महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सर्वान् म्लेच्छगणांश्चैव विजिग्ये भरतर्षभः ॥ २५ ॥
तदनन्तर भरतश्रेष्ठ भीमसेनने समुद्रसेन, भूपाल चन्द्रसेन, राजा ताम्रलिप्त, कर्वटाधिपति तथा सुह्मनरेशको जीतकर समुद्रके तटपर निवास करनेवाले समस्त म्लेच्छोंको भी अपने अधीन कर लिया ॥ २४-२५ ॥
एवं बहुविधान् देशान् विजित्य पवनात्मजः ।
वसु तेभ्य उपादाय लौहित्यमगमद् बली ॥ २६ ॥
इस प्रकार पवनपुत्र बलवान् भीमने बहुत-से देशोंपर अधिकार प्राप्त करके उन सबसे धन लेकर लौहित्य देशकी यात्रा की ॥ २६ ॥
स सर्वान् म्लेच्छनृपतीन् सागरानूपवासिनः ।
करमाहारयामास रत्नानि विविधानि च ॥ २७ ॥
वहाँ उन्होंने समुद्रके टापुओंमें रहनेवाले बहुत-से म्लेच्छ राजाओंको जीतकर उनसे करके रूपमें भाँति-भाँतिके रत्न वसूल किये ॥ २७ ॥
चन्दनागुरुवस्त्राणि मणिमौक्तिककम्बलम् ।
काञ्चनं रजतं चैव विद्रुमं च महाधनम् ॥ २८ ॥
ते कोटिशतसंख्येन कौन्तेयं महता तदा ।
अभ्यवर्षन् महात्मानं धनवर्षेण पाण्डवम् ॥ २९ ॥
इतना ही नहीं, उन राजाओंने भीमसेनको चन्दन, अगुरु, वस्त्र, मणि, मोती, कम्बल, सोना, चाँदी और बहुमूल्य मूँगे भेंट किये। कुन्ती और पाण्डुके पुत्र महात्मा भीमसेनके पास उन्होंने करोड़की संख्यामें धन-रत्नोंकी वर्षा की (करके रूपमें धन-रत्न प्रदान किये) ॥ २८-२९ ॥
इन्द्रप्रस्थमुपागम्य भीमो भीमपराक्रमः । निवेदयामास तदा धर्मराजाय तद् धनम् ॥ ३० ॥
तदनन्तर भयानक पराक्रमी भीमने इन्द्रप्रस्थमें आकर वह सारा धन धर्मराजको सौंप दिया ।। ३० ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि भीमप्राचीदिग्विजये त्रिंशोऽध्यायः ।। ३० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें भीमके द्वारा पूर्व दिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३० ।।
अध्याय (पृष्ठ 1810)
एकत्रिंशोऽध्यायः
सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजय
वैशम्पायन उवाच
तथैव सहदेवोऽपि धर्मराजेन पूजितः ।
महत्या सेनया राजन् प्रययौ दक्षिणां दिशम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सहदेव भी धर्मराज युधिष्ठिरसे सम्मानित हो दक्षिण दिशापर विजय पानेके लिये विशाल सेनाके साथ प्रस्थित हुए ॥ १ ॥
स शूरसेनान् कात्स्न्र्येन पूर्वमेवाजयत् प्रभुः ।
मत्स्यराजं च कौरव्यो वशे चक्रे बलाद् बली ॥ २ ॥
शक्तिशाली सहदेवने सबसे पहले समस्त शूरसेननिवासियोंको पूर्णरूपसे जीत लिया; फिर मत्स्यराज विराटको अपने अधीन बनाया ॥ २ ॥
अधिराजाधिपं चैव दन्तवक्रं महाबलम् ।
जिगाय करदं चैव कृत्वा राज्ये न्यवेशयत् ॥ ३ ॥
राजाओंके अधिपति महाबली दन्तवक्रको भी परास्त किया और उसे कर देनेवाला बनाकर फिर उसी राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया ॥ ३ ॥
सुकुमारं वशे चक्रे सुमित्रं च नराधिपम् ।
तथैवापरमत्स्यांश्च व्यजयत् स पटच्चरान् ॥ ४ ॥
निषादभूमिं गोशृङ्गं पर्वतप्रवरं तथा ।
तरसैवाजयद् धीमान् श्रेणिमन्तं च पार्थिवम् ॥ ५ ॥
इसके बाद राजा सुकुमार तथा सुमित्रको वशमें किया। इसी प्रकार अपर मत्स्यों और लुटेरोंपर भी विजय प्राप्त की। तदनन्तर निषाददेश तथा पर्वतप्रवर गोशृंगको जीतकर बुद्धिमान् सहदेवने राजा श्रेणिमान्को वेगपूर्वक परास्त किया ॥ ४-५ ॥
नरराष्ट्रं च निर्जित्य कुन्तिभोजमुपाद्रवत् ।
प्रीतिपूर्वं च तस्यासौ प्रतिजग्राह शासनम् ॥ ६ ॥
फिर नरराष्ट्रको जीतकर राजा कुन्तिभोजपर धावा किया। परंतु कुन्तिभोजने प्रसन्नताके साथ ही उसका शासन स्वीकार कर लिया ॥ ६ ॥
ततश्चर्मणवतीकूले जम्भकस्यात्मजं नृपम् ।
ददर्श वासुदेवेन शेषितं पूर्ववैरिणा ॥ ७ ॥
इसके बाद चर्मण्वतीके तटपर सहदेवने जम्भकके पुत्रको देखा, जिसे पूर्ववैरी वासुदेवने जीवित छोड़ दिया था ॥ ७ ॥
चक्रे तेन स संग्रामं सहदेवेन भारत ।
स तमाजौ विनिर्जित्य दक्षिणाभिमुखो ययौ ॥ ८ ॥
भारत! उस जम्भकपुत्रने सहदेवके साथ घोर संग्राम किया; परंतु सहदेव उसे युद्धमें जीतकर दक्षिण दिशाकी ओर बढ़ गये ॥ ८ ॥
सेकानपरसेकांश्च व्यजयत् सुमहाबलः ।
करं तेभ्य उपादाय रत्नानि विविधानि च ॥ ९ ॥
ततस्तेनैव सहितो नर्मदामभितो ययौ ।
वहाँ महाबली माद्रीकुमारने सेक और अपरसेक देशोंपर विजय पायी और उन सबसे नाना प्रकारके रत्न भेंटमें लिये। तत्पश्चात् सेकाधिपतिको साथ ले उन्होंने नर्मदाकी ओर प्रस्थान किया ॥ ९ १/२ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ सैन्येन महताऽऽवृतौ ।
जिगाय समरे वीरावाश्विनेयः प्रतापवान् ॥ १० ॥
अश्विनीकुमारोंके पुत्र प्रतापी सहदेवने वहाँ युद्धमें विशाल सेनासे घिरे हुए अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्दको परास्त किया ॥ १० ॥
ततो रत्नान्युपादाय पुरं भोजकटं ययौ ।
तत्र युद्धमभूद् राजन् दिवसद्वयमच्युत ॥ ११ ॥
वहाँसे रत्नोंकी भेंट लेकर वे भोजकट नगरमें गये। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले राजन्! वहाँ दो दिनोंतक युद्ध होता रहा ॥ ११ ॥
