भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1830

पावकं राजसूयं च भगवन्तं हरिं प्रभुम् ।
एतानवेक्ष्य धर्मज्ञ करं त्वं दातुमर्हसि ॥
आप धर्मराज युधिष्ठिरकी ओर देखिये, पवित्र करनेवाले राजसूययज्ञ तथा जगदीश्वर भगवान् श्रीहरिकी ओर भी ध्यान दीजिये। धर्मज्ञ नरेश! इन सबकी ओर दृष्टि रखते हुए आपको मुझे कर देना चाहिये।

वैशम्पायन उवाच

तेन तद् भाषितं श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः ।
प्रीतिमानभवद् राजन् धर्मात्मा सचिवैः सह ॥)
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! घटोत्कचकी वह बात सुनकर धर्मात्मा राक्षसराज विभीषण अपने मन्त्रियोंके साथ बड़े प्रसन्न हुए।
स चास्य प्रतिजग्राह शासनं प्रीतिपूर्वकम् ।
तच्च कालकृतं धीमानभ्यमन्यत स प्रभुः ॥ ७४ ॥
विभीषणने प्रेमपूर्वक ही उनका शासन स्वीकार कर लिया। शक्तिशाली एवं बुद्धिमान् विभीषणने उसे कालका ही विधान समझा ॥ ७४ ॥
(ततो ददौ विचित्राणि कम्बलानि कुथानि च ।
दन्तकाञ्चनपर्यङ्कान् मणिहेमविचित्रितान् ॥
उन्होंने सहदेवके लिये हाथीकी पीठपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल (कालीन) तथा हाथीदाँत और सुवर्णके बने हुए पलंग दिये, जिनमें सोने तथा रत्न जड़े हुए थे।
भूषणानि विचित्राणि महार्हाणि बहूनि च ।
प्रवालानि च शुभ्राणि मणींश्च विविधान् बहून् ॥
काञ्चनानि च भाण्डानि कलशानि घटानि च ।
कटाहान्यपि चित्राणि द्रोण्यश्चैव सहस्रशः ॥
इसके सिवा बहुत-से विचित्र और बहुमूल्य आभूषण भी भेंट किये। सुन्दर मूँगे, भाँति-भाँतिके मणिरत्न, सोनेके बर्तन, कलश, घड़े, विचित्र कड़ाहे और हजारों जलपात्र समर्पित किये।
राजतानि च भाण्डानि चित्राणि च बहूनि च ।
शस्त्राणि रुक्मचित्राणि मणिमुक्तैर्विचित्रितान् ॥
इनके सिवा चाँदीके भी बहुत-से ऐसे बर्तन दिये, जिनमें चित्रकारी की गयी थी। कुछ ऐसे शस्त्र भेंट किये, जिनमें सुवर्ण, मणि और मोती जड़े हुए थे।
यज्ञस्य तोरणे युक्तान् ददौ तालांश्चतुर्दश ।
रुक्मपङ्कजपुष्पाणि शिबिका मणिभूषिताः ॥