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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

वे कुन्तीनन्दन अर्जुन कार्तवीर्य अर्जुनके समान पराक्रमी, सगरपुत्रोंके समान बलवान्, परशुरामजीके समान अस्त्रविद्याके ज्ञाता, श्रीरामचन्द्रजीके समान समरविजयी, इन्द्रके समान रूपवान् तथा भगवान् सूर्यके समान तेजस्वी हैं।

देवदानवगन्धर्वैः पिशाचोरगराक्षसैः ।
मानुषैश्च समस्तैश्च अजेयः फाल्गुनो रणे ॥
देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस और मनुष्य ये सब मिलकर भी युद्धमें अर्जुनको परास्त नहीं कर सकते।

तेन तत् खाण्डवं दावं तर्पितं जातवेदसे ।
तरसा धर्षयित्वा तं शक्रं देवगणैः सह ॥
लब्धान्यस्त्राणि दिव्यानि तर्पयित्वा हुताशनम् ।
उन्होंने खाण्डववनको जलाकर अग्निदेवको तृप्त किया है। देवताओंसहित इन्द्रको वेगपूर्वक पराजित करके उन्होंने अग्निदेवको संतुष्ट किया और उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त किये हैं।

तेन लब्धा महाराज दुर्लभा देवतैरपि ।
वासुदेवस्य भगिनी सुभद्रा नाम विश्रुता ॥
महाराज! उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णकी बहिन सुभद्राको पत्नीरूपमें प्राप्त किया है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ थी।

अर्जुनस्यानुजो राजन् नकुलश्चेति विश्रुतः ॥
दर्शनीयतमो लोके मूर्तिमानिव मन्मथः ।
राजन्! अर्जुनके छोटे भाई नकुल नामसे विख्यात हैं, जो इस जगत्में मूर्तिमान् कामदेवके समान दर्शनीय हैं।

तस्यानुजो महातेजाः सहदेव इति श्रुतः ।
तेनाहं प्रेषितो राजन् सहदेवेन मारिष ॥
नकुलके छोटे भाई महातेजस्वी सहदेवके नामसे विख्यात हैं। माननीय महाराज! उन्हीं सहदेवने मुझे यहाँ भेजा है।

अहं घटोत्कचो नाम भीमसेनसुतो बली ।
मम माता महाभागा हिडिम्बा नाम राक्षसी ॥
मेरा नाम घटोत्कच है। मैं भीमसेनका बलवान् पुत्र हूँ। मेरी सौभाग्यशालिनी माताका नाम हिडिम्बा है। वे राक्षसकुलकी कन्या हैं।

पार्थानामुपकारार्थं चरामि पृथिवीमिमाम् ।
आसीत् पृथिव्याः सर्वस्या महीपालो युधिष्ठिरः ॥
मैं कुन्तीपुत्रोंका उपकार करनेके लिये ही इस पृथ्वीपर विचरता हूँ। महाराज युधिष्ठिर सम्पूर्ण भूमण्डलके शासक हो गये हैं।

राजसूयं क्रतुश्रेष्ठमाहर्तुमुपचक्रमे ।
संदिदेश च स भ्रातॄन् करार्थं सर्वतोदिशम् ॥
उन्होंने क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका अनुष्ठान करनेकी तैयारी की है। उन्हीं महाराजने अपने सब भाइयोंको कर वसूल करनेके लिये सब दिशाओंमें भेजा है।

वृष्णिवीरेण सहितः संदिदेशानुजान् नृपः ।
उदीचीमर्जुनस्तूर्णं करार्थं समुपाययौ ॥
वृष्णिवीर भगवान् श्रीकृष्णके साथ धर्मराजने जब अपने भाइयोंको दिग्विजयके लिये आदेश दिया, तब महाबली अर्जुन कर वसूल करनेके लिये तुरंत उत्तर दिशाकी ओर चल दिये।

गत्वा शतसहस्राणि योजनानि महाबलः ।
जित्वा सर्वान् नृपान् युद्धे हत्वा च तरसा वशी ॥
स्वर्गद्वारमुपागम्य रत्नान्यादाय वै भृशम् ।
उन्होंने लाख योजनकी यात्रा करके सम्पूर्ण राजाओंको युद्धमें हराया है और सामना करनेके लिये आये हुए विपक्षियोंको वेगपूर्वक मारा है। जितेन्द्रिय अर्जुनने स्वर्गके द्वारतक जाकर प्रचुर रत्न-राशि प्राप्त की है।

अश्वांश्च विविधान् दिव्यान् सर्वानदाय फाल्गुनः ॥
धनं बहुविधं राजन् धर्मपुत्राय वै ददौ ।
नाना प्रकारके दिव्य अश्व उन्हें भेंटमें मिले हैं। इस प्रकार भाँति-भाँतिके धन लाकर उन्होंने धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी सेवामें समर्पित किये हैं।

भीमसेनो हि राजेन्द्र जित्वा प्राचीं दिशं बलात् ॥
वशे कृत्वा महीपालान् पाण्डवाय धनं ददौ ।
राजेन्द्र! युधिष्ठिरके दूसरे भाई भीमसेनने पूर्व दिशामें जाकर उसे बलपूर्वक जीता है और वहाँके राजाओंको अपने वशमें करके पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको बहुत धन अर्पित किया है।

दिशं प्रतीचीं नकुलः करार्थं प्रययौ तथा ॥
सहदेवो दिशं याम्यां जित्वा सर्वान् महीक्षितः ।
नकुल कर लेनेके लिये पश्चिम दिशाकी ओर गये हैं और सहदेव सम्पूर्ण राजाओंको जीतते हुए दक्षिण दिशामें बढ़ते चले आये हैं।

मां संदिदेश राजेन्द्र करार्थमिह सत्कृतः ॥
पार्थानां चरितं तुभ्यं संक्षेपात् समुदाहृतम् ।
राजेन्द्र! उन्होंने बड़े सत्कारपूर्वक मुझे आपके यहाँ राजकीय कर देनेके लिये संदेश भेजा है। महाराज! पाण्डवोंका यह चरित्र मैंने अत्यन्त संक्षेपमें आपके समक्ष रखा है।

तमवेक्ष्य महाराज धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥

पावकं राजसूयं च भगवन्तं हरिं प्रभुम् ।
एतानवेक्ष्य धर्मज्ञ करं त्वं दातुमर्हसि ॥
आप धर्मराज युधिष्ठिरकी ओर देखिये, पवित्र करनेवाले राजसूययज्ञ तथा जगदीश्वर भगवान् श्रीहरिकी ओर भी ध्यान दीजिये। धर्मज्ञ नरेश! इन सबकी ओर दृष्टि रखते हुए आपको मुझे कर देना चाहिये।