स विजित्य दुराधर्षं भीष्मकं माद्रिनन्दनः ।
कोसलाधिपतिं चैव तथा वेणातटाधिपम् ॥ १२ ॥
कान्तारकांश्च समरे तथा प्राक्कोसलान् नृपान् ।
नाटकेयांश्च समरे तथा हेरम्बकान् युधि ॥ १३ ॥
माद्रीनन्दनने उस संग्राममें दुर्धर्ष वीर भीष्मकको परास्त करके कोसलाधिपति, वेणानदीके तटवर्ती प्रदेशोंके स्वामी, कान्तारक तथा पूर्वकोसलके राजाओंको भी समरमें पराजित किया। तत्पश्चात् नाटकेयों और हेरम्बकोंको भी युद्धमें हराया ॥ १२-१३ ॥
मारुधं च विनिर्जित्य रम्यग्राममथो बलात् ।
नाचीनानर्बुकांश्चैव राज्ञश्चैव महाबलः ॥ १४ ॥
तांस्तानाटविकान् सर्वानजयत् पाण्डुनन्दनः ।
वाताधिपं च नृपतिं वशे चक्रे महाबलः ॥ १५ ॥
महाबली पाण्डुनन्दन सहदेवने मारुध तथा रम्यग्रामको बलपूर्वक परास्त करके नाचीन, अर्बुक तथा समस्त वनेचर राजाओंको जीत लिया। तदनन्तर महाबली माद्रीकुमारने राजा वाताधिपको वशमें किया ॥ १४-१५ ॥
पुलिन्दांश्च रणे जित्वा ययौ दक्षिणतः पुरः ।
युयुधे पाण्ड्यराजेन दिवसं नकुलानुजः ॥ १६ ॥
फिर पुलिन्दोंको संग्राममें हराकर नकुलके छोटे भाई सहदेव दक्षिण दिशामें और आगे बढ़ गये। तत्पश्चात् उन्होंने पाण्ड्य-नरेशके साथ एक दिन युद्ध किया ॥ १६ ॥ तं जित्वा स महाबाहुः प्रययौ दक्षिणापथम् । गुहामासादयामास किष्किन्धां लोकविश्रुताम् ॥ १७ ॥ उन्हें जीतकर महाबाहु सहदेव दक्षिणापथकी ओर गये और लोकविख्यात किष्किन्धा नामक गुफामें जा पहुँचे ॥ १७ ॥ तत्र वानरराजाभ्यां मैन्देन द्विविदेन च । युयुधे दिवसान् सप्त न च तौ विकृतिं गतौ ॥ १८ ॥ वहाँ वानरराज मैन्द और द्विविदके साथ उन्होंने सात दिनोंतक युद्ध किया; किंतु उन दोनोंका कुछ बिगाड़ न हो सका ॥ १८ ॥ ततस्तुष्टौ महात्मानौ सहदेवाय वानरौ । ऊचतुश्चैव संहृष्टौ प्रीतिपूर्वमिदं वचः ॥ १९ ॥ तब वे दोनों महात्मा वानर अत्यन्त प्रसन्न हो सहदेवसे प्रेमपूर्वक बोले— ॥ १९ ॥ गच्छ पाण्डवशार्दूल रत्नान्यादाय सर्वशः । अविघ्नमस्तु कार्याय धर्मराजाय धीमते ॥ २० ॥ ‘पाण्डवप्रवर! तुम सब प्रकारके रत्नोंकी भेंट लेकर जाओ। परम बुद्धिमान् धर्मराजके कार्यमें कोई विघ्न नहीं पड़ना चाहिये' ॥ २० ॥ ततो रत्नान्युपादाय पुरीं माहिष्मतीं ययौ । तत्र नीलेन राज्ञा स चक्रे युद्धं नरर्षभः ॥ २१ ॥ तदनन्तर वे नरश्रेष्ठ वहाँसे रत्नोंकी भेंट लेकर माहिष्मतीपुरीको गये और वहाँ राजा नीलके* साथ घोर युद्ध किया ॥ २१ ॥ पाण्डवः परवीरघ्नः सहदेवः प्रतापवान् । ततोऽस्य सुमहद् युद्धमासीद् भीरुभयंकरम् ॥ २२ ॥ सैन्यक्षयकरं चैव प्राणानां संशयावहम् । चक्रे तस्य हि साहाय्यं भगवान् हव्यवाहनः ॥ २३ ॥ शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले पाण्डुपुत्र सहदेव बड़े प्रतापी थे। उनसे राजा नीलका जो महान् युद्ध हुआ, वह कायरोंको भयभीत करनेवाला, सेनाओंका विनाशक और प्राणोंको संशयमें डालनेवाला था। भगवान् अग्निदेव राजा नीलकी सहायता कर रहे थे ॥ २२-२३ ॥ ततो रथा हया नागाः पुरुषाः कवचानि च । प्रदीप्तानि व्यदृश्यन्त सहदेवबले तदा ॥ २४ ॥ उस समय सहदेवकी सेनामें रथ, घोड़े, हाथी, मनुष्य और कवच सभी आगसे जलते दिखायी देने लगे ॥ २४ ॥ ततः सुसम्भ्रान्तमना बभूव कुरुनन्दनः ।
नोत्तरं प्रतिवक्तुं च शक्तोऽभूज्जनमेजय ।। २५ ।।
जनमेजय! इससे कुरुनन्दन सहदेवके मनमें बड़ी घबराहट हुई। वे इसका प्रतीकार करनेमें असमर्थ हो गये ।। २५ ।।
जनमेजय उवाच
किमर्थं भगवान् वह्निः प्रत्यमित्रोऽभवद् युधि ।
सहदेवस्य यज्ञार्थं घटमानस्य वै द्विज ।। २६ ।।
जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! सहदेव तो यज्ञके लिये ही चेष्टा कर रहे थे, फिर भगवान् अग्निदेव उस युद्धमें उनके विरोधी कैसे हो गये? ।। २६ ।।
वैशम्पायन उवाच
तत्र माहिष्मतीवासी भगवान् हव्यवाहनः ।
श्रूयते हि गृहीतो वै पुरस्तात् पारदारिकः ।। २७ ।।
वैशम्पायनजीने कहा—जनमेजय! सुननेमें आया है कि माहिष्मती नगरीमें निवास करनेवाले भगवान् अग्निदेव किसी समय उस नील राजाकी कन्या सुदर्शनाके प्रति आसक्त हो गये ।। २७ ।।
नीलस्य राज्ञो दुहिता बभूवातीवशोभना ।
साग्निहोत्रमुपातिष्ठद् बोधनाय पितुः सदा ।। २८ ।।
राजा नीलके एक कन्या थी, जो अनुपम सुन्दरी थी। वह सदा अपने पिताके अग्निहोत्रगृहमें अग्निको प्रज्वलित करनेके लिये उपस्थित हुआ करती थी ।। २८ ।।
व्यजनैर्धूयमानोऽपि तावत् प्रज्वलते न सः ।
यावच्चारुपुटौष्ठेन वायुना न विधूयते ।। २९ ।।
पंखेसे हवा करनेपर भी अग्निदेव तबतक प्रज्वलित नहीं होते थे, जबतक कि वह सुन्दरी अपने मनोहर ओष्ठसम्पुटसे फूँक मारकर हवा न देती थी ।। २९ ।।
ततः स भगवानग्निश्चकमे तां सुदर्शनाम् ।
नीलस्य राज्ञः सर्वेषामुपनीतश्च सोऽभवत् ।। ३० ।।
तत्पश्चात् भगवान् अग्नि उस सुदर्शना नामकी राजकन्याको चाहने लगे। इस बातको राजा नील और सभी नागरिक जान गये ।। ३० ।।
ततो ब्राह्मणरूपेण रममाणो यदृच्छया ।
चकमे तां वरारोहां कन्यामुत्पललोचनाम् ।
