महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1808, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्वान् म्लेच्छगणांश्चैव विजिग्ये भरतर्षभः ॥ २५ ॥
तदनन्तर भरतश्रेष्ठ भीमसेनने समुद्रसेन, भूपाल चन्द्रसेन, राजा ताम्रलिप्त, कर्वटाधिपति तथा सुह्मनरेशको जीतकर समुद्रके तटपर निवास करनेवाले समस्त म्लेच्छोंको भी अपने अधीन कर लिया ॥ २४-२५ ॥
एवं बहुविधान् देशान् विजित्य पवनात्मजः ।
वसु तेभ्य उपादाय लौहित्यमगमद् बली ॥ २६ ॥
इस प्रकार पवनपुत्र बलवान् भीमने बहुत-से देशोंपर अधिकार प्राप्त करके उन सबसे धन लेकर लौहित्य देशकी यात्रा की ॥ २६ ॥
स सर्वान् म्लेच्छनृपतीन् सागरानूपवासिनः ।
करमाहारयामास रत्नानि विविधानि च ॥ २७ ॥
वहाँ उन्होंने समुद्रके टापुओंमें रहनेवाले बहुत-से म्लेच्छ राजाओंको जीतकर उनसे करके रूपमें भाँति-भाँतिके रत्न वसूल किये ॥ २७ ॥
चन्दनागुरुवस्त्राणि मणिमौक्तिककम्बलम् ।
काञ्चनं रजतं चैव विद्रुमं च महाधनम् ॥ २८ ॥
ते कोटिशतसंख्येन कौन्तेयं महता तदा ।
अभ्यवर्षन् महात्मानं धनवर्षेण पाण्डवम् ॥ २९ ॥
इतना ही नहीं, उन राजाओंने भीमसेनको चन्दन, अगुरु, वस्त्र, मणि, मोती, कम्बल, सोना, चाँदी और बहुमूल्य मूँगे भेंट किये। कुन्ती और पाण्डुके पुत्र महात्मा भीमसेनके पास उन्होंने करोड़की संख्यामें धन-रत्नोंकी वर्षा की (करके रूपमें धन-रत्न प्रदान किये) ॥ २८-२९ ॥