वैशम्पायन उवाच

तेन तद् भाषितं श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः ।
प्रीतिमानभवद् राजन् धर्मात्मा सचिवैः सह ॥)
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! घटोत्कचकी वह बात सुनकर धर्मात्मा राक्षसराज विभीषण अपने मन्त्रियोंके साथ बड़े प्रसन्न हुए।
स चास्य प्रतिजग्राह शासनं प्रीतिपूर्वकम् ।
तच्च कालकृतं धीमानभ्यमन्यत स प्रभुः ॥ ७४ ॥
विभीषणने प्रेमपूर्वक ही उनका शासन स्वीकार कर लिया। शक्तिशाली एवं बुद्धिमान् विभीषणने उसे कालका ही विधान समझा ॥ ७४ ॥
(ततो ददौ विचित्राणि कम्बलानि कुथानि च ।
दन्तकाञ्चनपर्यङ्कान् मणिहेमविचित्रितान् ॥
उन्होंने सहदेवके लिये हाथीकी पीठपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल (कालीन) तथा हाथीदाँत और सुवर्णके बने हुए पलंग दिये, जिनमें सोने तथा रत्न जड़े हुए थे।
भूषणानि विचित्राणि महार्हाणि बहूनि च ।
प्रवालानि च शुभ्राणि मणींश्च विविधान् बहून् ॥
काञ्चनानि च भाण्डानि कलशानि घटानि च ।
कटाहान्यपि चित्राणि द्रोण्यश्चैव सहस्रशः ॥
इसके सिवा बहुत-से विचित्र और बहुमूल्य आभूषण भी भेंट किये। सुन्दर मूँगे, भाँति-भाँतिके मणिरत्न, सोनेके बर्तन, कलश, घड़े, विचित्र कड़ाहे और हजारों जलपात्र समर्पित किये।
राजतानि च भाण्डानि चित्राणि च बहूनि च ।
शस्त्राणि रुक्मचित्राणि मणिमुक्तैर्विचित्रितान् ॥
इनके सिवा चाँदीके भी बहुत-से ऐसे बर्तन दिये, जिनमें चित्रकारी की गयी थी। कुछ ऐसे शस्त्र भेंट किये, जिनमें सुवर्ण, मणि और मोती जड़े हुए थे।
यज्ञस्य तोरणे युक्तान् ददौ तालांश्चतुर्दश ।
रुक्मपङ्कजपुष्पाणि शिबिका मणिभूषिताः ॥

यज्ञके फाटकपर लगानेयोग्य चौदह ताड़ प्रदान किये। सुवर्णमय कमलपुष्प और मणिजटित शिबिकाएँ भी दीं।
मुकुटानि महार्हाणि हेमवर्णांश्च कुण्डलान् ।
हेमपुष्पाण्यनेकानि रुक्ममाल्यानि चापरान् ॥
शङ्खांश्च चन्द्रसंकाशाञ्छतावर्तन् विचित्रिणः ।
बहुमूल्य मुकुट, सुनहले कुण्डल, सोनेके बने हुए अनेकानेक पुष्प, सोनेके ही हार तथा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल एवं विचित्र शतावर्त शंख भेंट किये।
चन्दनानि च मुख्यानि रुक्मरत्नान्यनेकशः ।।
वासांसि च महार्हाणि कम्बलानि बहून्यपि ।
अन्यांश्च विविधान् राजन् रत्नानि च बहूनि च ।।
स ददौ सहदेवाय तदा राजा विभीषणः ।)
श्रेष्ठ चन्दन, अनेक प्रकारके सुवर्ण तथा रत्न, महँगे वस्त्र, बहुत-से कम्बल, अनेक जातिके रत्न तथा और भी भाँति-भाँतिके बहुमूल्य पदार्थ राजा विभीषणने सहदेवको भेंट किये।

ततः सम्प्रेषयामास रत्नानि विविधानि च ।
चन्दनागुरुकाष्ठानि दिव्यान्‍याभरणानि च ॥ ७५ ॥
वासांसि च महार्हाणि मणींश्चैव महाधनान् ।
तथा उन्होंने नाना प्रकारके रत्न, चन्दन, अगुरुके काष्ठ, दिव्य आभूषण, बहुमूल्य वस्त्र और विशेष मूल्यवान् मणि-रत्न भी उसके साथ भिजवाये ।। ७५ १/२ ।।

(विभीषणं च राजानमभिवाद्य कृताञ्जलिः ।।
प्रदक्षिणं परीत्यैव निर्जगाम घटोत्कचः ।
तदनन्तर घटोत्कचने हाथ जोड़कर राजा विभीषणको प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके वहाँसे प्रस्थान किया।

तानि सर्वाणि रत्नानि अष्टाशीतिर्निशाचराः ।।
आजह्नुः समुदा राजन् हैडिम्बेन तदा सह ।
राजन्! घटोत्कचके साथ अठासी निशाचर उन सब रत्नोंको पहुँचानेके लिये प्रसन्नतापूर्वक आये।

रत्नान्यादाय सर्वाणि प्रतस्थे स घटोत्कचः ।।
ततो रत्नान्युपादाय हैडिम्बो राक्षसैः सह ।
जगाम तूर्णं लङ्कायाः सहदेवपदं प्रति ।।
आसेदुः पाण्डवं सर्वे लङ्घयित्वा महोदधिम् ।।
इस प्रकार उन सब रत्नोंको साथ ले घटोत्कचने राक्षसोंके साथ लंकासे सहदेवके पड़ावकी ओर प्रस्थान किया और समुद्र लाँघकर वे सब-के-सब पाण्डुनन्दन सहदेवके

निकट आ पहुँचे। सहदेवो ददर्शार्थ रत्नाहारान् निशाचरान् । आगतान् भीमसंकाशान् हैडिम्बं च तथा नृप ॥ राजन्! सहदेवने रत्न लेकर आये हुए भयंकर निशाचरों तथा घटोत्कचको भी देखा। द्रमिला नैर्ऋतान् दृष्ट्वा दुद्रुवुस्ते भयार्दिताः । भैमसेनिस्ततो गत्वा माद्रेयं प्राञ्जलिः स्थितः ॥ उस समय उन राक्षसोंको देखकर द्राविड़ सैनिक भयभीत हो सब ओर भागने लगे। इतनेमें ही भीमसेनकुमार घटोत्कच माद्रीनन्दन सहदेवके पास आ हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। प्रीतिमानभवद् दृष्ट्वा रत्नौघं तं च पाण्डवः । तं परिष्वज्य पाणिभ्यां दृष्ट्वा तान् प्रीतिमानभूत् ॥ विसृज्य द्रमिलान् सर्वान् गमनायोपचक्रमे ।) पाण्डुकुमार सहदेव वह रत्न-राशि देखकर बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने घटोत्कचको दोनों हाथोंसे पकड़कर गले लगाया और दूसरे राक्षसोंकी ओर देखकर भी बड़ी प्रसन्नता प्रकट की। इसके बाद समस्त द्राविड़ सैनिकोंको विदा करके सहदेव वहाँसे लौटनेकी तैयारी करने लगे। न्यवर्तत ततो धीमान् सहदेवः प्रतापवान् ॥ ७६ ॥ तैयारी पूरी हो जानेपर प्रतापी और बुद्धिमान् सहदेव इन्द्रप्रस्थकी ओर चल दिये ॥ ७६ ॥ एवं निर्जित्य तरसा सान्त्वेन विजयेन च । करदान् पार्थिवान् कृत्वा प्रत्यागच्छदरिंदमः ॥ ७७ ॥ इस प्रकार बलपूर्वक जीतकर तथा सामनीतिसे समझा-बुझाकर सब राजाओंको अपने अधीन करके उन्हें करद बनाकर शत्रुदमन माद्रीनन्दन इन्द्रप्रस्थमें वापस आ गये ॥ ७७ ॥ (रत्नभारमुपादाय ययौ सह निशाचरैः । इन्द्रप्रस्थं विवेशाथ कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ रत्नोंका वह भारी भार साथ लिये निशाचरोंके साथ सहदेवने इन्द्रप्रस्थ नगरमें प्रवेश किया। उस समय वे पैरोंकी धमकसे सारी पृथ्वीको कम्पित करते हुए-से चल रहे थे। दृष्ट्वा युधिष्ठिरं राजन् सहदेवः कृताञ्जलिः । प्रह्वोऽभिवाद्य तस्थौ स पूजितश्चैव तेन वै ॥ राजन्! युधिष्ठिरको देखते ही सहदेव हाथ जोड़ नम्रतापूर्वक उनके चरणोंमें पड़ गये। फिर विनीतभावसे उनके समीप खड़े हो गये। उस समय युधिष्ठिरने भी उनका बहुत सम्मान किया। लङ्काप्राप्तान् धनौघांश्च दृष्ट्वा तान् दुर्लभान् बहून् ।

