ्राज्जग्राह गोविन्दस्तेषां तदनुकम्पया ॥ ३९ ॥

इतना ही नहीं, उन भूपालोंने दशार्हकुलभूषण भगवान्‌को रत्न भेंट किये। भगवान् गोविन्दने बड़ी कठिनाईसे उन सबपर कृपा करनेके लिये ही वह भेंट स्वीकार की ।। ३९ ।।

जरासंधात्मजश्चैव सहदेवो महामनाः ।
निर्ययौ सजनामात्यः पुरस्कृत्य पुरोहितम् ॥ ४० ॥
तदनन्तर जरासंधका पुत्र महामना सहदेव पुरोहितको आगे करके सेवकों और मन्त्रियोंके साथ नगरसे बाहर निकला ।। ४० ।।

स नीचैः प्रणतो भूत्वा बहुरत्नपुरोगमः ।
सहदेवो नृणां देवं वासुदेवमुपस्थितः ॥ ४१ ॥
उसके आगे रत्नोंका बहुत बड़ा भण्डार आ रहा था। सहदेव अत्यन्त विनीतभावसे चरणोंमें पड़कर नरदेव भगवान् वासुदेवकी शरणमें आया था ।। ४१ ।।

(सहदेव उवाच

यत् कृतं पुरुषव्याघ्र मम पित्रा जनार्दन ।
तत् ते हृदि महाबाहो न कार्यं पुरुषोत्तम ॥
**सहदेव बोला—**पुरुषसिंह जनार्दन! महाबाहु पुरुषोत्तम! मेरे पिताने जो अपराध किया है, उसे आप अपने हृदयसे निकाल दें।

त्वां प्रपन्नोऽस्मि गोविन्द प्रसादं कुरु मे प्रभो ।
पितुरिच्छामि संस्कारं कर्तुं देवकिनन्दन ॥
गोविन्द! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। प्रभो! आप मुझपर कृपा कीजिये। देवकीनन्दन! मैं अपने पिताका दाह-संस्कार करना चाहता हूँ।

त्वत्तोऽभ्यनुज्ञां सम्प्राप्य भीमसेनात् तथार्जुनात् ।
निर्भयो विचरिष्यामि यथाकामं यथासुखम् ॥
आपसे, भीमसेनसे तथा अर्जुनसे आज्ञा लेकर यह कार्य करूँगा और आपकी कृपासे निर्भय हो इच्छानुसार सुखपूर्वक विचरूँगा।

वैशम्पायन उवाच

एवं विज्ञाप्यमानस्य सहदेवस्य मारिष ।
प्रहृष्टो देवकीपुत्रः पाण्डवौ च महारथौ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! सहदेवके इस प्रकार निवेदन करनेपर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण तथा महारथी भीमसेन और अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए।

क्रियतां संस्क्रिया राजन् पितुस्त इति चाब्रुवन् ।
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य पार्थयोश्च स मागधः ॥
प्रविश्य नगरं तूर्णं सह मन्त्रिभिरप्युत ।
चितां चन्दनकाष्ठैश्च कालेयसरलैस्तथा ॥

कालागुरुसुगन्धैश्च तैलैश्च विविधैरपि । घृतधाराक्षतैश्चैव सुमनोभिश्च मागधम् ।। समन्तादवकीर्यन्त दह्यन्तं मगधाधिपम् । उन सबने एक स्वरसे कहा—‘राजन्! तुम अपने पिताका अन्त्येष्टि-संस्कार करो।’ भगवान् श्रीकृष्ण तथा दोनों कुन्तीकुमारोंका यह आदेश सुनकर मगधराजकुमारने मन्त्रियोंके साथ शीघ्र ही नगरमें प्रवेश किया। फिर चन्दनकी लकड़ी तथा केसर, देवदारु और काला अगरु आदि सुगन्धित काष्ठोंसे चिता बनाकर उसपर मगधराजका शव रखा गया। तत्पश्चात् जलती चितामें दग्ध होते हुए मगधराजके शरीरपर नाना प्रकारके चन्दनादि सुगन्धित तैल और घीकी धाराएँ गिरायी गयीं। सब ओरसे अक्षत और फूलोंकी वर्षा की गयी।