तं तु राजा यथाशास्त्रमशासद् धार्मिकस्तदा ।। ३१ ।।
तदनन्तर एक दिन ब्राह्मणका रूप धारण करके इच्छानुसार घूमते हुए अग्निदेव उस सर्वाङ्गसुन्दरी कमल-नयनी कन्याके पास आये और उसके प्रति कामभाव प्रकट करने लगे। धर्मात्मा राजा नीलने शास्त्रके अनुसार उस ब्राह्मणपर शासन किया ।। ३१ ।।
प्रजज्वाल ततः कोपाद् भगवान् हव्यवाहनः । तं दृष्ट्वा विस्मितो राजा जगाम शिरसावनिम् ॥ ३२ ॥ तब क्रोधसे भगवान् अग्निदेव अपने रूपमें प्रज्वलित हो उठे। उन्हें इस रूपमें देखकर राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने पृथ्वीपर मस्तक रखकर अग्निदेवको प्रणाम किया ॥ ३२ ॥
ततः कालेन तां कन्यां तथैव हि तदा नृपः । प्रददौ विप्ररूपाय वह्नये शिरसा नतः ॥ ३३ ॥ प्रतिगृह्य च तां सुभ्रूं नीलराज्ञः सुतां तदा । चक्रे प्रसादं भगवांस्तस्य राज्ञो विभावसुः ॥ ३४ ॥ तत्पश्चात् विवाहके योग्य समय आनेपर राजाने उस कन्याको ब्राह्मणरूपधारी अग्निदेवकी सेवामें अर्पित कर दिया और उनके चरणोंमें सिर रखकर नमस्कार किया। राजा नीलकी सुन्दरी कन्याको पत्नीरूपमें ग्रहण करके भगवान् अग्निने राजापर अपना कृपाप्रसाद प्रकट किया ॥ ३३-३४ ॥
वरेणच्छन्दयामास तं नृपं स्विष्टकृत्तमः । अभयं च स जग्राह स्वसैन्ये वै महीपतिः ॥ ३५ ॥ वे उनकी अभीष्ट-सिद्धिमें सर्वोत्तम सहायक हो राजासे वर माँगनेका अनुरोध करने लगे। राजाने अपनी सेनाके प्रति अभयदान माँगा ॥ ३५ ॥
ततः प्रभृति ये केचिदज्ञानात् तां पुरीं नृपाः । जिगीषन्ति बलाद् राजंस्ते दह्यन्ते स्म वह्निना ॥ ३६ ॥ राजन्! तभीसे जो कोई नरेश अज्ञानवश उस पुरीको बलपूर्वक जीतना चाहते, उन्हें अग्निदेव जला देते थे ॥ ३६ ॥
तस्यां पुर्यां तदा चैव माहिष्मत्यां कुरुद्वह । बभूवुरनतिग्राह्या योषितश्छन्दतः किल ॥ ३७ ॥ कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! उस समय माहिष्मतीपुरीमें युवती स्त्रियाँ इच्छानुसार ग्रहण करनेके योग्य नहीं रह गयी थीं (क्योंकि वे स्वतन्त्रतासे ही वरका वरण किया करती थीं) ॥ ३७ ॥
एवमग्निवरं प्रादात् स्त्रीणामप्रतिवारणे । वरिण्यस्तत्र नार्यो हि यथेष्टं विचरन्त्युत ॥ ३८ ॥ अग्निदेवने स्त्रियोंके लिये यह वर दे दिया था कि अपने प्रतिकूल होनेके कारण ही कोई स्त्रियोंको वरका स्वयं ही वरण करनेसे रोक नहीं सकता। इससे वहाँकी स्त्रियाँ स्वेच्छापूर्वक वरका वरण करनेके लिये विचरण किया करती थीं ॥ ३८ ॥
वर्जयन्ति च राजानस्तत् पुरं भरतर्षभ । भयादग्नेर्महाराज तदाप्रभृति सर्वदा ॥ ३९ ॥
भरतश्रेष्ठ जनमेजय! तभीसे सब राजा (जो इस रहस्यसे परिचित थे) अग्निके भयके कारण माहिष्मती-पुरीपर चढ़ाई नहीं करते थे ।। ३९ ।। सहदेवस्तु धर्मात्मा सैन्यं दृष्ट्वा भयार्दितम् । परीतमग्निना राजन् नाकम्पत यथाचलः । उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा सोऽब्रवीत् पावकं ततः ।। ४० ।। राजन्! धर्मात्मा सहदेव अग्निसे व्याप्त हुई अपनी सेनाको भयसे पीड़ित देख पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे, भयसे कम्पित नहीं हुए। उन्होंने आचमन करके पवित्र हो अग्निदेवसे इस प्रकार कहा ।। ४० ।।
सहदेव उवाच
त्वदर्थोऽयं समारम्भः कृष्णवर्त्मन् नमोऽस्तु ते । मुखं त्वमसि देवानां यज्ञस्त्वमसि पावक ।। ४१ ।। **सहदेव बोले—**कृष्णवर्त्मन्! हमारा यह आयोजन तो आपकेही लिये है, आपको नमस्कार है। पावक! आप देवताओंके मुख हैं, यज्ञस्वरूप हैं ।। ४१ ।। पावनात् पावकश्चासि वहनाद्धव्यवाहनः । वेदास्त्वदर्थं जाता वै जातवेदास्ततो ह्यसि ।। ४२ ।। आप सबको पवित्र करनेके कारण पावक हैं और हव्य (हवनीय पदार्थ)-को वहन करनेके कारण हव्यवाहन कहलाते हैं। वेद आपके लिये ही जात अर्थात् प्रकट हुए हैं, इसीलिये आप जातवेदा हैं ।। ४२ ।। चित्रभानुः सुरेशश्च अनलस्त्वं विभावसो । स्वर्गद्वारस्पृशश्चासि हुताशो ज्वलनः शिखी ।। ४३ ।। विभावसो! आप ही चित्रभानु, सुरेश और अनल कहलाते हैं। आप सदा स्वर्गद्वारका स्पर्श करते हैं। आप आहुति दिये हुए पदार्थोंको खाते हैं, इसलिये हुताशन हैं। प्रज्वलित होनेसे ज्वलन और शिखा (लपट) धारण करनेसे शिखी हैं ।। ४३ ।। वैश्वानरस्त्वं पिङ्गेशः प्लवङ्गो भूरितेजसः । कुमारसूस्त्वं भगवान् रुद्रगर्भो हिरण्यकृत् ।। ४४ ।। आप ही वैश्वानर, पिंगेश, प्लवंग और भूरितेजस् नाम धारण करते हैं। आपने ही कुमार कार्तिकेयको जन्म दिया है, आप ही ऐश्वर्यसम्पन्न होनेके कारण भगवान् हैं। श्रीरुद्रका वीर्य धारण करनेसे आप रुद्रगर्भ कहलाते हैं। सुवर्णके उत्पादक होनेसे आपका नाम हिरण्यकृत् है ।। ४४ ।। अग्निर्ददातु मे तेजो वायुः प्राणं ददातु मे । पृथिवी बलमादध्याच्छिवं चापो दिशन्तु मे ।। ४५ ।।
आप अग्नि मुझे तेज दें, वायुदेव प्राणशक्ति प्रदान करें, पृथ्वी मुझमें बलका आधान करें और जल मुझे कल्याण प्रदान करें ।। ४५ ।।
अपांगर्भ महासत्त्व जातवेदः सुरेश्वर ।
देवानां मुखमग्ने त्वं सत्येन विपुनीहि माम् ।। ४६ ।।