प्रीतिमानभवद् राजा विस्मयं च ययौ तदा ॥
लंकासे प्राप्त हुई अत्यन्त दुर्लभ एवं प्रचुर धनराशियोंको देखकर राजा युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न और विस्मित हुए।

कोटीसहस्रमधिकं हिरण्यस्य महात्मने ।
विचित्रांस्तु मणींश्चैव गोऽजाविमहिषांस्तथा ॥)
धर्मराजाय तत् सर्वं निवेद्य भरतर्षभ ।
कृतकर्मा सुखं राजन्नुवास जनमेजय ॥ ७८ ॥
भरतश्रेष्ठ जनमेजय! उस धनराशिमें सहस्र कोटिसे भी अधिक सुवर्ण था। विचित्र मणि एवं रत्न थे। गाय, भैंस, भेड़ और बकरियोंकी संख्या भी अधिक थी। राजन्! इन सबको महात्मा धर्मराजकी सेवामें समर्पित करके कृतकृत्य हो सहदेव सुखपूर्वक राजधानीमें रहने लगे ॥ ७८ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि सहदेवदक्षिणदिग्विजये एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०० श्लोक मिलाकर कुल १७८ श्लोक हैं)


* यह इक्ष्वाकुवंशीय दुर्जयका पुत्र था। इसका दूसरा नाम दुर्योधन था। यह राजा बड़ा धर्मात्मा था। इसकी कथा अनुशासनपर्वके दूसरे अध्यायमें आती है।
* जो अपने कानोंसे ही शरीरको ढक लें उन्हें ‘कर्णप्रावरण’ कहते हैं। प्राचीन कालमें ऐसी जातिके लोग थे, जिनके कान पैरोंतक लटकते थे।

अध्याय (पृष्ठ 1834)

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द्वात्रिंशोऽध्यायः

नकुलके द्वारा पश्चिम दिशाकी विजय

वैशम्पायन उवाच

नकुलस्य तु वक्ष्यामि कर्माणि विजयं तथा ।
वासुदेवजितामाशां यथासावजयत् प्रभुः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अब मैं नकुलके पराक्रम और विजयका वर्णन करूँगा। शक्तिशाली नकुलने जिस प्रकार भगवान् वासुदेवद्वारा अधिकृत पश्चिम दिशापर विजय पायी थी, वह सुनो ॥ १ ॥

निर्याय खाण्डवप्रस्थात् प्रतीचीमभितोदिशम् ।
उद्दिश्य मतिमान् प्रायान्महत्या सेनया सह ॥ २ ॥
बुद्धिमान् माद्रीकुमारने विशाल सेनाके साथ खाण्डवप्रस्थसे निकलकर पश्चिम दिशामें जानेके लिये प्रस्थान किया ॥ २ ॥

सिंहनादेन महता योधानां गर्जितेन च ।
रथनेमिनिनादैश्च कम्पयन् वसुधामिमाम् ॥ ३ ॥
वे अपने सैनिकोंके महान् सिंहनाद, गर्जना तथा रथके पहियोंकी घर्घरहाटकी तुमुल ध्वनिसे इस पृथ्वीको कम्पित करते हुए जा रहे थे ॥ ३ ॥

ततो बहुधनं रम्यं गवाढ्यं धनधान्यवत् ।
कार्तिकेयस्य दयितं रोहीतकमुपाद्रवत् ॥ ४ ॥
जाते-जाते वे बहुत धन-धान्यसे सम्पन्न, गौओंकी बहुलतासे युक्त तथा स्वामिकार्तिकेयके अत्यन्त प्रिय रमणीय रोहीतक* पर्वत एवं उसके समीपवर्ती देशमें जा पहुँचे ॥ ४ ॥

तत्र युद्धं महच्चासीच्छूरैर्मत्तमयूरकैः ।
मरुभूमिं स कार्त्स्न्येन तथैव बहुधान्यकम् ॥ ५ ॥
शैरीषकं महोत्थं च वशे चक्रे महाद्युतिः ।
आक्रोशं चैव राजर्षिं तेन युद्धमभून्महत् ॥ ६ ॥
वहाँ उनका मत्तमयूर नामवाले शूरवीर क्षत्रियोंके साथ घोर संग्राम हुआ। उसपर अधिकार करनेके पश्चात् महान् तेजस्वी नकुलने समूची मरुभूमि (मारवाड़), प्रचुर धन-धान्यपूर्ण शैरीषक और महोत्थ नामक देशोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया। महोत्थ देशके अधिपति राजर्षि आक्रोशको भी जीत लिया। आक्रोशके साथ उनका बड़ा भारी युद्ध हुआ था ॥ ५-६ ॥

तान् दशार्णान् स जित्वा च प्रतस्थे पाण्डुनन्दनः ।

शिबींस्त्रिगर्तानम्बष्ठान् मालवान् पञ्चकर्पटान् ।। ७ ।।
तथा माध्यमिकांश्चैव वाटधानान् द्विजानथ ।
तत्पश्चात् दशार्णदेशपर विजय प्राप्त करके पाण्डुनन्दन नकुलने शिबि, त्रिगर्त, अम्बष्ठ, मालव, पंचकर्पट एवं माध्यमिक देशोंको प्रस्थान किया और उन सबको जीतकर वाटधानदेशीय क्षत्रियोंको भी हराया ।। ७ १/२ ।।

पुनश्च परिवृत्याथ पुष्करारण्यवासिनः ।। ८ ।।
गणानुत्सवसंकेतान् व्यजयत् पुरुषर्षभः ।
पुनः उधरसे लौटकर नरश्रेष्ठ नकुलने पुष्करारण्य-निवासी उत्सवसंकेत नामक गणोंको परास्त किया ।। ८ १/२ ।।