उदकं तस्य चक्रेऽथ सहदेवः सहानुजः ।। कृत्वा पितुः स्वर्गगतिं निर्ययौ यत्र केशवः । पाण्डवौ च महाभागौ भीमसेनार्जुनोवुभौ ।। स प्रह्वः प्राञ्जलिर्भूत्वा विज्ञापयत माधवम् । शवदाहके पश्चात् सहदेवने अपने छोटे भाईके साथ पिताके लिये जलांजलि दी। इस प्रकार पिताका पारलौकिक कार्य करके राजकुमार सहदेव नगरसे निकलकर उस स्थानमें गया, जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण तथा महाभाग पाण्डुपुत्र भीमसेन और अर्जुन विद्यमान थे। उसने नम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा।

सहदेव उवाच

इमे रत्नानि भूरीणि गोऽजाविमहिषादयः । हस्तिनोऽश्वाश्च गोविन्द वासांसि विविधानि च ।। दीयतां धर्मराजाय यथा वा मन्यते भवान् ।) सहदेवने कहा—प्रभो! ये गाय, भैंस, भेड़-बकरे आदि पशु, बहुत-से रत्न, हाथी-घोड़े और नाना प्रकारके वस्त्र आपकी सेवामें प्रस्तुत हैं। गोविन्द! ये सब वस्तुएँ धर्मराज युधिष्ठिरको दीजिये अथवा आपकी जैसी रुचि हो, उसके अनुसार मुझे सेवाके लिये आदेश दीजिये।

भयार्ताय ततस्तस्मै कृष्णो दत्त्वाभयं तदा । आददेऽस्य महार्हाणि रत्नानि पुरुषोत्तमः ।। ४२ ।। वह भयसे पीड़ित हो रहा था; पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णने उसे अभयदान देकर उसके लाये हुए बहुमूल्य रत्नोंकी भेंट स्वीकार कर ली ।। ४२ ।।

अभ्यषिञ्चत तत्रैव जरासंधात्मजं मुदा । गत्वैकत्वं च कृष्णेन पार्थाभ्यां चैव सत्कृतः ।। ४३ ।।

तत्पश्चात् जरासंधकुमारको प्रसन्नतापूर्वक वहीं पिताके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। श्रीकृष्णने सहदेवको अपना अभिन्न सुहृद् बना लिया, इसलिये भीमसेन और अर्जुनने भी उसका बड़ा सत्कार किया ॥ ४३ ॥

विवेश राजा द्युतिमान् बार्हद्रथपुरं नृप ।
अभिषिक्तो महाबाहुर्जारासंधिर्महात्मभिः ॥ ४४ ॥
राजन्! उन महात्माओं‌द्वारा अभिषिक्त हो महाबाहु जरासंधपुत्र तेजस्वी राजा सहदेव अपने पिताके नगरमें लौट गया ॥ ४४ ॥

कृष्णस्तु सह पार्थाभ्यां श्रिया परमया युतः ।
रत्नान्यादाय भूरिणि प्रययौ पुरुषर्षभः ॥ ४५ ॥
और पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने सर्वोत्तम शोभासे सम्पन्न हो प्रचुर रत्नोंकी भेंट ले दोनों कुन्तीकुमारोंके साथ वहाँसे प्रस्थान किया ॥ ४५ ॥

इन्द्रप्रस्थमुपागम्य पाण्डवाभ्यां सहाच्युतः ।
समेत्य धर्मराजानं प्रीयमाणोऽभ्यभाषत ॥ ४६ ॥
भीमसेन और अर्जुनके साथ इन्द्रप्रस्थमें आकर भगवान् श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिरसे मिले और अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले— ॥ ४६ ॥

दिष्ट्या भीमेन बलवाञ्जरासंधो निपातितः ।
राजानो मोक्षिताश्चैव बन्धनान्नृपसत्तम ॥ ४७ ॥
‘नृपश्रेष्ठ! सौभाग्यकी बात है कि महाबली भीमसेनने जरासंधको मार गिराया और समस्त राजाओंको उसकी कैदसे छुड़ा दिया ॥ ४७ ॥

दिष्ट्या कुशलिनौ चेमौ भीमसेनधनंजयौ ।
पुनः स्वनगरं प्राप्तावक्षताविति भारत ॥ ४८ ॥
‘भारत! भाग्यसे ही ये दोनों भाई भीमसेन और अर्जुन अपने नगरमें पुनः सकुशल लौट आये और इन्हें कोई क्षति नहीं पहुँची’ ॥ ४८ ॥