जलको प्रकट करनेवाले महान् शक्तिसम्पन्न जातवेदा सुरेश्वर अग्निदेव! आप देवताओंके मुख हैं, अपने सत्यके प्रभावसे आप मुझे पवित्र कीजिये ।। ४६ ।।
ऋषिभिर्ब्राह्मणैश्चैव दैवतैरसुरैरपि ।
नित्यं सुहुत यज्ञेषु सत्येन विपुनीहि माम् ।। ४७ ।।
ऋषि, ब्राह्मण, देवता तथा असुर भी सदा यज्ञ करते समय आपमें आहुति डालते हैं, अपने सत्यके प्रभावसे आप मुझे पवित्र करें ।। ४७ ।।
धूमकेतुः शिखी च त्वं पापहानिलसम्भवः ।
सर्वप्राणिषु नित्यस्थः सत्येन विपुनीहि माम् ।। ४८ ।।
देव! धूम आपका ध्वज है, आप शिखा धारण करनेवाले हैं, वायुसे आपका प्राकट्य हुआ है। आप समस्त पापोंके नाशक हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर आप सदा विराजमान होते हैं। अपने सत्यके प्रभावसे आप मुझे पवित्र कीजिये ।। ४८ ।।
एवं स्तुतोऽसि भगवन् प्रीतेन शुचिना मया ।
तुष्टिं पुष्टिं श्रुतिं चैव प्रीतिं चाग्ने प्रयच्छ मे ।। ४९ ।।
भगवन्! मैंने पवित्र होकर प्रेमभावसे आपका इस प्रकार स्तवन किया है। अग्निदेव! आप मुझे तुष्टि, पुष्टि, श्रवण-शक्ति एवं शास्त्रज्ञान और प्रीति प्रदान करें ।। ४९ ।।
वैशम्पायन उवाच
इत्येवं मन्त्रमाग्नेयं पठन् यो जुहुयाद् विभुम् ।
ऋद्धिमान् सततं दान्तः सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। ५० ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! जो द्विज इस प्रकार इन श्लोकरूप आग्नेय मन्त्रोंका पाठ करते हुए (अन्तमें ‘स्वाहा’ बोलकर) भगवान् अग्निदेवको आहुति समर्पित करता है, वह सदा समृद्धिशाली और जितेन्द्रिय होकर सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। ५० ।।
सहदेव उवाच
यज्ञविघ्नमिमं कर्तुं नार्हस्त्वं हव्यवाहन ।
**सहदेव बोले—**हव्यवाहन! आपको यज्ञमें यह विघ्न नहीं डालना चाहिये ।। ५० १/२ ।।
एवमुक्त्वा तु माद्रेयः कुशैरास्तीर्य मेदिनीम् ।। ५१ ।।
विधिवत् पुरुषव्याघ्रः पावकं प्रत्युपाविशत् ।
प्रमुखे तस्य सैन्यस्य भीतोद्विग्नस्य भारत ।। ५२ ।।
भारत! ऐसा कहकर नरश्रेष्ठ माद्रीकुमार सहदेव धरतीपर कुश बिछाकर अपनी भयभीत और उद्विग्न सेनाके अग्रभागमें विधिपूर्वक अग्निके सम्मुख धरना देकर बैठ गये ॥ ५१-५२ ॥
न चैनमत्यगाद् वह्निर्वेलामिव महोदधिः ।
तमुपेत्य शनैर्वह्निरुवाच कुरुनन्दनम् ॥ ५३ ॥
सहदेवं नृणां देवं सान्त्वपूर्वमिदं वचः ।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ कौरव्य जिज्ञासेयं कृता मया ।
वेद्मि सर्वमभिप्रायं तव धर्मसुतस्य च ॥ ५४ ॥
जैसे महासागर अपनी तटभूमिका उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार अग्निदेव सहदेवको लाँघकर उनकी सेनामें नहीं गये। वे कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले नरदेव सहदेवके पास धीरे-धीरे आकर उन्हें सान्त्वना देते हुए यह वचन बोले—‘कौरव्य! उठो, उठो, मैंने यह तुम्हारी परीक्षा की है। तुम्हारे और धर्मपुत्र युधिष्ठिरके सम्पूर्ण अभिप्रायको मैं जानता हूँ॥ ५३-५४ ॥
मया तु रक्षितव्येयं पुरी भरतसत्तम ।
यावद् राज्ञो हि नीलस्य कुले वंशधरा इति ॥ ५५ ॥
ईप्सितं तु करिष्यामि मनसस्तव पाण्डव ॥ ५६ ॥
‘परंतु भरतसत्तम! राजा नीलके कुलमें जबतक उनकी वंशपरम्परा चलती रहेगी, तबतक मुझे इस माहिष्मतीपुरीकी रक्षा करनी होगी। पाण्डुकुमार! साथ ही मैं तुम्हारा मनोरथ भी पूर्ण करूँगा' ॥ ५५-५६ ॥
तत उत्थाय हृष्टात्मा प्राञ्जलिः शिरसा नतः ।
पूजयामास माद्रेयः पावकं भरतर्षभ ॥ ५७ ॥
भरतश्रेष्ठ! जनमेजय! यह सुनकर माद्रीकुमार सहदेव प्रसन्नचित्त हो वहाँसे उठे और हाथ जोड़कर एवं सिर झुकाकर उन्होंने अग्निदेवका पूजन किया ॥ ५७ ॥
पावके विनिवृत्ते तु नीलो राजाभ्यगात् तदा ।
पावकस्याज्ञया चैनमर्चयामास पार्थिवः ॥ ५८ ॥
सत्कारेण नरव्याघ्रं सहदेवं युधाम्पतिम् ।
अग्निके लौट जानेपर उन्हींकी आज्ञासे राजा नील उस समय वहाँ आये और उन्होंने योद्धाओंके अधिपति पुरुषसिंह सहदेवका सत्कारपूर्वक पूजन किया ॥ ५८ १/२ ॥
प्रतिगृह्य च तां पूजां करे च विनिवेश्य च ॥ ५९ ॥
माद्रीसुतस्ततः प्रायाद् विजयी दक्षिणां दिशम् ।
राजा नीलकी वह पूजा ग्रहणकर और उनपर कर लगाकर विजयी माद्रीकुमार सहदेव दक्षिण दिशाकी ओर बढ़ गये ॥ ५९ १/२ ॥
त्रैपुरं स वशे कृत्वा राजानममितौजसम् ॥ ६० ॥