सिन्धुकूलाश्रिता ये च ग्रामणीया महाबलाः ।। ९ ।।
शूद्राभीरगणांश्चैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम् ।
वर्तयन्ति च ये मत्स्यैर्यै च पर्वतवासिनः ।। १० ।।
समुद्रके तटपर रहनेवाले जो महाबली ग्रामणीय (ग्राम शासकके वंशज) क्षत्रिय थे, सरस्वती नदीके किनारे निवास करनेवाले जो शूद्र आभीरगण थे, मछलियोंसे जीविका चलानेवाले जो धीवर जातिके लोग थे तथा जो पर्वतोंपर वास करनेवाले दूसरे-दूसरे मनुष्य थे, उन सबको नकुलने जीतकर अपने वशमें कर लिया ।। ९-१० ।।

कृत्स्नं पञ्चनदं चैव तथैवामरपर्वतम् ।
उत्तरज्योतिषं चैव तथा दिव्यकटं पुरम् ।। ११ ।।
द्वारपालं च तरसा वशे चक्रे महाद्युतिः ।
फिर सम्पूर्ण पंचनददेश (पंजाब), अमरपर्वत, उत्तरज्योतिष, दिव्यकट नगर और द्वारपालपुरको अत्यन्त कान्तिमान् नकुलने शीघ्र ही अपने अधिकारमें कर लिया ।। ११ १/२ ।।

रामठान् हारहूणांश्च प्रतीच्यांश्चैव ये नृपाः ।। १२ ।।
तान् सर्वान् स वशे चक्रे शासनादेव पाण्डवः ।
तत्रस्थः प्रेषयामास वासुदेवाय भारत ।। १३ ।।
रामठ, हार, हूण तथा अन्य जो पश्चिमी नरेश थे, उन सबको पाण्डुकुमार नकुलने आज्ञामात्रसे ही अपने अधीन कर लिया। भारत! वहीं रहकर उन्होंने वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके पास दूत भेजा ।। १२-१३ ।।

स चास्य गतभी राजन् प्रतिजग्राह शासनम् ।
ततः शाकलमभ्येत्य मद्राणां पुटभेदनम् ।। १४ ।।
मातुलं प्रीतिपूर्वेण शल्यं चक्रे वशे बली ।

राजन्! उन्होंने केवल प्रेमके कारण नकुलका शासन स्वीकार कर लिया। इसके बाद शाकलदेशको जीतकर बलवान् नकुलने मद्रदेशकी राजधानीमें प्रवेश किया और वहाँके शासक अपने मामा शल्यको प्रेमसे ही वशमें कर लिया ।। १४ १/२ ।।
स तेन सत्कृतो राज्ञा सत्कारार्हो विशाम्पते ।। १५ ।।
रत्नानि भूरीण्यादाय सम्प्रतस्थे युधाम्पतिः ।
राजन्! राजा शल्यने सत्कारके योग्य नकुलका यथावत् सत्कार किया। शल्यसे भेंटमें बहुत-से रत्न लेकर योद्धाओंके अधिपति माद्रीकुमार आगे बढ़ गये ।। १५ १/२ ।।
ततः सागरकुक्षिस्थान् म्लेच्छान् परमदारुणान् ।। १६ ।।
पह्लवान् बर्बरांश्चैव किरातान् यवनाञ्छकान् ।
ततो रत्नान्युपादाय वशे कृत्वा च पार्थिवान् ।
न्यवर्तत कुरुश्रेष्ठो नकुलश्चित्रमार्गवित् ।। १७ ।।
तदनन्तर समुद्री टापुओंमें रहनेवाले अत्यन्त भयंकर म्लेच्छ, पह्लव, बर्बर, किरात, यवन और शकोंको जीतकर उनसे रत्नोंकी भेंट ले विजयके विचित्र उपायोंके जाननेवाले कुरुश्रेष्ठ नकुल इन्द्रप्रस्थकी ओर लौटे ।। १६-१७ ।।
करभाणां सहस्राणि कोशं तस्य महात्मनः ।
ऊहुर्दश महाराज कृच्छ्रादिव महाधनम् ।। १८ ।।
महाराज! उन महामना नकुलके बहुमूल्य खजानेका बोझ दस हजार हाथी बड़ी कठिनाईसे ढो रहे थे ।। १८ ।।
इन्द्रप्रस्थगतं वीरमभ्येत्य स युधिष्ठिरम् ।
ततो माद्रीसुतः श्रीमान् धनं तस्मै न्यवेदयत् ।। १९ ।।
तदनन्तर श्रीमान् माद्रीकुमारने इन्द्रप्रस्थमें विराजमान वीरवर राजा युधिष्ठिरसे मिलकर वह सारा धन उन्हें समर्पित कर दिया ।। १९ ।।
एवं विजित्य नकुलो दिशं वरुणपालिताम् ।
प्रतीचीं वासुदेवेन निर्जितां भरतर्षभ ।। २० ।।
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवान् वासुदेवके द्वारा अपने अधिकारमें की हुई, वरुणपालित पश्चिम दिशापर विजय पाकर नकुल इन्द्रप्रस्थ लौट आये ।। २० ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि नकुलप्रतीचीविजये द्वात्रिंशोऽध्यायः ।। ३२ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें नकुलके द्वारा पश्चिम दिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३२ ।।

* - इसीको आजकल रोहतक (पंजाब) कहते हैं।

(राजसूयपर्व)

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(राजसूयपर्व)

त्रयस्त्रिंंशोऽध्यायः

युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना

वैशम्पायन उवाच

(एवं निर्जित्य पृथिवीं भ्रातरः कुरुनन्दन ।
वर्तमानाः स्वधर्मेण शशासुः पृथिवीमिमाम् ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**कुशनन्दन! इस प्रकार सारी पृथ्‍वीको जीतकर अपने धर्मके अनुसार बर्ताव करते हुए पाँचों भाई पाण्डव इस भूमण्डलका शासन करने लगे।

चतुर्भिर्भीमसेनाद्यैर्भ्रातृभिः सहितो नृपः ।
अनुगृह्य प्रजाः सर्वाः सर्ववर्णानगोपयत् ॥
भीमसेन आदि चारों भाइयोंके साथ राजा युधिष्ठिर सम्पूर्ण प्रजापर अनुग्रह करते हुए सब वर्णके लोगोंको संतुष्ट रखते थे।

अविरोधेन सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिरः ।
प्रीयतां दीयतां सर्वं मुक्त्वा कोषं बलं विना ॥
साधु धर्मेति पार्थस्य नान्यच्छ्रूयेत भाषितम् ।
युधिष्ठिर किसीका भी विरोध न करके सबके हितसाधनमें लगे रहते थे। 'सबको तृप्त एवं प्रसन्न किया जाय, खजाना खोलकर सबको खुले हाथ दान दिया जाय, किसीपर बलप्रयोग न किया जाय, धर्म! तुम धन्य हो।' इत्यादि बातोंके सिवा युधिष्ठिरके मुखसे और कुछ नहीं सुनायी पड़ता था।

एवंवृत्ते जगत् तस्मिन् पितरीवान्वरज्यत ॥
न तस्य विद्यते द्वेष्टा ततोऽस्याजातशत्रुता ।)
उनके ऐसे बर्तावके कारण सारा जगत् उनके प्रति वैसा ही अनुराग रखने लगा, जैसे पुत्र पिताके प्रति अनुरक्त होता है। राजा युधिष्ठिरसे द्वेष रखनेवाला कोई नहीं था, इसीलिये वे 'अजातशत्रु' कहलाते थे।