ततो युधिष्ठिरः कृष्णं पूजयित्वा यथार्हतः ।
भीमसेनार्जुनौ चैव प्रहृष्टः परिषस्वजे ॥ ४९ ॥
तब युधिष्ठिरने श्रीकृष्णका यथायोग्य सत्कार करके भीमसेन और अर्जुनको भी प्रसन्नतापूर्वक गले लगाया ॥ ४९ ॥

ततः क्षीणे जरासंधे भ्रातृभ्यां विहितं जयम् ।
अजातशत्रुरासाद्य मुमुदे भ्रातृभिः सह ॥ ५० ॥
तदनन्तर जरासंधके नष्ट होनेपर अपने दोनों भाइयोंद्वारा की हुई विजयको पाकर अजातशत्रु राजा युधिष्ठिर भाइयोंसहित आनन्दमग्न हो गये ॥ ५० ॥

(हृष्टश्च धर्मराड् वाक्यं जनार्दनमभाषत ।
फिर धर्मराजने हर्षमें भरकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा।

युधिष्ठिर उवाच

त्वां प्राप्य पुरुषव्याघ्र भीमसेनेन पातितः ।
मागधोऽसौ बलोन्मत्तो जरासंधः प्रतापवान् ॥
**युधिष्ठिर बोले—**पुरुषसिंह जनार्दन! आपका सहारा पाकर ही भीमसेनने बलके अभिमानसे उन्मत्त रहनेवाले प्रतापी मगधराज जरासंधको मार गिराया है।
राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं प्राप्स्यामि विगतज्वरः ।
त्वद्बुद्धिबलमाश्रित्य यागार्होऽस्मि जनार्दन ॥
अब मैं निश्चिन्त होकर यज्ञोंमें श्रेष्ठ राजसूयका शुभ अवसर प्राप्त करूँगा। प्रभो! आपके बुद्धि-बलका सहारा पाकर मैं यज्ञ करनेयोग्य हो गया।
पीतं पृथिव्यां युद्धेन यशस्ते पुरुषोत्तम ।
जरासंधवधेनैव प्राप्तास्ते विपुलाः श्रियः ॥
पुरुषोत्तम! इस युद्धसे भूमण्डलमें आपके यशका विस्तार हुआ। जरासंधके वधसे ही आपको प्रचुर सम्पत्ति प्राप्त हुई है।

वैशम्पायन उवाच

एवं सम्भाष्य कौन्तेयः प्रादाद् रथवरं प्रभोः ।
प्रतिगृह्य तु गोविन्दो जरासंधस्य तं रथम् ॥
प्रहृष्टस्तस्य मुमुदे फाल्गुनेन जनार्दनः ।
प्रीतिमानभवद् राजन् धर्मराजपुरस्कृतः ॥)
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने भगवान्‌को श्रेष्ठ रथ प्रदान किया। जरासंधके उस रथको पाकर गोविन्द बड़े प्रसन्न हुए और अर्जुनके साथ उसमें बैठकर बड़े हर्षका अनुभव करने लगे। धर्मराज युधिष्ठिरके उस भेंटको अंगीकार करके उन्हें बड़ा संतोष हुआ।
यथावयः समागम्य भ्रातृभिः सह पाण्डवः ।
सत्कृत्य पूजयित्वा च विससर्ज नराधिपान् ॥ ५१ ॥
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर भाइयोंके साथ जाकर समस्त राजाओंसे उनकी अवस्थाके अनुसार क्रमशः मिले; फिर उन सबका यथायोग्य सत्कार एवं पूजन करके उन्होंने सभी नरपतियोंको विदा कर दिया ॥ ५१ ॥
युधिष्ठिराभ्यनुज्ञातास्ते नृपा हृष्टमानसाः ।
जग्मुः स्वदेशांस्त्वरिता यानैरुच्चावचैस्ततः ॥ ५२ ॥
राजा युधिष्ठिरकी आज्ञा ले वे सब नरेश मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न हो अनेक प्रकारकी सवारियोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक अपने-अपने देशको चले गये ॥ ५२ ॥
एवं पुरुषशार्दूलो महाबुद्धिर्जनार्दनः ।

