भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1814

प्रजज्वाल ततः कोपाद् भगवान् हव्यवाहनः । तं दृष्ट्वा विस्मितो राजा जगाम शिरसावनिम् ॥ ३२ ॥ तब क्रोधसे भगवान् अग्निदेव अपने रूपमें प्रज्वलित हो उठे। उन्हें इस रूपमें देखकर राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने पृथ्वीपर मस्तक रखकर अग्निदेवको प्रणाम किया ॥ ३२ ॥

ततः कालेन तां कन्यां तथैव हि तदा नृपः । प्रददौ विप्ररूपाय वह्नये शिरसा नतः ॥ ३३ ॥ प्रतिगृह्य च तां सुभ्रूं नीलराज्ञः सुतां तदा । चक्रे प्रसादं भगवांस्तस्य राज्ञो विभावसुः ॥ ३४ ॥ तत्पश्चात् विवाहके योग्य समय आनेपर राजाने उस कन्याको ब्राह्मणरूपधारी अग्निदेवकी सेवामें अर्पित कर दिया और उनके चरणोंमें सिर रखकर नमस्कार किया। राजा नीलकी सुन्दरी कन्याको पत्नीरूपमें ग्रहण करके भगवान् अग्निने राजापर अपना कृपाप्रसाद प्रकट किया ॥ ३३-३४ ॥

वरेणच्छन्दयामास तं नृपं स्विष्टकृत्तमः । अभयं च स जग्राह स्वसैन्ये वै महीपतिः ॥ ३५ ॥ वे उनकी अभीष्ट-सिद्धिमें सर्वोत्तम सहायक हो राजासे वर माँगनेका अनुरोध करने लगे। राजाने अपनी सेनाके प्रति अभयदान माँगा ॥ ३५ ॥

ततः प्रभृति ये केचिदज्ञानात् तां पुरीं नृपाः । जिगीषन्ति बलाद् राजंस्ते दह्यन्ते स्म वह्निना ॥ ३६ ॥ राजन्! तभीसे जो कोई नरेश अज्ञानवश उस पुरीको बलपूर्वक जीतना चाहते, उन्हें अग्निदेव जला देते थे ॥ ३६ ॥

तस्यां पुर्यां तदा चैव माहिष्मत्यां कुरुद्वह । बभूवुरनतिग्राह्या योषितश्छन्दतः किल ॥ ३७ ॥ कुरुश्रेष्ठ जनमेजय! उस समय माहिष्मतीपुरीमें युवती स्त्रियाँ इच्छानुसार ग्रहण करनेके योग्य नहीं रह गयी थीं (क्योंकि वे स्वतन्त्रतासे ही वरका वरण किया करती थीं) ॥ ३७ ॥

एवमग्निवरं प्रादात् स्त्रीणामप्रतिवारणे । वरिण्यस्तत्र नार्यो हि यथेष्टं विचरन्त्युत ॥ ३८ ॥ अग्निदेवने स्त्रियोंके लिये यह वर दे दिया था कि अपने प्रतिकूल होनेके कारण ही कोई स्त्रियोंको वरका स्वयं ही वरण करनेसे रोक नहीं सकता। इससे वहाँकी स्त्रियाँ स्वेच्छापूर्वक वरका वरण करनेके लिये विचरण किया करती थीं ॥ ३८ ॥

वर्जयन्ति च राजानस्तत् पुरं भरतर्षभ । भयादग्नेर्महाराज तदाप्रभृति सर्वदा ॥ ३९ ॥