महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1800, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवं स पुरुषव्याघ्रो विजित्य दिशमुत्तराम् । संग्रामान् सुबहून् कृत्वा क्षत्रियैर्दस्युभिस्तथा ॥ १७ ॥ स विनिर्जित्य राज्ञस्तान् करे च विनिवेश्य तु । धनान्यादाय सर्वेभ्यो रत्नानि विविधानि च ॥ १८ ॥ हयांस्तित्तिरिकल्माषाञ्छुकपत्रनिभानपि । मयूरसदृशानन्यान सर्वाननिलरंहसः ॥ १९ ॥ वृतः सुमहता राजन् बलेन चतुरङ्गिणाः । आजगाम पुनर्वीरः शक्रप्रस्थं पुरोत्तमम् ॥ २० ॥ इस प्रकार पुरुषसिंह अर्जुनने क्षत्रिय राजाओं तथा लुटेरोंके साथ बहुत-सी लड़ाइयाँ लड़ीं और उत्तर दिशापर विजय प्राप्त की। राजाओंको जीतकर उनसे कर लेते और उन्हें फिर अपने राज्यपर ही स्थापित कर देते थे। राजन्! वे वीर अर्जुन सबसे धन और भाँति-भाँतिके रत्न लेकर तथा भेंटमें मिले हुए वायुके समान वेगवाले तित्तिर,* कल्माष, सुग्गापंखी एवं मोर-सदृश सभी घोड़ोंको साथ लिये और विशाल चतुरंगिणी सेनासे घिरे हुए फिर अपने उत्तम नगर इन्द्रप्रस्थमें लौट आये ॥ १७—२० ॥
धर्मराजाय तत् पार्थो धनं सर्वं सवाहनम् । न्यवेदयदनुज्ञातस्तेन राज्ञा गृहान् ययौ ॥ २१ ॥ पार्थने घोड़ोंसहित वह सारा धन धर्मराजको सौंप दिया और उनकी आज्ञा लेकर वे महलमें चले गये ॥ २१ ॥