पाण्डवैर्घातयामास जरासंधमरिं तदा ।। ५३ ।। जनमेजय! इस प्रकार महाबुद्धिमान् पुरुषसिंह जनार्दनने उस समय पाण्डवोंद्वारा अपने शत्रु जरासंधका वध करवाया ।। ५३ ।। घातयित्वा जरासंधं बुद्धिपूर्वमरिंदमः । धर्मराजमनुज्ञाप्य पृथां कृष्णां च भारत ।। ५४ ।। सुभद्रां भीमसेनं च फाल्गुनं यमौ तथा । धौम्यमामन्त्रयित्वा च प्रययौ स्वां पुरीं प्रति ।। ५५ ।। तेनैव रथमुख्येन मनसस्तुल्यगामिना । धर्मराजविसृष्टेन दिव्येनानादयन् दिशः ।। ५६ ।। भारत! जरासंधको बुद्धिपूर्वक मरवाकर शत्रुदमन श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर, कुन्ती तथा द्रौपदीसे आज्ञा ले, सुभद्रा, भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा धौम्यजीसे भी पूछकर धर्मराजके दिये हुए उसी मनके समान वेगशाली दिव्य एवं उत्तम रथके द्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते हुए अपनी द्वारकापुरीको चले गये ।। ५४-५६ ।। ततो युधिष्ठिरमुखाः पाण्डवा भरतर्षभ । प्रदक्षिणमकुर्वन्त कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ।। ५७ ।। भरतश्रेष्ठ! जाते समय युधिष्ठिर आदि समस्त पाण्डवोंने अनायास ही सब कार्य करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी परिक्रमा की ।। ५७ ।। ततो गते भगवति कृष्णे देवकिनन्दने । जयं लब्ध्वा सुविपुलं राज्ञां दत्त्वाभयं तदा ।। ५८ ।। संवर्धितं यशो भूयः कर्मणा तेन भारत । द्रौपद्याः पाण्डवा राजन् परां प्रीतिमवर्धयन् ।। ५९ ।। भारत! महान् विजयको प्राप्त करके और जरासंधके द्वारा कैद किये हुए उन राजाओंको अभयदान देकर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके चले जानेपर उक्त कर्मके द्वारा पाण्डवोंके यशका बहुत विस्तार हुआ और वे पाण्डव द्रौपदीकी भी प्रीतिको बढ़ाने लगे ।। ५८-५९ ।। तस्मिन् काले तु यद् युक्तं धर्मकामार्थसंहितम् । तद् राजा धर्मतश्चक्रे प्रजापालनकीर्तनम् ।। ६० ।। उस समय धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये जो उचित कर्तव्य था, उसका राजा युधिष्ठिरने धर्मपूर्वक पालन किया। वे प्रजाओंकी रक्षा करनेके साथ ही उन्हें धर्मका उपदेश भी देते रहते थे ।। ६० ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि जरासंधवधपर्वणि जरासंधवधे चतुर्विंशोऽध्यायः ।। २४ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत जरासंधवधपर्वमें जरासंधवधविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २४ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ श्लोक मिलाकर कुल ८६ श्लोक हैं)


* नरकट बेंतकी तरह पोले डंठलका एक पौधा होता है, जो कलम बनानेके काम आता है।

(दिग्विजयपर्व)

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(दिग्विजयपर्व)

पञ्चविंशोऽध्यायः

अर्जुन आदि चारों भाइयोंकी दिग्विजयके लिये यात्रा

वैशम्पायन उवाच

पार्थः प्राप्य धनुः श्रेष्ठमक्षय्यौ च महेषुधी । रथं ध्वजं सभां चैव युधिष्ठिरमभाषत ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! अर्जुन श्रेष्ठ धनुष, दो विशाल एवं अक्षय तूणीर, दिव्य रथ, ध्वज और अद्भुत सभाभवन पहले ही प्राप्त कर चुके थे; अब वे युधिष्ठिरसे बोले ।। १ ।।

अर्जुन उवाच

धनुरस्त्रं शरा वीर्यं पक्षो भूमिर्यशो बलम् । प्राप्तमेतन्मया राजन् दुष्प्रापं यदभीप्सितम् ।। २ ।। अर्जुनने कहा— राजन्! मुझे धनुष, अस्त्र, बाण, पराक्रम, श्रीकृष्ण-जैसे सहायक, भूमि (राज्य एवं इन्द्रप्रस्थका दुर्ग), यश और बल—ये सभी दुर्लभ एवं मनोवांछित वस्तुएँ प्राप्त हो चुकी हैं ।। २ ।।

तत्र कृत्यमहं मन्ये कोशस्य परिवर्धनम् । करमाहारयिष्यामि राज्ञः सर्वान् नृपोत्तम ।। ३ ।। नृपश्रेष्ठ! अब मैं अपने कोषको बढ़ाना ही आवश्यक कार्य समझता हूँ। मेरी इच्छा है कि समस्त राजाओंको जीतकर उनसे कर वसूल करूँ ।। ३ ।।