निजग्राह महाबाहुस्तरसा पौरवेश्वरम् । आकृतिं कौशिकाचार्यं यत्नेन महता ततः ॥ ६१ ॥ वशे चक्रे महाबाहुः सुराष्ट्राधिपतिं तदा । फिर त्रिपुरीके राजा अमितौजाको वशमें करके महाबाहु सहदेवने पौरवेश्वरको वेगपूर्वक बंदी बना लिया। तदनन्तर बड़े भारी प्रयत्नके द्वारा विशाल भुजाओंवाले माद्रीकुमारने सुराष्ट्रदेशके अधिपति कौशिकाचार्य आकृतिको वशमें किया ॥ ६०-६१ १/२ ॥ सुराष्ट्रविषयस्थश्च प्रेषयामास रुक्मिणे ॥ ६२ ॥ राज्ञे भोजकटस्थाय महामात्राय धीमते । भीष्मकाय स धर्मात्मा साक्षादिन्द्रसखाय वै ॥ ६३ ॥ स चास्य प्रतिजग्राह ससुतः शासनं तदा । प्रीतिपूर्वं महाराज वासुदेवमवेक्ष्य च ॥ ६४ ॥ ततः स रत्नान्यादाय पुनः प्रायाद् युधाम्पतिः । महाराज! सुराष्ट्रमें ही ठहरकर धर्मात्मा सहदेवने भोजकटनिवासी रुक्मी तथा विशाल राज्यके अधिपति परम बुद्धिमान् साक्षात् इन्द्रसखा भीष्मकके पास दूत भेजा। पुत्रसहित भीष्मकने वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी ओर दृष्टि रखकर प्रेमपूर्वक ही सहदेवका शासन स्वीकार कर लिया। तदनन्तर योद्धाओंके अधिपति सहदेव वहाँसे रत्नोंकी भेंट लेकर पुनः आगे बढ़ गये ॥ ६२—६४ १/२ ॥ ततः शूर्पारकं चैव तालाकटमथापि च ॥ ६५ ॥ वशे चक्रे महातेजा दण्डकांश्च महाबलः । सागरद्वीपवासांश्च नृपतीन् म्लेच्छयोनिजान् ॥ ६६ ॥ निषादान् पुरुषादांश्च कर्णप्रावरणानपि । महाबलशाली महातेजस्वी माद्रीकुमारने शूर्पारक और तालाकट नामक देशोंको जीतते हुए दण्डकारण्यको अपने अधीन कर लिया। तत्पश्चात् समुद्रके द्वीपोंमें निवास करनेवाले म्लेच्छजातीय राजाओं, निषादों तथा राक्षसों, कर्णप्रावरणोंको* भी परास्त किया ॥ ६५-६६ १/२ ॥ ये च कालमुखा नाम नरराक्षसयोनयः ॥ ६७ ॥ कालमुख नामसे प्रसिद्ध जो मनुष्य और राक्षस दोनोंके संयोगसे उत्पन्न हुए योद्धा थे, उनपर भी विजय प्राप्त की ॥ ६७ ॥ कृत्स्नं कोलगिरिं चैव सुरभीपत्तनं तथा । द्वीपं ताम्राह्वयं चैव पर्वतं रामकं तथा ॥ ६८ ॥ तिमिङ्गिलं च स नृपं वशे कृत्वा महामतिः । एकपादांश्च पुरुषान् केरलान् वनवासिनः ॥ ६९ ॥
नगरीं संजयन्तीं च पाखण्डं करहाटकम् ।
दूतैरेव वशे चक्रे करं चैनानदापयत् ॥ ७० ॥
समूचे कोलगिरि, सुरभीपत्तन, ताम्रद्वीप, रामकपर्वत तथा तिमिंगिलनरेशको भी अपने वशमें करके परम बुद्धिमान् सहदेवने एक पैरके पुरुषों, केरलों, वनवासियों, संजयन्ती नगरी तथा पाखण्ड और करहाटक देशोंको दूतोंद्वारा संदेश देकर ही अपने अधीन कर लिया और उन सबसे कर वसूल किया ॥ ६८–७० ॥
पाण्ड्यांश्च द्रविडांश्चैव सहितांश्चोण्ड्रकेरलैः ।
आन्ध्रांस्तालवनांश्चैव कलिङ्गानूष्ट्रकर्णिकान् ॥ ७१ ॥
आटवीं च पुरीं रम्यां यवनानां पुरं तथा ।
दूतैरेव वशे चक्रे करं चैनानदापयत् ॥ ७२ ॥
पाण्ड्य, द्रविड, उण्ड्र, केरल, आन्ध्र, तालवन, कलिंग, उष्ट्रकर्णिक, रमणीय आटवीपुरी तथा यवनोंके नगर—इन सबको उन्होंने दूतोंद्वारा ही वशमें कर लिया और सबको कर देनेके लिये विवश किया ॥ ७१-७२ ॥
(समुद्रतीरमासाद्य न्यविशत् पाण्डुनन्दनः ।
सहदेवस्ततो राजन् मन्त्रिभिः सह भारत ।
सम्प्रधार्य महाबाहुः सचिवैर्बुद्धिमत्तरैः ॥
वहाँसे समुद्रके तटपर पहुँचकर पाण्डुनन्दन सहदेवने सेनाका पड़ाव डाला। भारत! तदनन्तर महाबाहु सहदेवने अत्यन्त बुद्धिमान् मन्त्रणा देनेमें कुशल सचिवोंके साथ बैठकर बहुत देरतक विचारविमर्श किया।
अनुमान्य स तां राजन् सहदेवस्त्वरान्वितः ।
चिन्तयामास राजेन्द्र भ्रातुः पुत्रं घटोत्कचम् ॥
राजेन्द्र जनमेजय! उन सबकी सम्मतिको आदर देते हुए माद्रीकुमारने अपने भतीजे राक्षसराज घटोत्कचका तुरंत चिन्तन किया।
ततश्चिन्तितमात्रे तु राक्षसः प्रत्यदृश्यत ।
अतिदीर्घो महाकायः सर्वाभरणभूषितः ॥
उनके चिन्तन करते ही वह बड़े डील-डौलवाला विशालकाय राक्षस दिखायी दिया। उसने सब प्रकारके आभूषण धारण कर रखे थे।
नीलजीमूतसंकाशस्तप्तकाञ्चनकुण्डलः ।
विचित्रहारकेयूरः किङ्किणीमणिभूषितः ॥
उसके शरीरका रंग मेघोंकी काली घटाके समान था। उसके कानोंमें तपाये हुए सुवर्णके कुण्डल झिलमिला रहे थे। उसके गलेमें हार और भुजाओंमें केयूरकी विचित्र शोभा हो रही थी। कटिभागमें वह किंकिणीकी मणियोंसे विभूषित था।
हेममाली महादंष्ट्रः किरीटी कुक्षिबन्धनः ।
ताम्रकेशो हरिश्मश्रुर्भीमाक्षः कनकाङ्गदः ॥
उसके कण्ठमें सुवर्णकी माला, मस्तकपर किरीट और कमरमें करधनीकी शोभा हो रही थी। उसकी दाढ़ें बहुत बड़ी थीं, सिरके बाल ताँबेके समान लाल थे, मूँछ-दाढ़ीके बाल हरे दिखायी देते थे एवं आँखें बड़ी भयंकर थीं। उसकी भुजाओंमें सोनेके बाजूबंद चमक रहे थे।
रक्तचन्दनदिग्धाङ्गः सूक्ष्माम्बरधरो बली ।
जवेन स ययौ तत्र चालयन्निव मेदिनीम् ॥
उसने अपने सब अंगोंमें लाल चन्दन लगा रखा था। उसके कपड़े बहुत महीन थे। वह बलवान् राक्षस अपने वेगसे समूची पृथिवीको हिलाता हुआ-सा वहाँ पहुँचा।
ततो दृष्ट्वा जना राजन्नायान्तं पर्वतोपमम् ।
भयाद्धि दुद्रुवुः सर्वे सिंहात् क्षुद्रमृगा यथा ॥
राजन्! उस पर्वताकार घटोत्कचको आता देख वहाँके सब लोग भयके मारे भाग खड़े हुए; मानो किसी सिंहके भयसे जंगलके मृग आदि क्षुद्र पशु भाग रहे हों।
आससाद च माद्रेयं पुलस्त्यं रावणो यथा ।
अभिवाद्य ततो राजन् सहदेवं घटोत्कचः ॥
प्रह्वः कृताञ्जलिस्तस्थौ किं कार्यमिति चाब्रवीत् ।
घटोत्कच माद्रीनन्दन सहदेवके पास आया, मानो रावणने महर्षि पुलस्त्यके पास पदार्पण किया हो। महाराज! तदनन्तर घटोत्कच सहदेवको प्रणाम करके उनके सामने विनीतभावसे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला—'मेरे लिये क्या आज्ञा है?'