रक्षणाद् धर्मराजस्य सत्यस्य परिपालनात् । शत्रूणां क्षपणाच्चैव स्वकर्मनिरताः प्रजाः ॥ १ ॥ धर्मराज युधिष्ठिर प्रजाकी रक्षा, सत्यका पालन और शत्रुओंका संहार करते थे। उनके इन कार्योंसे निश्चिन्त एवं उत्साहित होकर प्रजावर्गके सब लोग अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंके पालनमें संलग्न रहते थे ॥ १ ॥

बलीनां सम्यगादानाद् धर्मतश्चानुशासनात् । निकामवर्षी पर्जन्यः स्फीतो जनपदोऽभवत् ॥ २ ॥ न्यायपूर्वक कर लेने और धर्मपूर्वक शासन करनेसे उनके राज्यमें मेघ इच्छानुसार वर्षा करते थे। इस प्रकार युधिष्ठिरका सम्पूर्ण जनपद धन-धान्यसे सम्पन्न हो गया था ॥ २ ॥

सर्वारम्भाः सुप्रवृत्ता गोरक्षा कर्षणं वणिक् । विशेषात् सर्वमेवैतत् संजज्ञे राजकर्मणः ॥ ३ ॥ गोरक्षा, खेती और व्यापार आदि सभी कार्य अच्छे ढंगसे होने लगे। विशेषतः राजाकी सुव्यवस्थासे ही यह सब कुछ उत्तमरूपसे सम्पन्न होता था ॥ ३ ॥

दस्युभ्यो वञ्चकेभ्यो वा राजन् प्रति परस्परम् । राजवल्लभतश्चैव नाश्रूयन्त मृषा गिरः ॥ ४ ॥ राजन्! औरोंकी तो बात ही क्या है, चोरों, ठगों, राजा अथवा राजाके विश्वासपात्र व्यक्तियोंके मुखसे भी वहाँ कोई झूठी बात नहीं सुनी जाती थी। केवल प्रजाके साथ ही नहीं, आपसमें भी वे लोग झूठ-कपटका बर्ताव नहीं करते थे ॥ ४ ॥

अवर्षं चातिवर्षं च व्याधिपावकमूर्च्छनम् । सर्वमेतत् तदा नासीद् धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ॥ ५ ॥ धर्मपरायण युधिष्ठिरके शासनकालमें अनावृष्टि, अतिवृष्टि, रोग-व्याधि तथा आग लगने आदि उपद्रवोंका नाम भी नहीं था ॥ ५ ॥

प्रियं कर्तुमुपस्थातुं बलिकर्म स्वभावजम् । अभिहर्तुं नृपा जग्मुर्नान्यैः कार्यैः कथंचन ॥ ६ ॥ राजा लोग उनके यहाँ स्वाभाविक भेंट देने अथवा उनका कोई प्रिय कार्य करनेके लिये ही आते थे, युद्ध आदि दूसरे किसी कामसे नहीं ॥ ६ ॥

धर्म्यैर्धनागमैस्तस्य ववृधे निचयो महान् । कर्तुं यस्य न शक्येत क्षयो वर्षशतैरपि ॥ ७ ॥ धर्मपूर्वक प्राप्त होनेवाले धनकी आयसे उनका महान् धन-भण्डार इतना बढ़ गया था कि सैकड़ों वर्षोंतक खुले हाथ लुटानेपर भी उसे समाप्त नहीं किया जा सकता था ॥ ७ ॥

स्वकोषस्य परीमाणं कोशस्य च महीपतिः । विज्ञाय राजा कौन्तेयो यज्ञायैव मनो दधे ॥ ८ ॥

कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरने अपने अन्न-वस्त्रके भंडार तथा खजानेका परिमाण जानकर यज्ञ करनेका ही निश्चय किया ॥ ८ ॥ सुहृदश्चैव ये सर्वे पृथक् च सह चाब्रुवन् । यज्ञकालस्तव विभो क्रियतामत्र साम्प्रतम् ॥ ९ ॥ उनके जितने हितैषी सुहृद् थे, वे सभी अलग-अलग और एक साथ यही कहने लगे—‘प्रभो! यह आपके यज्ञ करनेका उपयुक्त समय आया है; अतः अब उसका आरम्भ कीजिये’ ॥ ९ ॥ अथैवं ब्रुवतामेव तेषामभ्याययौ हरिः । ऋषिः पुराणो वेदात्मादृश्यश्चैव विजानताम् ॥ १० ॥ वे सुहृद् इस तरहकी बातें कर ही रहे थे कि उसी समय भगवान् श्रीहरि आ पहुँचे। वे पुराणपुरुष, नारायण ऋषि, वेदात्मा एवं विज्ञानीजनोंके लिये भी अगम्य परमेश्वर हैं ॥ १० ॥ जगतस्तस्थुषां श्रेष्ठः प्रभवश्चाप्ययश्च ह । भूतभव्यभवन्नाथः केशवः केशिसूदनः ॥ ११ ॥ वे ही स्थावर-जंगम प्राणियोंके उत्तम उत्पत्ति-स्थान और लयके अधिष्ठान हैं। भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंके नियन्ता हैं। वे ही केशी दैत्यको मारनेवाले केशव हैं ॥ ११ ॥ प्राकारः सर्ववृष्णीनामापत्स्वभयदोऽरिहा । बलाधिकारे निक्षिप्य सम्यगानकदुन्दुभिम् ॥ १२ ॥ उच्चावचमुपादाय धर्मराजाय माधवः । धनौघं पुरुषव्याघ्रो बलेन महताऽऽवृतः ॥ १३ ॥ वे सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंके परकोटेकी भाँति संरक्षक, आपत्तिमें अभय देनेवाले तथा उनके शत्रुओंका संहार करनेवाले हैं। पुरुषसिंह माधव अपने पिता वसुदेवजीको द्वारकाकी सेनाके आधिपत्यपर स्थापित करके धर्मराजके लिये नाना प्रकारके धन-रत्नोंकी भेंट ले विशाल सेनाके साथ वहाँ आये थे ॥ १२-१३ ॥ तं धनौघमपर्यन्तं रत्नसागरमक्षयम् । नादयन् रथघोषेण प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥ १४ ॥ उस धनराशिकी कहीं सीमा नहीं थी, मानो रत्नोंका अक्षय महासागर हो। उसे लेकर रथोंकी आवाजसे समूची दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए वे उत्तम नगर इन्द्रप्रस्थमें प्रविष्ट हुए ॥ १४ ॥ पूर्णमापूरयंस्तेषां द्विषच्छोकावहोऽभवत् । असूर्यमिव सूर्येण निवातमिव वायुना । कृष्णेन समुपेतेन जहृषे भारतं पुरम् ॥ १५ ॥

