भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1829

राजसूयं क्रतुश्रेष्ठमाहर्तुमुपचक्रमे ।
संदिदेश च स भ्रातॄन् करार्थं सर्वतोदिशम् ॥
उन्होंने क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका अनुष्ठान करनेकी तैयारी की है। उन्हीं महाराजने अपने सब भाइयोंको कर वसूल करनेके लिये सब दिशाओंमें भेजा है।

वृष्णिवीरेण सहितः संदिदेशानुजान् नृपः ।
उदीचीमर्जुनस्तूर्णं करार्थं समुपाययौ ॥
वृष्णिवीर भगवान् श्रीकृष्णके साथ धर्मराजने जब अपने भाइयोंको दिग्विजयके लिये आदेश दिया, तब महाबली अर्जुन कर वसूल करनेके लिये तुरंत उत्तर दिशाकी ओर चल दिये।

गत्वा शतसहस्राणि योजनानि महाबलः ।
जित्वा सर्वान् नृपान् युद्धे हत्वा च तरसा वशी ॥
स्वर्गद्वारमुपागम्य रत्नान्यादाय वै भृशम् ।
उन्होंने लाख योजनकी यात्रा करके सम्पूर्ण राजाओंको युद्धमें हराया है और सामना करनेके लिये आये हुए विपक्षियोंको वेगपूर्वक मारा है। जितेन्द्रिय अर्जुनने स्वर्गके द्वारतक जाकर प्रचुर रत्न-राशि प्राप्त की है।

अश्वांश्च विविधान् दिव्यान् सर्वानदाय फाल्गुनः ॥
धनं बहुविधं राजन् धर्मपुत्राय वै ददौ ।
नाना प्रकारके दिव्य अश्व उन्हें भेंटमें मिले हैं। इस प्रकार भाँति-भाँतिके धन लाकर उन्होंने धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी सेवामें समर्पित किये हैं।

भीमसेनो हि राजेन्द्र जित्वा प्राचीं दिशं बलात् ॥
वशे कृत्वा महीपालान् पाण्डवाय धनं ददौ ।
राजेन्द्र! युधिष्ठिरके दूसरे भाई भीमसेनने पूर्व दिशामें जाकर उसे बलपूर्वक जीता है और वहाँके राजाओंको अपने वशमें करके पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको बहुत धन अर्पित किया है।

दिशं प्रतीचीं नकुलः करार्थं प्रययौ तथा ॥
सहदेवो दिशं याम्यां जित्वा सर्वान् महीक्षितः ।
नकुल कर लेनेके लिये पश्चिम दिशाकी ओर गये हैं और सहदेव सम्पूर्ण राजाओंको जीतते हुए दक्षिण दिशामें बढ़ते चले आये हैं।

मां संदिदेश राजेन्द्र करार्थमिह सत्कृतः ॥
पार्थानां चरितं तुभ्यं संक्षेपात् समुदाहृतम् ।
राजेन्द्र! उन्होंने बड़े सत्कारपूर्वक मुझे आपके यहाँ राजकीय कर देनेके लिये संदेश भेजा है। महाराज! पाण्डवोंका यह चरित्र मैंने अत्यन्त संक्षेपमें आपके समक्ष रखा है।

तमवेक्ष्य महाराज धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