विजयाय प्रयास्यामि दिशं धनदपालिताम् । तिथावथ मुहूर्ते च नक्षत्रे चाभिपूजिते ।। ४ ।। आपकी आज्ञा हो तो उत्तम तिथि, मुहूर्त और नक्षत्रमें कुबेरद्वारा पालित उत्तर दिशाको जीतनेके लिये प्रस्थान करूँ ।। ४ ।।

(एतच्छ्रुत्वा कुरुश्रेष्ठो धर्मराजः सहानुजः । प्रहृष्टो मन्त्रिभिश्चैव व्यासधौम्यादिभिः सह ।। ततो व्यासो महाबुद्धिरुवाचेदं वचोऽर्जुनम् ।

यह सुनकर भाइयोंसहित कुरुश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरको बड़ी प्रसन्नता हुई। साथ ही मन्त्रियों तथा व्यास, धौम्य आदि महर्षियोंको बड़ा हर्ष हुआ। तत्पश्चात् परम बुद्धिमान् व्यासजीने अर्जुनसे कहा।

व्यास उवाच

साधु साध्विति कौन्तेय दिष्ट्या ते बुद्धिरीदृशी ।
पृथिवीमखिलां जेतुमेकोऽध्यवसितो भवान् ॥
व्यासजी बोले— कुन्तीनन्दन! मैं तुम्हें बारंबार साधुवाद देता हूँ। सौभाग्यसे तुम्हारी बुद्धिमें ऐसा संकल्प हुआ है। तुम सारी पृथ्वीको अकेले ही जीतनेके लिये उत्साहित हो रहे हो।
धन्यः पाण्डुर्महीपालो यस्य पुत्रस्त्वमीदृशः ।
सर्वं प्राप्स्यति राजेन्द्रो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥
त्वद्वीर्येण स धर्मात्मा सार्वभौमत्वमेष्यति ।
राजा पाण्डु धन्य थे, जिनके पुत्र तुम ऐसे पराक्रमी निकले। तुम्हारे पराक्रमसे धर्मपुत्र धर्मात्मा महाराज युधिष्ठिर सब कुछ पा लेंगे। सार्वभौम सम्राट्के पदपर प्रतिष्ठित होंगे।
त्वद्बाहुबलमाश्रित्य राजसूयमवाप्स्यति ॥
सुनयाद् वासुदेवस्य भीमार्जुनबलेन च ।
यमयोश्चैव वीर्येण सर्वं प्राप्स्यति धर्मराट् ॥
तुम्हारे बाहुबलका सहारा पाकर ये राजसूययज्ञ पूर्ण कर लेंगे। भगवान् श्रीकृष्णकी उत्तम नीति, भीम और अर्जुनके बल तथा नकुल और सहदेवके पराक्रमसे धर्मराज युधिष्ठिरको सब कुछ प्राप्त हो जायगा।
तस्माद् दिशं देवगुप्तामुदीचीं गच्छ फाल्गुन ।
शक्तो भवान् सुराञ्जित्वा रत्नान्याहर्तुमोजसा ॥
इसलिये अर्जुन! तुम तो देवताओंद्वारा सुरक्षित उत्तर दिशाकी यात्रा करो; क्योंकि देवताओंको जीतकर वहाँसे बलपूर्वक रत्न ले आनेमें तुम्हीं समर्थ हो।
प्राचीं भीमो बलश्लाघी प्रयातु भरतर्षभः ।
याम्यां तत्र दिशं यातु सहदेवो महारथः ॥
प्रतीचीं नकुलो गन्ता वरुणेनाभिपालिताम् ।
एषा मे नैष्ठिकी बुद्धिः क्रियतां भरतर्षभाः ॥
अपने बलद्वारा दूसरोंसे होड़ लेनेवाले भरतकुल-भूषण भीमसेन पूर्व दिशाकी यात्रा करें। महारथी सहदेव दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान करें और नकुल वरुणपालित पश्चिम दिशापर आक्रमण करें। भरतश्रेष्ठ पाण्डवो! मेरी बुद्धिका ऐसा ही निश्चय है। तुमलोग इसका पालन करो।

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा व्यासवचो हृष्टास्तमूचुः पाण्डुनन्दनाः ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! व्यासजीकी यह बात सुनकर पाण्डवोंने बड़े हर्षके साथ कहा।

