महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1799, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंइतनेहीमें महापराक्रमी अर्जुनके पास बहुत-से विशालकाय महाबली द्वारपाल आ पहुँचे और प्रसन्नतापूर्वक बोले— ।। ८ ।।
पार्थ नेदं त्वया शक्यं पुरं जेतुं कथंचन । उपावर्तस्व कल्याण पर्याप्तमिदमच्युत ।। ९ ।। इदं पुरं यः प्रविशेद् ध्रुवं न स भवेन्नरः । प्रीयामहे त्वया वीर पर्याप्तो विजयस्तव ।। १० ।। ‘पार्थ! इस नगरको तुम किसी तरह जीत नहीं सकते। कल्याणस्वरूप अर्जुन! यहाँसे लौट जाओ। अच्युत! तुम यहाँतक आ गये, यही बहुत हुआ। जो मनुष्य इस नगरमें प्रवेश करता है, निश्चय ही उसकी मृत्यु हो जाती है। वीर! हम तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। यहाँतक आ पहुँचना ही तुम्हारी बहुत बड़ी विजय है ।। ९-१० ।।
न चात्र किंचिज्जेतव्यमर्जुनात्र प्रदृश्यते । उत्तराः कुरवो ह्येते नात्र युद्धं प्रवर्तते ।। ११ ।। प्रविष्टोऽपि हि कौन्तेय नेह द्रक्ष्यसि किंचन । न हि मानुषदेहेन शक्यमत्राभिवीक्षितुम् ।। १२ ।। ‘अर्जुन! यहाँ कोई जीतनेयोग्य वस्तु नहीं दिखायी देती। यह उत्तर कुरुदेश है। यहाँ युद्ध नहीं होता है। कुन्तीकुमार! इसके भीतर प्रवेश करके भी तुम यहाँ कुछ देख नहीं सकोगे, क्योंकि मानव-शरीरसे यहाँकी कोई वस्तु देखी नहीं जा सकती ।। ११-१२ ।।
अथेह पुरुषव्याघ्र किंचिदन्यच्चिकीर्षसि । तत् प्रब्रूहि करिष्यामो वचनात् तव भारत ।। १३ ।। ‘भरतकुलभूषण पुरुषसिंह! यदि यहाँ तुम युद्धके सिवा और कोई काम करना चाहते हो तो बताओ, तुम्हारे कहनेसे हम स्वयं ही उस कार्यको पूर्ण कर देंगे’ ।। १३ ।।
ततस्तानब्रवीद् राजन्नर्जुनः प्रहसन्निव । पार्थिवत्वं चिकीर्षामि धर्मराजस्य धीमतः ।। १४ ।। राजन्! तब अर्जुनने उनसे हँसते हुए कहा—‘मैं अपने भाई बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरको समस्त भूमण्डलका एकमात्र चक्रवर्ती सम्राट् बनाना चाहता हूँ ।। १४ ।।
न प्रवेक्ष्यामि वो देशं विरुद्धं यदि मानुषैः । युधिष्ठिराय यत् किंचित् करपण्यं प्रदीयताम् ।। १५ ।। ‘आपलोगोंका देश यदि मनुष्योंके विपरीत पड़ता है तो मैं इसमें प्रवेश नहीं करूँगा। महाराज युधिष्ठिरके लिये करके रूपमें कुछ धन दीजिये’ ।। १५ ।।
ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च । क्षौमाजिनानि दिव्यानि तस्य ते प्रददुः करम् ।। १६ ।। तब उन द्वारपालोंने अर्जुनको करके रूपमें बहुत-से दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण तथा दिव्य रेशमी वस्त्र एवं मृगचर्म दिये ।। १६ ।।