तं मेरुशिखराकारमागतं पाण्डुनन्दनः ॥
सम्परिष्वज्य बाहुभ्यां मूर्धुन्युपाघ्राय चासकृत् ।
पूजयित्वा सहामात्यः प्रीतो वाक्यमुवाच ह ॥
घटोत्कच मेरुपर्वतके शिखर-जैसा जान पड़ता था। उसको आया देख पाण्डुनन्दन सहदेवने दोनों भुजाओंमें भरकर उसे हृदयसे लगा लिया और बार-बार उसका मस्तक सूँघा। तत्पश्चात् उसका स्वागत-सत्कार करके मन्त्रियोंसहित सहदेव बड़े प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले।
सहदेव उवाच
गच्छ लङ्कां पुरीं वत्स करार्थं मम शासनात् ।
तत्र दृष्ट्वा महात्मानं राक्षसेन्द्रं विभीषणम् ॥
रत्नानि राजसूयार्थं विविधानि बहूनि च ।
उपादाय च सर्वाणि प्रत्यागच्छ महाबल ॥
**सहदेवने कहा—**वत्स! तुम मेरी आज्ञासे कर लेनेके लिये लंकापुरीमें जाओ और वहाँ राक्षसराज महात्मा विभीषणसे मिलकर राजसूययज्ञके लिये भाँति-भाँतिके बहुत-से रत्न प्राप्त करो। महाबली वीर! उनकी ओरसे भेंटमें मिली हुई सब वस्तुएँ लेकर शीघ्र यहाँ लौट आओ।
नो चेदेवं वदेः पुत्र समर्थमिदमुत्तरम् । विष्णोर्भुजबलं वीक्ष्य राजसूयमथारभत् ।। कौन्तेयोः भ्रातृभिः सार्धं सर्वं जानीहि साम्प्रतम् । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सर्वं वैश्रवणानुज ।। इत्युक्त्वा शीघ्रमागच्छ मा भूत् कालस्य पर्ययः । बेटा! यदि विभीषण तुम्हें भेंट न दें, तो उन्हें अपनी शक्तिका परिचय देते हुए इस प्रकार कहना—'कुबेरके छोटे भाई लंकेश्वर! कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णके बाहुबलको देखकर भाइयोंसहित राजसूययज्ञ आरम्भ किया है। आप इस समय इन बातोंको अच्छी तरह जान लें। आपका कल्याण हो, अब मैं यहाँसे चला जाऊँगा।' इतना कहकर तुम शीघ्र लौट आना; अधिक विलम्ब मत करना।
वैशम्पायन उवाच
पाण्डवेनैवमुक्तस्तु मुदा युक्तो घटोत्कचः । तथेत्युक्त्वा महाराज प्रतस्थे दक्षिणां दिशम् ।। ययौ प्रदक्षिणं कृत्वा सहदेवं घटोत्कचः ।) **वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज जनमेजय! पाण्डुकुमार सहदेवके ऐसा कहनेपर घटोत्कच बहुत प्रसन्न हुआ और 'तथास्तु' कहकर सहदेवकी परिक्रमा करके दक्षिण दिशाकी ओर चल दिया।
ततः कच्छगतो धीमान् दूतं माद्रवतीसुतः । प्रेषयामास हैडिम्बं पौलस्त्याय महात्मने । विभीषणाय धर्मात्मा प्रीतिपूर्वमरिंदमः ।। ७३ ।। इस प्रकार समुद्रके तटपर पहुँचकर बुद्धिमान् शत्रुदमन धर्मात्मा माद्रवतीकुमारने महात्मा पुलस्त्यनन्दन विभीषणके पास प्रेमपूर्वक घटोत्कचको अपना दूत बनाकर भेजा ।। ७३ ।।
(लङ्कामभिमुखो राजन् समुद्रमवलोकयत् ।। कूर्मग्राहझषाकीर्णं नक्रैर्मीनैस्तथाऽऽकुलम् । शुक्तिव्रातैः समाकीर्णं शङ्खानां निचयाकुलम् ।। राजन्! लंकाकी ओर जाते हुए घटोत्कचने समुद्रको देखा। वह कछुओं, मगरों, नाकों तथा मत्स्य आदि जल-जन्तुओंसे भरा हुआ था। उसमें ढेर-के-ढेर शंख और सीपियाँ छा
रही थीं। स दृष्ट्वा रामसेतुं च चिन्तयन् रामविक्रमम् । प्रणम्य तमतिक्रम्य याम्यां वेलामलोकयत् ॥ भगवान् श्रीरामके द्वारा बनवाये हुए पुलको देखकर घटोत्कचको भगवान्के पराक्रमका चिन्तन हो आया और उस सेतुतीर्थको प्रणाम करके उसने समुद्रके दक्षिणतटकी ओर दृष्टिपात किया। गत्वा पारं समुद्रस्य दक्षिणं स घटोत्कचः । ददर्श लङ्कां राजेन्द्र नाकपृष्ठोपमां शुभाम् ॥ राजेन्द्र! तत्पश्चात् दक्षिणतटपर पहुँचकर घटोत्कचने लंकापुरी देखी, जो स्वर्गके समान सुन्दर थी। प्राकारेणावृतां रम्यां शुभद्वारैश्च शोभिताम् । प्रासादैर्बहुसाहस्रैः श्वेतरक्तैश्च संकुलाम् ॥ उसके चारों ओर चहारदीवारी बनी थी। सुन्दर फाटक उस रमणीयपुरीकी शोभा बढ़ाते थे। सफेद और लाल रंगके हजारों महलोंसे वह लंकापुरी भरी हुई थी। तापनीयगवाक्षेण मुक्ताजालान्तरेण च । हैमराजतजालेन दान्तजालैश्च शोभिताम् ॥ वहाँके गवाक्ष (जँगले) सोनेके बने हुए थे और उनके भीतर मोतियोंकी जाली लगी हुई थी। कितने ही गवाक्ष सोने, चाँदी तथा हाथीदाँतकी जालियोंसे सुशोभित थे। हर्म्यगोपुरसम्बाधां रुक्मतोरणसंकुलाम् । दिव्यदुन्दुभिनिह्र्रादामुद्यानवनशोभिताम् ॥ कितनी ही अट्टालिकाएँ तथा गोपुर उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे। स्थान-स्थानपर सोनेके फाटक लगे हुए थे। वहाँ दिव्य दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनि गूँजती रहती थी। बहुत-से उद्यान और वन उस नगरीकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। पुष्पगन्धैश्च संकीर्णां रमणीयमहापथाम् । नानारत्नैश्च सम्पूर्णाामिन्द्रस्येवामरावतीम् ॥ उसमें चारों ओर फूलोंकी सुगन्ध छा रही थी। वहाँकी लंबी-चौड़ी सड़कें बहुत सुन्दर थीं। भाँति-भाँतिके रत्नोंसे भरी-पुरी लंका इन्द्रकी अमरावतीपुरीको भी लज्जित कर रही थी। विवेश स पुरीं लङ्कां राक्षसैश्च निषेविताम् । ददर्श राक्षसत्राताञ्छूलप्राशधरान् बहून् ॥ घटोत्कचने राक्षसोंसे सेवित उस लंकापुरीमें प्रवेश किया और देखा, झुंड-के-झुंड राक्षस त्रिशूल और भाले लिये विचर रहे हैं। नानावेषधरान् दक्षान् नारीश्च प्रियदर्शनाः ।
दिव्यमाल्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिताः ॥ वे सभी युद्धमें कुशल हैं और नाना प्रकारके वेष धारण करते हैं। घटोत्कचने वहाँकी नारियोंको भी देखा। वे सब-की-सब बड़ी सुन्दर थीं। उनके अंगोंमें दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण तथा दिव्य हार शोभा दे रहे थे।