पाण्डवा ऊचुः

एवमस्तु मुनिश्रेष्ठ यथाऽऽज्ञापयसि प्रभो ।)
**पाण्डव बोले—**मुनिश्रेष्ठ! आप जैसी आज्ञा देते हैं वैसा ही हो।

वैशम्पायन उवाच

धनंजयवचः श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
स्निग्धगम्भीरनादिन्या तं गिरा प्रत्यभाषत ॥ ५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अर्जुनकी पूर्वोक्त बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर स्नेहयुक्त गम्भीर वाणीमें उनसे इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥

स्वस्तिवाच्यार्हतो विप्रान् प्रयाहि भरतर्षभ ।
दुहृदामप्रहर्षाय सुहृदां नन्दनाय च ॥ ६ ॥
‘भरतकुलभूषण! पूजनीय ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर यात्रा करो। तुम्हारी यह यात्रा शत्रुओंका शोक और सुहृदोंका आनन्द बढ़ानेवाली हो ॥ ६ ॥

विजयस्ते ध्रुवं पार्थ प्रियं काममवाप्स्यसि ।
‘पार्थ! तुम्हारी विजय सुनिश्चित है, तुम अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त करोगे’ ॥ ६½ ॥

इत्युक्तः प्रययौ पार्थः सैन्येन महताऽऽवृतः ॥ ७ ॥
अग्निदत्तेन दिव्येन रथेनाद्भुतकर्मणा ।
तथैव भीमसेनोऽपि यमौ च पुरुषर्षभौ ॥ ८ ॥
ससैन्याः प्रययुः सर्वे धर्मराजेन पूजिताः ।
उनके इस प्रकार आदेश देनेपर कुन्तीपुत्र अर्जुन विशाल सेनाके साथ अग्निके दिये हुए अद्भुतकर्मा दिव्य रथद्वारा वहाँसे प्रस्थित हुए। इसी प्रकार भीमसेन तथा नरश्रेष्ठ नकुल-सहदेव—इन सभी भाइयोंने धर्मराजसे सम्मानित हो सेनाओंके साथ दिग्विजयके लिये प्रस्थान किया ॥ ७-८½ ॥

दिशं धनपतेरिष्टामजयत् पाकशासनिः ॥ ९ ॥
भीमसेनस्तथा प्राचीं सहदेवस्तु दक्षिणाम् ।
प्रतीचीं नकुलो राजन् दिशं व्यजयतास्त्रवित् ॥ १० ॥
राजन्! इन्द्रकुमार अर्जुनने कुबेरकी प्रिय उत्तर दिशापर विजय पायी। भीमसेनने पूर्व दिशा, सहदेवने दक्षिण दिशा तथा अस्त्रवेत्ता नकुलने पश्चिम दिशाको जीता ॥ ९-१० ॥

खाण्डवप्रस्थमध्यस्थो धर्मराजो युधिष्ठिरः । आसीत् परमया लक्ष्म्या सुहृद्गणवृतः प्रभुः ॥ ११ ॥ केवल धर्मराज युधिष्ठिर सुहृदोंसे घिरे हुए अपनी उत्तम राजलक्ष्मीके साथ खाण्डवप्रस्थमें रह गये थे ॥ ११ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि दिग्विजयसंक्षेपकथने पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें दिग्विजयका संक्षिप्त वर्णनविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २० १/३ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 1784)

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षड्विंशोऽध्यायः

अर्जुनके द्वारा अनेक देशों, राजाओं तथा भगदत्तकी पराजय

जनमेजय उवाच दिशामभिजयं ब्रह्मन् विस्तरेणानुकीर्तय ।
न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ॥ १ ॥
**जनमेजय बोले—**ब्रह्मन्! दिग्विजयका विस्तार-पूर्वक वर्णन कीजिये। अपने पूर्वजोंके इस महान् चरित्रको सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच धनंजयस्य वक्ष्यामि विजयं पूर्वमेव ते ।
यौगपद्येन पार्थैर्हि निर्जितेयं वसुंधरा ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! यद्यपि कुन्तीके चारों पुत्रोंने एक ही समय इन चारों दिशाओंकी पृथ्वीपर विजय प्राप्त की थी, तो भी पहले तुम्हें अर्जुनका दिग्विजयवृत्तान्त सुनाऊँगा ॥ २ ॥