पाण्डवोंका धन-भण्डार तो यों ही भरा-पूरा था, भगवान्ने (उन्हें अक्षय धनकी भेंट देकर) उसे और भी पूर्ण कर दिया। उनका शुभागमन पाण्डवोंके शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाला था। बिना सूर्यका अन्धकारपूर्ण जगत् सूर्योदय होनेसे जिस प्रकार प्रकाशसे भर जाता है, बिना वायुके स्थानमें वायुके चलनेसे जैसे नूतन प्राण-शक्तिका संचार हो उठता है, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके पदार्पण करनेपर समस्त इन्द्रप्रस्थमें हर्षोल्लास छा गया ।। १५ ।।

तं मुदाभिसमागम्य सत्कृत्य च यथाविधि ।
स पृष्ट्वा कुशलं चैव सुखासीनं युधिष्ठिरः ।। १६ ।।
धौम्यद्वैपायनमुखैर्ऋत्विग्भिः पुरुषर्षभ ।
भीमार्जुनयमैश्चैव सहितः कृष्णमब्रवीत् ।। १७ ।।
नरश्रेष्ठ जनमेजय! राजा युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न होकर उनसे मिले। उनका विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार करके कुशलमंगल पूछा और जब वे सुखपूर्वक बैठ गये, तब धौम्य, द्वैपायन आदि ऋत्विजों तथा भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव—चारों भाइयोंके साथ निकट जाकर युधिष्ठिरने श्रीकृष्णसे कहा ।। १६-१७ ।।

युधिष्ठिर उवाच

त्वत्कृते पृथिवी सर्वा मद्वशे कृष्ण वर्तते ।
धनं च बहु वार्ष्णेय त्वत्प्रसादादुपार्जितम् ।। १८ ।।
युधिष्ठिरने कहा— श्रीकृष्ण! आपकी दयासे आपकी सेवाके लिये सारी पृथ्वी इस समय मेरे अधीन हो गयी है। वार्ष्णेय! मुझे धन भी बहुत प्राप्त हो गया है ।। १८ ।।

सोऽहमिच्छामि तत् सर्वं विधिवद् देवकीसुत ।
उपयोक्तुं द्विजाग्र्येभ्यो हव्यवाहे च माधव ।। १९ ।।
देवकीनन्दन माधव! वह सारा धन मैं विधिपूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा हव्यवाहन अग्निके उपयोगमें लाना चाहता हूँ ।। १९ ।।

तदहं यष्टुमिच्छामि दाशार्ह सहितस्त्वया ।
अनुजैश्च महाबाहो तन्मानुज्ञातुमर्हसि ।। २० ।।
महाबाहु दाशार्ह! अब मैं आप तथा अपने छोटे भाइयोंके साथ यज्ञ करना चाहता हूँ। इसके लिये आप मुझे आज्ञा दें ।। २० ।।

तद् दीक्षापय गोविन्द त्वमात्मानं महाभुज ।
त्वयीष्टवति दाशार्ह विपाप्मा भविता ह्यहम् ।। २१ ।।
विशाल भुजाओंवाले गोविन्द! आप स्वयं यज्ञकी दीक्षा ग्रहण कीजिये। दाशार्ह! आपके यज्ञ करनेपर मैं पापरहित हो जाऊँगा ।। २१ ।।

मां वाप्यभ्यनुजानीहि सहैभिरनुजैर्विभो ।

अनुज्ञातस्त्वया कृष्ण प्राप्नुयां क्रतुमुत्तमम् ॥ २२ ॥ प्रभो! अथवा मुझे अपने इन छोटे भाइयोंके साथ दीक्षा ग्रहण करनेकी आज्ञा दीजिये। श्रीकृष्ण! आपकी अनुज्ञा मिलनेपर ही मैं उस उत्तम यज्ञकी दीक्षा ग्रहण करूँगा ॥ २२ ॥

वैशम्पायन उवाच

तं कृष्णः प्रत्युवाचेदं बहूक्त्वा गुणविस्तरम् । त्वमेव राजशार्दूल सम्राडर्हो महाक्रतुम् । सम्प्राप्नुहि त्वया प्राप्ते कृतकृत्यास्ततो वयम् ॥ २३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब भगवान् श्रीकृष्णने राजसूययज्ञके गुणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन करके उनसे इस प्रकार कहा—'राजसिंह! आप सम्राट् होने योग्य हैं, अतः आप ही इस महान् यज्ञकी दीक्षा ग्रहण कीजिये। आपके दीक्षा लेनेपर हम सबलोग कृतकृत्य हो जायेंगे ॥ २३ ॥

यजस्वाभीप्सितं यज्ञं मयि श्रेयस्यवस्थिते । नियुङ्क्ष्व त्वं च मां कृत्ये सर्वं कर्तास्मि ते वचः ॥ २४ ॥ आप अपने इस अभीष्ट यज्ञको प्रारम्भ कीजिये। मैं आपका कल्याण करनेके लिये सदा उद्यत हूँ। मुझे आवश्यक कार्यमें लगाइये, मैं आपकी सब आज्ञाओंका पालन करूँगा' ॥ २४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

सफलः कृष्ण संकल्पः सिद्धिश्च नियता मम । यस्य मे त्वं हृषीकेश यथेप्सितमुपस्थितः ॥ २५ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**श्रीकृष्ण मेरा संकल्प सफल हो गया, मेरी सिद्धि सुनिश्चित है; क्योंकि हृषीकेश! आप मेरी इच्छाके अनुसार स्वयं ही यहाँ उपस्थित हो गये हैं ॥ २५ ॥

वैशम्पायन उवाच

अनुज्ञातस्तु कृष्णेन पाण्डवो भ्रातृभिः सह । ईजितुं राजसूयेन साधनान्युपचक्रमे ॥ २६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णसे आज्ञा लेकर भाइयोंसहित पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने राजसूययज्ञ करनेके लिये साधन जुटाना आरम्भ किया ॥ २६ ॥

ततस्त्वाज्ञापयामास पाण्डवोऽरिनिबर्हणः । सहदेवं युधां श्रेष्ठं मन्त्रिणश्चैव सर्वशः ॥ २७ ॥ उस समय शत्रुओंका संहार करनेवाले पाण्डुकुमारने योद्धाओंमें श्रेष्ठ सहदेव तथा सम्पूर्ण मन्त्रियोंको आज्ञा दी ॥ २७ ॥

अस्मिन् क्रतौ यथोक्तानि यज्ञाङ्गानि द्विजातिभिः ।

तथोपकरणं सर्वं मङ्गलानि च सर्वशः ॥ २८ ॥ अधियज्ञांश्च सम्भारान् धौम्योक्तान् क्षिप्रमेव हि । समानयन्तु पुरुषा यथायोगं यथाक्रमम् ॥ २९ ॥ 'इस यज्ञके लिये ब्राह्मणोंके बताये अनुसार यज्ञके अंगभूत सामान, आवश्यक उपकरण, सब प्रकारकी मांगलिक वस्तुएँ तथा धौम्यजीकी बतायी हुई यज्ञोपयोगी सामग्री—इन सभी वस्तुओंको क्रमशः जैसे मिलें, वैसे शीघ्र ही अपने सेवक जाकर ले आवें ॥ २८-२९ ॥