मदरक्तान्तनयनाः पीनश्रोणिपयोधराः । भैमसेनिं ततो दृष्ट्वा हृष्टास्ते विस्मयं गताः ॥ उनके नेत्रोंके किनारे मदिराके नशेसे कुछ लाल हो रहे थे। उनके नितम्ब और उरोज उभरे हुए तथा मांसल थे। भीमसेनपुत्र घटोत्कचको वहाँ आया देख लंकानिवासी राक्षसोंको बड़ा हर्ष और विस्मय हुआ।
आससाद गृहं राज्ञ इन्द्रस्य सदनोपमम् । स द्वारपालमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥ इधर घटोत्कच इन्द्रभवनके समान मनोहर राजमहलके द्वारपर जा पहुँचा और द्वारपालसे इस प्रकार बोला।
घटोत्कच उवाच
कुरूणामृषभो राजा पाण्डुर्नाम महाबलः । कनीयांस्तस्य दायादः सहदेव इति श्रुतः ॥ **घटोत्कचने कहा—**कुरुकुलमें एक श्रेष्ठ राजा हो गये हैं। वे महाबली नरेश 'पाण्डु' के नामसे विख्यात थे। उनके सबसे छोटे पुत्रका नाम 'सहदेव' है।
कृष्णमित्रस्य तु गुरो राजसूयार्थमुद्यतः । तेनाहं प्रेषितो दूतः करार्थं कौरवस्य च ॥ वे अपने बड़े भाई युधिष्ठिरका राजसूययज्ञ सम्पन्न करनेके लिये कटिबद्ध हैं। धर्मराज युधिष्ठिरके सहायक भगवान् श्रीकृष्ण हैं। सहदेवने कुरुराज युधिष्ठिरके लिये कर लेनेके निमित्त मुझे दूत बनाकर यहाँ भेजा है।
द्रष्टुमिच्छामि पौलस्त्यं त्वं क्षिप्रं मां निवेदय । मैं पुलस्त्यनन्दन महाराज विभीषणसे मिलना चाहता हूँ। तुम शीघ्र जाकर उन्हें मेरे आगमनकी सूचना दो।
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा द्वारपालो महीपते । तथेत्युक्त्वा विवेशाथ भवनं स निवेदकः ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! घटोत्कचका वह वचन सुनकर वह द्वारपाल 'बहुत अच्छा' कहकर सूचना देनेके लिये राजभवनके भीतर गया।
साञ्जलिः स समाचष्ट सर्वां दूतगिरं तदा ।
द्वारपालवचः श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः ।।
उवाच वाक्यं धर्मात्मा समीपे मे प्रवेश्यताम् ।
वहाँ उसने हाथ जोड़कर दूतकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं। द्वारपालकी बात सुनकर धर्मात्मा राक्षसराज विभीषणने उससे कहा—‘दूतको मेरे समीप ले आओ'।
एवमुक्तस्तु राजेन्द्र धर्मज्ञेन महात्मना ।
अथ निष्क्रम्य सम्भ्रान्तो द्वाःस्थो हैडिम्बमब्रवीत् ।।
राजेन्द्र! धर्मज्ञ महात्मा विभीषणकी ऐसी आज्ञा होनेपर द्वारपाल बड़ी उतावलीके साथ बाहर निकला और घटोत्कचसे बोला—।
एहि दूत नृपं द्रष्टुं क्षिप्रं प्रविश च स्वयम् ।
द्वारपालवचः श्रुत्वा प्रविवेश घटोत्कचः ।।
‘दूत! आओ। महाराजसे मिलनेके लिये राजभवनमें शीघ्र प्रवेश करो।' द्वारपालका कथन सुनकर घटोत्कचने राजभवनमें प्रवेश किया।
स प्रविश्य ददर्शार्थ राक्षसेन्द्रस्य मन्दिरम् ।
ततः कैलाससंकाशं तप्तकाञ्चनतोरणम् ।।
तदनन्तर उसमें प्रवेश करके उसने राक्षसराज विभीषणका महल देखा, जो अपनी उज्ज्वल आभासे कैलासके समान जान पड़ता था। उसका फाटक तपाकर शुद्ध किये हुए सोनेसे तैयार किया गया था।
प्राकारेण परिक्षिप्तं गोपुरैश्चापि शोभितम् ।
हर्म्यप्रासादसम्बाधं नानारत्नसमन्वितम् ।।
चहारदीवारीसे घिरा हुआ वह राजमन्दिर अनेक गोपुरोंसे सुशोभित हो रहा था। उसमें बहुत-सी अट्टालिकाएँ तथा महल बने हुए थे। भाँति-भाँतिके रत्न उस राजभवनकी शोभा बढ़ाते थे।
काञ्चनैस्तापनीयैश्च स्फाटिकै राजतैरपि ।
वज्रवैडूर्यगर्भैश्च स्तम्भैर्दृष्टिमनोहरैः ।
नानाध्वजपताकाभिः सुवर्णाभिश्च चित्रितम् ।
तपाये हुए सुवर्ण, रजत (चाँदी) तथा स्फटिकमणिके बने हुए खम्भे नेत्र और मनको बरबस अपनी ओर खींच लेते थे। उन खम्भोंमें हीरे और वैदूर्य जड़े हुए थे। सुनहरे रंगकी विविध ध्वजा-पताकाओंसे उस भव्य भवनकी विचित्र शोभा हो रही थी।
चित्रमाल्यावृतं रम्यं तप्तकाञ्चनवेदिकम् ।।
तान् दृष्ट्वा तत्र सर्वान् स भैमसेनिर्मनोरमान् ।
प्रविशन्नेव हैडिम्बः शुश्राव मुरजस्वनम् ।।
विचित्र मालाओंसे अलंकृत तथा विशुद्ध स्वर्णमय वेदिकाओंसे विभूषित वह राजभवन बड़ा रमणीय दिखायी दे रहा था। उस महलकी इन सारी मनोरम विशेषताओंको देखकर
घटोत्कचने ज्यों ही भीतर प्रवेश किया, त्यों ही उसके कानोंमें मृदंगकी मधुर ध्वनि सुनायी पड़ी।
तन्त्रीगीतसमाकीर्णं समतालमिताक्षरम् ।
दिव्यदुन्दुभिनिर्ह्रादं वादित्रशतसंकुलम् ॥
वहाँ वीणाके तार झंकृत हो रहे थे और उसके लयपर गीत गाया जा रहा था, जिसका एक-एक अक्षर समतालके अनुसार उच्चारित हो रहा था। सैकड़ों वाद्योंके साथ दिव्य दुन्दुभियोंका मधुर घोष गूँज रहा था।
स श्रुत्वा मधुरं शब्दं प्रीतिमानभवत् तदा ।
ततो विगाह्य हैडिम्बो बहुकक्षां मनोरमाम् ॥
स ददर्श महात्मानं द्वाःस्थेन भरतर्षभ ।
तं विभीषणमासीनं काञ्चने परमासने ॥
भरतश्रेष्ठ! वह मधुर शब्द सुनकर घटोत्कचके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने अनेक मनोरम कक्षाओंको पार करके द्वारपालके साथ जा सुन्दर स्वर्ण सिंहासनपर बैठे हुए महात्मा विभीषणका दर्शन किया।
दिव्ये भास्करसंकाशे मुक्तामणिविभूषिते ।
दिव्याभरणचित्राङ्गं दिव्यरूपधरं विभुम् ॥
उनका सिंहासन सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था और उसमें मोती तथा मणि आदि रत्न जड़े हुए थे। दिव्य आभूषणोंसे राक्षसराज विभीषणके अंगोंकी विचित्र शोभा हो रही थी। उनका रूप दिव्य था।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धोक्षितं शुभम् ।
विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्रभम् ॥