पूर्वं कुलिन्दविषये वशे चक्रे महीपतीन् ।
धनंजयो महाबाहुर्नातितीव्रेण कर्मणा ॥ ३ ॥
महाबाहु धनंजयने अत्यन्त दुःसह पराक्रम प्रकट किये बिना ही पहले कुलिन्द देशके भूमिपालोंको अपने वशमें किया ॥ ३ ॥

आनर्तान् कालकूटांश्च कुलिन्दांश्च विजित्य सः ।
सुमण्डलं च विजितं कृतवान् सहसैनिकम् ॥ ४ ॥
कुलिन्दोंके साथ-साथ कालकूट और आनर्त देशके राजाओंको जीतकर सेनासहित राजा सुमण्डलको भी जीत लिया ॥ ४ ॥

स तेन सहितो राजन् सव्यसाची परंतपः ।
विजिग्ये शाकलं द्वीपं प्रतिविन्ध्यं च पार्थिवम् ॥ ५ ॥
राजन्! तदनन्तर शत्रुओंको संताप देनेवाले सव्यसाची अर्जुनने सुमण्डलको साथी बना लिया और उनके साथ जाकर शाकलद्वीप तथा राजा प्रतिविन्ध्य-पर विजय प्राप्त की ॥ ५ ॥

शाकलद्वीपवासाश्च सप्तद्वीपेषु ये नृपाः ।
अर्जुनस्य च सैन्यैस्तैर्विग्रहस्तुमुलोऽभवत् ॥ ६ ॥

शाकलद्वीप तथा अन्य सातों द्वीपोंमें जो राजा रहते थे, उनके साथ अर्जुनके सैनिकोंका घमासान युद्ध हुआ ।। ६ ।। स तानपि महेष्वासान् विजिग्ये भरतर्षभ । तैरेव सहितः सर्वैः प्राग्ज्योतिषमुपादद्रवत् ।। ७ ।। भरतकुलभूषण जनमेजय! अर्जुनने उन महान् धनुर्धरोंको भी जीत लिया और उन सबको साथ लेकर प्राग्ज्योतिषपुरपर धावा किया ।। ७ ।। तत्र राजा महानासीद् भगदत्तो विशाम्पते । तेनासीत् सुमहद् युद्धं पाण्डवस्य महात्मनः ।। ८ ।। महाराज! प्राग्ज्योतिषपुरके प्रधान राजा भगदत्त थे। उनके साथ महात्मा अर्जुनका बड़ा भारी युद्ध हुआ ।। ८ ।। स किरातैश्च चीनैश्च वृतः प्राग्ज्योतिषोऽभवत् । अन्यैश्च बहुभिर्योधैः सागरानूपवासिभिः ।। ९ ।। प्राग्ज्योतिषपुरके नरेश किरात, चीन तथा समुद्रके टापुओंमें रहनेवाले अन्य बहुतेरे योद्धाओंसे घिरे हुए थे ।। ९ ।। ततः स दिवसानष्टौ योधयित्वा धनंजयम् । प्रहसन्नब्रवीद् राजा संग्रामविगतक्लमम् ।। १० ।। राजा भगदत्तने अर्जुनके साथ आठ दिनोंतक युद्ध किया, तो भी उन्हें युद्धसे थकते न देख वे हँसते हुए बोले— ।। १० ।। उपपन्नं महाबाहो त्वयि कौरवनन्दन । पाकशासनदायादे वीर्यमाहवशोभिनि ।। ११ ।। ‘महाबाहु कौरवनन्दन! तुम इन्द्रके पुत्र और संग्राममें शोभा पानेवाले शूरवीर हो। तुममें ऐसा बल और पराक्रम उचित ही है ।। ११ ।। अहं सखा महेन्द्रस्य शक्रादनवरो रणे । न शक्ष्यामि च ते तात स्थातुं प्रमुखतो युधि ।। १२ ।। ‘मैं देवराज इन्द्रका मित्र हूँ और युद्धमें उनसे तनिक भी कम नहीं हूँ, बेटा! तो भी मैं संग्राममें तुम्हारे सामने खड़ा नहीं हो सकूँगा ।। १२ ।। त्वमीप्सितं पाण्डवेय ब्रूहि किं करवाणि ते । यद् वक्ष्यसि महाबाहो तत् करिष्यामि पुत्रक ।। १३ ।। ‘पाण्डुनन्दन! तुम्हारी इच्छा क्या है, बताओ? मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? वत्स! महाबाहो! तुम जो कहोगे, वही करूँगा' ।। १३ ।।