इन्द्रसेनो विशोकश्च पूरुश्चार्जुनसारथिः । अन्नाद्याहरणे युक्ताः सन्तु मत्प्रियकाम्यया ॥ ३० ॥ 'इन्द्रसेन, विशोक और अर्जुनका सारथि पूरु, ये मेरा प्रिय करनेकी इच्छासे अन्न आदिके संग्रहके कामपर जुट जायँ ॥ ३० ॥

सर्वकामाश्च कार्यन्तां रसगन्धसमन्विताः । मनोरथप्रीतिकरा द्विजानां कुरुसत्तम ॥ ३१ ॥ 'कुरुश्रेष्ठ! जिनको खानेकी प्रायः सभी इच्छा करते हैं, वे रस और गन्धसे युक्त भाँति-भाँतिके मिष्टान्न आदि तैयार कराये जाँय, जो ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार प्रीति प्रदान करनेवाले हों' ॥ ३१ ॥

तद्वाक्यसमकालं च कृतं सर्वं न्यवेदयत् । सहदेवो युधां श्रेष्ठो धर्मराजे युधिष्ठिरे ॥ ३२ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरकी यह बात समाप्त होते ही योद्धाओंमें श्रेष्ठ सहदेवने उनसे निवेदन किया, 'यह सब व्यवस्था हो चुकी है' ॥ ३२ ॥

ततो द्वैपायनो राजन्नृत्विजः समुपानयत् । वेदानिव महाभागान् साक्षान्मूर्तिमतो द्विजान् ॥ ३३ ॥ राजन्! तदनन्तर द्वैपायन व्यासजी बहुत-से ऋत्विजोंको ले आये। वे महाभाग ब्राह्मण मानो साक्षात् मूर्तिमान् वेद ही थे ॥ ३३ ॥

स्वयं ब्रह्मत्वमकरोत् तस्य सत्यवतीसुतः । धनंजयानामृषभः सुसामा सामगोऽभवत् ॥ ३४ ॥ स्वयं सत्यवतीनन्दन व्यासने उस यज्ञमें ब्रह्माका काम सँभाला। धनंजयगोत्रीय ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ सुसामा सामगान करनेवाले हुए ॥ ३४ ॥

याज्ञवल्क्यो बभूवाथ ब्रह्मिष्ठोऽध्वर्युसत्तमः । पैलो होता वसोः पुत्रो धौम्येन सहितोऽभवत् ॥ ३५ ॥ और ब्रह्मनिष्ठ याज्ञवल्क्य उस यज्ञके श्रेष्ठतम अध्वर्यु थे। वसुपुत्र पैल धौम्य मुनिके साथ होता बने थे ॥ ३५ ॥

एतेषां पुत्रवर्गाश्च शिष्याश्च भरतर्षभ ।

बभूवुर्होत्रगाः सर्वे वेदवेदाङ्गपारगाः ॥ ३६ ॥
भरतश्रेष्ठ! इनके पुत्र और शिष्यवर्गके लोग, जो सब-के-सब वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् थे, ‘होत्रग’ (सप्तहोता) हुए ॥ ३६ ॥

ते वाचयित्वा पुण्याहमूहयित्वा च तं विधिम् ।
शास्त्रोक्तं पूजयामासुस्तद् देवयजनं महत् ॥ ३७ ॥

उन सबने पुण्याहवाचन कराकर उस विधिका ऊहन (अर्थात् ‘राजसूयेन यक्ष्ये, स्वाराज्यमवाप्नवानि’—मैं स्वराज्य प्राप्त करूँ, इस उद्देश्यसे राजसूययज्ञ करूँगा, इत्यादि रूपसे संकल्प) कराकर शास्त्रोक्त विधिसे उस महान् यज्ञस्थानका पूजन कराया ॥ ३७ ॥

तत्र चक्रुरनुज्ञाताः शरणान्युत शिल्पिनः ।
गन्धवन्ति विशालानि वेश्मानीव दिवौकसाम् ॥ ३८ ॥

उस स्थानपर राजाकी आज्ञासे शिल्पियोंने देवमन्दिरोंके समान विशाल एवं सुगन्धित भवन बनाये ॥ ३८ ॥

तत आज्ञापयामास स राजा राजसत्तमः ।
सहदेवं तदा सद्यो मन्त्रिणं पुरुषर्षभः ॥ ३९ ॥
आमन्त्रणार्थं दूतांस्त्वं प्रेषयस्वाशुगान् द्रुतम् ।
उपश्रुत्य वचो राज्ञः स दूतान् प्राहिणोत् तदा ॥ ४० ॥

तदनन्तर राजशिरोमणि नरश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरने तुरंत ही मन्त्री सहदेवको आज्ञा दी, ‘सब राजाओं तथा ब्राह्मणोंको आमन्त्रित करनेके लिये तुरंत ही शीघ्रगामी दूत भेजो।’ राजाकी यह बात सुनकर सहदेवने दूतोंको भेजा और कहा— ॥ ३९-४० ॥

आमन्त्रयध्वं राष्ट्रेषु ब्राह्मणान् भूमिपानथ ।
विशश्च मान्यान् शूद्रांश्च सर्वानानयतेति च ॥ ४१ ॥

‘तुमलोग सभी राज्योंमें घूम-घूमकर वहाँके राजाओं, ब्राह्मणों, वैश्यों तथा सब माननीय शूद्रोंको निमन्त्रित कर दो और बुला ले आओ’ ॥ ४१ ॥

वैशम्पायन उवाच

समाज्ञप्तास्ततो दूताः पाण्डवेयस्य शासनात् ।
आमन्त्रयाम्बभूवुश्च आनयंश्चापरान् द्रुतम् ।
तथा परानपि नरानात्मनः शीघ्रगामिनः ॥ ४२ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरके आदेशसे सहदेवकी आज्ञा पाकर सब शीघ्रगामी दूत गये और उन्होंने ब्राह्मण आदि सब वर्णोंके लोगोंको निमन्त्रित किया तथा बहुतोंको वे अपने साथ ही शीघ्र बुला लाये। वे अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाले अन्य व्यक्तियोंको भी साथ लाना न भूले ॥ ४२ ॥

ततस्ते तु यथाकालं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । दीक्षयाञ्चक्रिरे विप्रा राजसूयाय भारत ॥ ४३ ॥ भारत! तदनन्तर वहाँ आये हुए सब ब्राह्मणोंने ठीक समयपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको राजसूययज्ञकी दीक्षा दी ॥ ४३ ॥

दीक्षितः स तु धर्मात्मा धर्मराजो युधिष्ठिरः । जगाम यज्ञायतनं वृतो विप्रैः सहस्रशः ॥ ४४ ॥ यज्ञकी दीक्षा लेकर धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिर सहस्रों ब्राह्मणोंसे घिरे हुए यज्ञमण्डपमें गये ॥ ४४ ॥

भ्रातृभिर्ज्ञातिभिश्चैव सुहृद्भिः सचिवैः सह । क्षत्रियैश्च मनुष्येन्द्रैर्नानादेशसमागतैः ॥ ४५ ॥ अमात्यैश्च नरश्रेष्ठो धर्मो विग्रहवानिव । उस समय उनके सगे भाई, जाति-बन्धु, सुहृद्, सहायक अनेक देशोंसे आये हुए क्षत्रिय-नरेश तथा मन्त्रिगण भी थे। नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर मूर्तिमान् धर्म ही जान पड़ते थे ॥ ४५ १/२ ॥