वे दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करके दिव्य गन्धसे अभिषिक्त हो बड़े सुन्दर दिखायी दे रहे थे। उनकी अंगकान्ति सूर्य तथा अग्निके समान उद्भासित हो रही थी।
उपोपविष्टं सचिवैर्देवैरिव शतक्रतुम् ॥
यक्षैर्महारथैर्दिव्यैर्नारीभिः प्रियदर्शनैः ।
गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिः पूज्यमानं यथाविधि ॥
जैसे इन्द्रके पास बहुत-से देवता बैठते हैं, उसी प्रकार विभीषणके समीप उनके अनेक सचिव बैठे थे। बहुत-से दिव्य सुन्दर महारथी यक्ष अपनी स्त्रियोंके साथ मंगलयुक्त वाणीद्वारा विभीषणका विधिपूर्वक पूजन कर रहे थे।
चामरे व्यजने चाग्र्ये हेमदण्डे महाधने ।
गृहीते वरनारीभ्यां धूयमाने च मूर्धनि ॥
दो सुन्दरी नारियाँ सुवर्णमय दण्डसे विभूषित बहुमूल्य चँवर तथा व्यजन लेकर उनके मस्तकपर डुला रही थीं।
अर्चिष्मन्तं श्रिया जुष्टं कुबेरवरुणोपमम् । धर्मे चैव स्थितं नित्यमद्भुतं राक्षसेश्वरम् ॥ राक्षसराज विभीषण कुबेर और वरुणके समान राजलक्ष्मीसे सम्पन्न एवं अद्भुत दिखायी देते थे। उनके अंगोंसे दिव्य प्रभा छिटक रही थी। वे सदा धर्ममें स्थित रहते थे। राममिक्ष्वाकुनाथं वै स्मरन्तं मनसा सदा । दृष्ट्वा घटोत्कचो राजन् ववन्दे तं कृताञ्जलिः ॥ वे मन-ही-मन इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते थे। राजन्! उन राक्षसराज विभीषणको देख घटोत्कचने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। प्रह्वस्तस्थौ महावीर्यः शक्रं चित्ररथो यथा । तं दूतमागतं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः ॥ पूजयित्वा यथान्यायं सान्त्वपूर्वं वचोऽब्रवीत् । और जैसे महापराक्रमी चित्ररथ इन्द्रके सामने नम्र रहते हैं, उसी प्रकार महाबली घटोत्कच भी विनीतभावसे उनके सम्मुख खड़ा हो गया। राक्षसराज विभीषणने उस दूतको आया हुआ देख उसका यथायोग्य सम्मान करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंमें कहा।
विभीषण उवाच
कस्य वंशे तु संजातः करमिच्छन् महीपतिः ॥ तस्यानुजान् समस्तांश्च पुरं देशं च तस्य वै । त्वां च कार्यं च तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ विस्तरेण मम ब्रूहि सर्वानैतान् पृथक्-पृथक् । विभीषणने पूछा— दूत! जो महाराज मुझसे कर लेना चाहते हैं, वे किसके कुलमें उत्पन्न हुए हैं। उनके समस्त भाइयों तथा ग्राम और देशका परिचय दो। मैं तुम्हारे विषयमें भी जानना चाहता हूँ तथा तुम जिस कार्यके लिये कर लेने आये हो, उस समस्त कार्यके विषयमें भी मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। तुम मेरी पूछी हुई इन सब बातोंको विस्तारपूर्वक पृथक्-पृथक् बताओ।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु हैडिम्बः पौलस्त्येन महात्मना ॥ कृताञ्जलिरुवाचाथ सान्त्वयन् राक्षसाधिपम् । वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! महात्मा विभीषणके इस प्रकार पूछनेपर हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने हाथ जोड़कर राक्षसराजको आश्वासन देते हुए कहा।
घटोत्कच उवाच
सोमस्य वंशे राजाऽऽसीत् पाण्डुर्नाम महाबलः ।
पाण्डोः पुत्राश्च पञ्चासञ्छक्रतुल्यपराक्रमाः ॥
तेषां ज्येष्ठस्तु नाम्नाभूद् धर्मपुत्र इति श्रुतः ।
**घटोत्कच बोला—**महाराज! चन्द्रवंशमें पाण्डु नामसे प्रसिद्ध एक महाबली राजा हो गये हैं। उनके पाँच पुत्र हैं, जो इन्द्रके समान पराक्रमी हैं। उन पाँचोंमें जो बड़े हैं, वे धर्मपुत्रके नामसे विख्यात हैं।
अजातशत्रुर्धर्मात्मा धर्मो विग्रहवानिव ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा प्राप्य राज्यमकारयत् ।
गङ्गाया दक्षिणे तीरे नगरे नागसाह्वये ॥
उनके मनमें किसीके प्रति शत्रुता नहीं है; इसलिये लोग उन्हें अजातशत्रु कहते हैं। उनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता है। वे धर्मके मूर्तिमान् स्वरूप जान पड़ते हैं। गंगाके दक्षिणतटपर हस्तिनापुर नामका एक नगर है। राजा युधिष्ठिर वहीं अपना पैतृक राज्य प्राप्त करके उसकी रक्षा करते थे।
तद् दत्त्वा धृतराष्ट्राय शक्रप्रस्थं ययौ ततः ।
भ्रातृभि सह राजेन्द्र शक्रप्रस्थे प्रमोद्ते ॥
राक्षसराज! कुछ कालके पश्चात् उन्होंने हस्तिनापुरका राज्य धृतराष्ट्रको सौंप दिया और स्वयं वे भाइयोंसहित इन्द्रप्रस्थ चले गये। इन दिनों वे वहीं आनन्दपूर्वक रहते हैं।
गङ्गायमुनोर्मध्ये तावुभौ नगरोत्तमौ ।
नित्यं धर्मे स्थितो राजा शक्रप्रस्थे प्रशासति ॥
वे दोनों श्रेष्ठ नगर गंगा-यमुनाके बीचमें बसे हुए हैं। नित्य धर्मपरायण राजा युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थमें ही रहकर शासन करते हैं।
तस्यानुजो महाबाहुः भीमसेनो महाबलः ।
महातेजा महावीर्यः सिंहतुल्यः स पाण्डवः ॥
उनके छोटे भाई पाण्डुकुमार महाबाहु भीमसेन भी बड़े बलवान् हैं। वे सिंहके समान महापराक्रमी और अत्यन्त तेजस्वी हैं।
दशनागसहस्राणां बले तुल्यः स पाण्डवः ।
तस्यानुजोऽर्जुनो नाम महावीर्यपराक्रमः ॥
सुकुमारो महासत्त्वो लोके वीर्येण विश्रुतः ।
उनमें दस हजार हाथियोंका बल है। उनसे छोटे भाईका नाम अर्जुन है, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न, सुकुमार तथा अत्यन्त धैर्यवान् हैं। उनका पराक्रम विश्वमें विख्यात है।
कार्तवीर्यसमो वीर्ये सागरप्रतिमो बले ॥
जामदग्न्यसमो ह्यस्त्रे संख्ये रामसमोऽर्जुनः ।
रूपे शक्रसमः पार्थस्तेजसा भास्करोपमः ॥