भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1796, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1796

सेवितं देवकल्पैश्च नारीभिः प्रियदर्शनैः ॥ उधर जाकर अर्जुनने नागोंद्वारा सुरक्षित प्रदेशपर विजय पायी। महाराज! वहाँसे और पश्चिम जाकर शक्तिशाली अर्जुन गन्धमादन पर्वतपर पहुँच गये और वहाँके रहनेवालोंको जीतकर अपने अधीन बना लिया। राजन्! इस प्रकार गन्धमादन पर्वतको लाँघकर अर्जुन रत्नोंसे सम्पन्न केतुमालवर्षमें गये, जो देवोपम पुरुषों और सुन्दरी स्त्रियोंकी निवासभूमि है। तं जित्वा चार्जुनो राजन् करे च विनिवेश्य च । आहृत्य तत्र रत्नानि दुर्लभानि तथार्जुनः ॥ पुनश्च परिवृत्याथ मध्यं देशमिलावृतम् । राजन्! उस वर्षको जीतकर अर्जुनने उसे कर देनेवाला बना दिया और वहाँसे दुर्लभ रत्न लेकर वे पुनः मध्यवर्ती इलावृतवर्षमें लौट आये। गत्वा प्राचीं दिशं राजन् सव्यसाची परंतपः ॥ मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् । ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते ॥ खशाञ्झषांश्च नद्योतान् प्रघसान् दीर्घवेणिकान् । पशूपांश्च कुलिन्दांश्च तङ्गणान् परतङ्गणान् ॥ रत्नान्यादाय सर्वेभ्यो माल्यवन्तं ततो ययौ । तं माल्यवन्तं शैलेन्द्रं समतिक्रम्य पाण्डवः ॥ भद्राश्वं प्रविवेशाथ वर्षं स्वर्गोपमं शुभम् । तदनन्तर शत्रुदमन सव्यसाची अर्जुनने पूर्व दिशामें प्रस्थान किया। मेरु और मन्दराचलके बीच शैलोदा नदीके दोनों तटोंपर जो लोग कीचक और वेणु नामक बाँसोंकी रमणीय छायाका आश्रय लेकर रहते हैं, उन खश, झष, नद्योत, प्रघस, दीर्घवेणिक, पशुप, कुलिन्द, तंगण तथा परतंगण आदि जातियोंको हराकर उन सबसे रत्नोंकी भेंट ले अर्जुन माल्यवान् पर्वतपर गये। तत्पश्चात् गिरिराज माल्यवान्को भी लाँघकर उन पाण्डुकुमारने भद्राश्ववर्षमें प्रवेश किया, जो स्वर्गके समान सुन्दर है। तत्रामरोपमान् रम्यान् पुरुषान् सुखसंयुतान् ॥ जित्वा तान् स्ववशे कृत्वा करे च विनिवेश्य च । आहृत्य सर्वरत्नानि असंख्यानि ततस्ततः ॥ नीलं नाम गिरिं गत्वा तत्रस्थानजयत् प्रभुः । उस देशमें देवताओंके समान सुन्दर और सुखी पुरुष निवास करते थे। अर्जुनने उन सबको जीतकर अपने अधीन कर लिया और उनपर कर लगा दिया। इस प्रकार इधर-उधरसे असंख्य रत्नोंका संग्रह करके शक्तिशाली अर्जुनने नीलगिरिकी यात्रा की और वहाँके निवासियोंको पराजित किया। ततो जिष्णुरतिक्रम्य पर्वतं नीलमायतम् ॥

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