आजग्मुर्ब्राह्मणास्तत्र विषयेभ्यस्ततस्ततः ॥ ४६ ॥ सर्वविद्यासु निष्णाता वेदवेदाङ्गपारगाः । तत्पश्चात् वहाँ भिन्न-भिन्न देशोंसे ब्राह्मणलोग आये, जो सम्पूर्ण विद्याओंमें निष्णात तथा वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् थे ॥ ४६ १/२ ॥

तेषामावसथांश्चक्रुर्धर्मराजस्य शासनात् ॥ ४७ ॥ बह्वन्नाच्छादनैर्युक्तान् सगणानां पृथक् पृथक् । सर्वर्तुगुणसम्पन्नान् शिल्पिनोऽथ सहस्रशः ॥ ४८ ॥ धर्मराजकी आज्ञासे हजारों शिल्पियोंने आत्मीयजनोंके साथ आये हुए उन ब्राह्मणोंके ठहरनेके लिये पृथक्-पृथक् घर बनाये थे, जो बहुत-से अन्न और वस्त्रोंसे परिपूर्ण थे और जिनमें सभी ऋतुओंमें सुखपूर्वक रहनेकी सुविधाएँ थीं ॥ ४७-४८ ॥

तेषु ते न्यवसन् राजन् ब्राह्मणा नृपसत्कृताः । कथयन्तः कथा बह्वीः पश्यन्तो नटनर्तकान् ॥ ४९ ॥ राजन्! उन गृहोंमें वे ब्राह्मणलोग राजासे सत्कार पाकर निवास करने लगे। वहाँ वे नाना प्रकारकी कथाएँ कहते और नट-नर्तकोंके खेल देखते थे ॥ ४९ ॥

भुज्यतां चैव विप्राणां वदतां च महास्वनः । अनिशं श्रूयते तत्र मुदितानां महात्मनाम् ॥ ५० ॥ वहाँ भोजन करते और बोलते हुए आनन्दमग्न महात्मा ब्राह्मणोंका निरन्तर महान् कोलाहल सुनायी पड़ता था ॥ ५० ॥

दीयतां दीयतामेषां भुज्यतां भुज्यतामिति ।

एवम्प्रकाराः संजल्पाः श्रूयन्ते स्मात्र नित्यशः ॥ ५१ ॥
‘इनको दीजिये, इन्हें परोसिये, भोजन कीजिये, भोजन कीजिये’ इसी प्रकारके शब्द वहाँ प्रतिदिन कानोंमें पड़ते थे ॥ ५१ ॥
गवां शतसहस्राणि शयनानां च भारत ।
रुक्मस्य योषितां चैव धर्मराजः पृथग् ददौ ॥ ५२ ॥
भारत! धर्मराज युधिष्ठिरने एक लाख गौएँ, उतनी ही शय्याएँ, एक लाख स्वर्णमुद्राएँ तथा उतनी ही अविवाहित युवतियाँ पृथक्-पृथक् ब्राह्मणोंको दान कीं ॥ ५२ ॥
प्रावर्ततैव यज्ञः स पाण्डवस्य महात्मनः ।
पृथिव्यामेकवीरस्य शक्रस्येव त्रिविष्टपे ॥ ५३ ॥
इस प्रकार स्वर्गमें इन्द्रकी भाँति भूमण्डलमें अद्वितीय वीर महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका वह यज्ञ प्रारम्भ हुआ ॥ ५३ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा प्रेषयामास पाण्डवम् ।
नकुलं हास्तिनपुरं भीष्माय पुरुषर्षभः ॥ ५४ ॥
द्रोणाय धृतराष्ट्राय विदुराय कृपाय च ।
भ्रातॄणां चैव सर्वेषां येऽनुरक्ता युधिष्ठिरे ॥ ५५ ॥
तदनन्तर पुरुषोत्तम राजा युधिष्ठिरने भीष्म, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र, विदुर, कृपाचार्य तथा दुर्योधन आदि सब भाइयों एवं अपनेमें अनुराग रखनेवाले अन्य जो लोग वहाँ रहते थे, उन सबको बुलानेके लिये पाण्डुपुत्र नकुलको हस्तिनापुर भेजा ॥ ५४-५५ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयपर्वणि राजसूयदीक्षायां त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयपर्वमें राजसूयदीक्षाविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ५९ १/३ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 1847)

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

युधिष्ठिरके यज्ञमें सब देशके राजाओं, कौरवों तथा यादवोंका आगमन और उन सबके भोजन-विश्राम आदिकी सुव्यवस्था

वैशम्पायन उवाच

स गत्वा हास्तिनपुरं नकुलः समितिंजयः ।
भीष्ममामन्त्रयाञ्चक्रे धृतराष्ट्रं च पाण्डवः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! युद्धविजयी पाण्डुकुमार नकुलने हस्तिनापुरमें जाकर भीष्म और धृतराष्ट्रको निमन्त्रित किया ॥ १ ॥

सत्कृत्यामन्त्रितास्तेन आचार्यप्रमुखास्ततः ।
प्रययुः प्रीतमनसो यज्ञं ब्रह्मपुरःसराः ॥ २ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने बड़े सत्कारके साथ आचार्य आदिको भी न्यौता दिया। वे सब लोग बड़े प्रसन्न मनसे ब्राह्मणोंको आगे करके उस यज्ञमें गये ॥ २ ॥

संश्रुत्य धर्मराजस्य यज्ञं यज्ञविदस्तदा ।
अन्ये च शतशस्तुष्टैर्मनोभिर्भरतर्षभ ॥ ३ ॥
भरतकुलभूषण! यज्ञवेत्ता धर्मराजका यज्ञ सुनकर अन्य सैकड़ों मनुष्य भी संतुष्ट हृदयसे वहाँ गये ॥ ३ ॥

द्रष्टुकामाः सभां चैव धर्मराजं च पाण्डवम् ।
दिग्भ्यः सर्वे समापेतुः क्षत्रियास्तत्र भारत ॥ ४ ॥
समुपादाय रत्नानि विविधानि महान्ति च ।
भारत! धर्मराज युधिष्ठिर और उनकी सभाको देखनेके लिये सम्पूर्ण दिशाओंसे सभी क्षत्रिय वहाँ नाना प्रकारके बहुमूल्य रत्नोंकी भेंट लेकर आये ॥ ४ १/२ ॥

धृतराष्ट्रश्च भीष्मश्च विदुरश्च महामतिः ॥ ५ ॥
दुर्योधनपुरोगाश्च भ्रातरः सर्व एव ते ।
गान्धारराजः सुबलः शकुनिश्च महाबलः ॥ ६ ॥
अचलो वृषकश्चैव कर्णश्च रथिनां वरः ।
तथा शल्यश्च बलवान् बाह्लिकश्च महाबलः ॥ ७ ॥
सोमदत्तोऽथ कौरव्यो भूरिर्भूरिश्रवाः शलः ।
अश्वत्थामा कृपो द्रोणः सैन्धवश्च जयद्रथः ॥ ८ ॥
यज्ञसेनः सपुत्रश्च शाल्वश्च वसुधाधिपः ।