भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1815, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1815

भरतश्रेष्ठ जनमेजय! तभीसे सब राजा (जो इस रहस्यसे परिचित थे) अग्निके भयके कारण माहिष्मती-पुरीपर चढ़ाई नहीं करते थे ।। ३९ ।। सहदेवस्तु धर्मात्मा सैन्यं दृष्ट्वा भयार्दितम् । परीतमग्निना राजन् नाकम्पत यथाचलः । उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा सोऽब्रवीत् पावकं ततः ।। ४० ।। राजन्! धर्मात्मा सहदेव अग्निसे व्याप्त हुई अपनी सेनाको भयसे पीड़ित देख पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे, भयसे कम्पित नहीं हुए। उन्होंने आचमन करके पवित्र हो अग्निदेवसे इस प्रकार कहा ।। ४० ।।

सहदेव उवाच

त्वदर्थोऽयं समारम्भः कृष्णवर्त्मन् नमोऽस्तु ते । मुखं त्वमसि देवानां यज्ञस्त्वमसि पावक ।। ४१ ।। **सहदेव बोले—**कृष्णवर्त्मन्! हमारा यह आयोजन तो आपकेही लिये है, आपको नमस्कार है। पावक! आप देवताओंके मुख हैं, यज्ञस्वरूप हैं ।। ४१ ।। पावनात् पावकश्चासि वहनाद्धव्यवाहनः । वेदास्त्वदर्थं जाता वै जातवेदास्ततो ह्यसि ।। ४२ ।। आप सबको पवित्र करनेके कारण पावक हैं और हव्य (हवनीय पदार्थ)-को वहन करनेके कारण हव्यवाहन कहलाते हैं। वेद आपके लिये ही जात अर्थात् प्रकट हुए हैं, इसीलिये आप जातवेदा हैं ।। ४२ ।। चित्रभानुः सुरेशश्च अनलस्त्वं विभावसो । स्वर्गद्वारस्पृशश्चासि हुताशो ज्वलनः शिखी ।। ४३ ।। विभावसो! आप ही चित्रभानु, सुरेश और अनल कहलाते हैं। आप सदा स्वर्गद्वारका स्पर्श करते हैं। आप आहुति दिये हुए पदार्थोंको खाते हैं, इसलिये हुताशन हैं। प्रज्वलित होनेसे ज्वलन और शिखा (लपट) धारण करनेसे शिखी हैं ।। ४३ ।। वैश्वानरस्त्वं पिङ्गेशः प्लवङ्गो भूरितेजसः । कुमारसूस्त्वं भगवान् रुद्रगर्भो हिरण्यकृत् ।। ४४ ।। आप ही वैश्वानर, पिंगेश, प्लवंग और भूरितेजस् नाम धारण करते हैं। आपने ही कुमार कार्तिकेयको जन्म दिया है, आप ही ऐश्वर्यसम्पन्न होनेके कारण भगवान् हैं। श्रीरुद्रका वीर्य धारण करनेसे आप रुद्रगर्भ कहलाते हैं। सुवर्णके उत्पादक होनेसे आपका नाम हिरण्यकृत् है ।। ४४ ।। अग्निर्ददातु मे तेजो वायुः प्राणं ददातु मे । पृथिवी बलमादध्याच्छिवं चापो दिशन्तु मे ।। ४५ ।।