अर्जुन उवाच

कुरूणामृषभो राजा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।

धर्मज्ञः सत्यसंधश्च यज्वा विपुलदक्षिणः ॥ १४ ॥
तस्य पार्थिवतामीप्से करस्तस्मै प्रदीयताम् ।
भवान् पितृसखा चैव प्रीयमाणो मयापि च ।
ततो नाज्ञापयामि त्वां प्रीतिपूर्वं प्रदीयताम् ॥ १५ ॥
अर्जुन बोले— महाराज! धर्मज्ञ सत्यप्रतिज्ञ कुरु-कुलरत्न धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर बहुत दक्षिणा देकर राजसूययज्ञ करनेवाले हैं। मैं चाहता हूँ वे चक्रवर्ती सम्राट् हों। आप उन्हें कर दीजिये। आप मेरे पिताके मित्र हैं और मुझसे भी प्रेम रखते हैं; अतः मैं आपको आज्ञा नहीं दे सकता। आप प्रेमभावसे ही उन्हें भेंट दीजिये ॥ १४-१५ ॥

भगदत्त उवाच

कुन्तीमातर्यथा मे त्वं तथा राजा युधिष्ठिरः ।
सर्वमेतत् करिष्यामि किं चान्यत् करवाणि ते ॥ १६ ॥
भगदत्तने कहा— कुन्तीकुमार! मेरे लिये जैसे तुम हो वैसे राजा युधिष्ठिर हैं, मैं यह सब कुछ करूँगा। बोलो, तुम्हारे लिये और क्या करूँ? ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि अर्जुनदिग्विजये भगदत्तपराजये
षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें अर्जुनदिग्विजयप्रसंगमें भगदत्तपराजयसम्बन्धी छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥

अर्जुनका अनेक पर्वतीय देशोंपर विजय पाना

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सप्तविंशोऽध्यायः

अर्जुनका अनेक पर्वतीय देशोंपर विजय पाना

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः प्रत्युवाच भगदत्तं धनंजयः ।
अनेनैव कृतं सर्वमनुजानीहि याम्यहम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! उनके ऐसा कहनेपर धनंजयने भगदत्तसे कहा—‘राजन्! आपने जो कर देना स्वीकार कर लिया, इतनेसे ही मेरा सब सत्कार हो जायगा, अब आज्ञा दीजिये, मैं जाता हूँ' ॥ १ ॥

तं विजित्य महाबाहुः कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
प्रययावुत्तरां तस्माद् दिशं धनदपालिताम् ॥ २ ॥
भगदत्तको जीतकर महाबाहु कुन्तीपुत्र अर्जुन वहाँसे कुबेरद्वारा सुरक्षित उत्तर दिशामें गये ॥ २ ॥

अन्तर्गिरिं च कौन्तेयस्तथैव च बहिर्गिरिम् ।
तथैवोपगिरिं चैव विजिग्ये पुरुषर्षभः ॥ ३ ॥
कुरुश्रेष्ठ धनंजयने क्रमशः अन्तर्गिरि, बहिर्गिरि और उपगिरि नामक प्रदेशोंपर विजय प्राप्त की ॥ ३ ॥

विजित्य पर्वतान् सर्वान् ये च तत्र नराधिपाः ।
तान् वशे स्थापयित्वा स धनान्यादाय सर्वशः ॥ ४ ॥
फिर समस्त पर्वतों और वहाँ निवास करनेवाले राजाओंको अपने अधीन करके उन्होंने सबसे धन वसूल किये ॥ ४ ॥

तैरेव सहितः सर्वैरनुरज्य च तान् नृपान् ।
उलूकवासिनं राजन् बृहन्तमुपजग्मिवान् ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् उन नरेशोंको प्रसन्न करके उन सबके साथ उलूकवासी राजा बृहन्तपर आक्रमण किया ॥ ५ ॥

मृदङ्गवरनादेन रथनेमिस्वनेन च ।
हस्तिनां च निनादेन कम्पयन् वसुधामिमाम् ॥ ६ ॥
जुझारू बाजे, श्रेष्ठ मृदंग आदिकी ध्वनि, रथके पहियोंकी घर्घराहट और हाथियोंकी गर्जनासे वे इस पृथ्वीको कँपाते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ ६ ॥

ततो बृहन्तस्त्वरितो बलेन चतुरङ्गिणा ।
निष्क्रम्य नगरात् तस्माद् योधयामास फाल्गुनम् ॥ ७ ॥