भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1797, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1797

विवेश रम्यकं वर्षं संकीर्णं मिथुनैः शुभैः । तं देशमथ जित्वा च करे च विनिवेश्य च ॥ अजयच्चापि बीभत्सुर्देशं गुह्यकरक्षितम् । तत्र लेभे च राजेन्द्र सौवर्णान् मृगपक्षिणः ॥ अगृह्णाद् यज्ञभूत्यर्थं रमणीयान् मनोरमान् । तदनन्तर विशाल नीलगिरिको भी लाँघकर सुन्दर नर-नारियोंसे भरे हुए रम्यकवर्षमें उन्होंने प्रवेश किया। उस देशको भी जीतकर अर्जुनने वहाँके निवासियोंपर कर लगा दिया। तत्पश्चात् गुह्यकोंद्वारा सुरक्षित प्रदेशको जीतकर अपने अधिकारमें कर लिया। राजेन्द्र! वहाँ उन्हें सोनेके मृग और पक्षी उपलब्ध हुए, जो देखनेमें बड़े ही रमणीय और मनोरम थे। उन्होंने यज्ञ-वैभवकी समृद्धिके लिये उन मृगों और पक्षियोंको ग्रहण कर लिया।

अन्यानि लब्ध्वा रत्नानि पाण्डवोऽथ महाबलः ॥ गन्धर्वरक्षितं देशमजयत् सगणं तदा । तत्र रत्नानि दिव्यानि लब्ध्वा राजन्नथार्जुनः ॥ श्वेतपर्वतमासाद्य जित्वा पर्वतवासिनः । स श्वेतं पर्वतं राजन् समतिक्रम्य पाण्डवः ॥ वर्षं हिरण्यकं नाम विवेशाथ महीपते । तदनन्तर महाबली पाण्डुनन्दन अन्य बहुत-से रत्न लेकर गन्धर्वोंद्वारा सुरक्षित प्रदेशमें गये और गन्धर्वगणोंसहित उस देशपर अधिकार जमा लिया। राजन्! वहाँ भी अर्जुनको बहुत-से दिव्य रत्न प्राप्त हुए। तदनन्तर उन्होंने श्वेत पर्वतपर जाकर वहाँके निवासियोंको जीता। फिर उस पर्वतको लाँघकर पाण्डुकुमार अर्जुनने हिरण्यकवर्षमें प्रवेश किया।

स तु देशेषु रम्येषु गन्तुं तत्रोपचक्रमे ॥ मध्ये प्रासादवृन्देषु नक्षत्राणां शशी यथा । महाराज! वहाँ पहुँचकर वे उस देशके रमणीय प्रदेशोंमें विचरने लगे। बड़े-बड़े महलोंकी पंक्तियोंमें भ्रमण करते हुए श्वेताश्व अर्जुन नक्षत्रोंके बीच चन्द्रमाके समान सुशोभित होते थे।

महापथेषु राजेन्द्र सर्वतो यान्तमर्जुनम् ॥ प्रासादवरशृङ्गस्थाः परया वीर्यशोभया । ददृशुस्ताः स्त्रियः सर्वाः पार्थमात्मयशस्करम् ॥ तं कलापधरं शूरं सरथं सानुगं प्रभुम् । सवर्मसुकिरीटं वै संनद्धं सपरिच्छदम् ॥ सुकुमारं महासत्त्वं तेजोराशिमनुत्तमम् । शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम् ॥ पश्यन्तः स्त्रीगणास्तत्र शक्तिपाणिं स्म मेनिरे ।

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