महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1831, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंयज्ञके फाटकपर लगानेयोग्य चौदह ताड़ प्रदान किये। सुवर्णमय कमलपुष्प और मणिजटित शिबिकाएँ भी दीं।
मुकुटानि महार्हाणि हेमवर्णांश्च कुण्डलान् ।
हेमपुष्पाण्यनेकानि रुक्ममाल्यानि चापरान् ॥
शङ्खांश्च चन्द्रसंकाशाञ्छतावर्तन् विचित्रिणः ।
बहुमूल्य मुकुट, सुनहले कुण्डल, सोनेके बने हुए अनेकानेक पुष्प, सोनेके ही हार तथा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल एवं विचित्र शतावर्त शंख भेंट किये।
चन्दनानि च मुख्यानि रुक्मरत्नान्यनेकशः ।।
वासांसि च महार्हाणि कम्बलानि बहून्यपि ।
अन्यांश्च विविधान् राजन् रत्नानि च बहूनि च ।।
स ददौ सहदेवाय तदा राजा विभीषणः ।)
श्रेष्ठ चन्दन, अनेक प्रकारके सुवर्ण तथा रत्न, महँगे वस्त्र, बहुत-से कम्बल, अनेक जातिके रत्न तथा और भी भाँति-भाँतिके बहुमूल्य पदार्थ राजा विभीषणने सहदेवको भेंट किये।
ततः सम्प्रेषयामास रत्नानि विविधानि च ।
चन्दनागुरुकाष्ठानि दिव्यान्याभरणानि च ॥ ७५ ॥
वासांसि च महार्हाणि मणींश्चैव महाधनान् ।
तथा उन्होंने नाना प्रकारके रत्न, चन्दन, अगुरुके काष्ठ, दिव्य आभूषण, बहुमूल्य वस्त्र और विशेष मूल्यवान् मणि-रत्न भी उसके साथ भिजवाये ।। ७५ १/२ ।।
(विभीषणं च राजानमभिवाद्य कृताञ्जलिः ।।
प्रदक्षिणं परीत्यैव निर्जगाम घटोत्कचः ।
तदनन्तर घटोत्कचने हाथ जोड़कर राजा विभीषणको प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके वहाँसे प्रस्थान किया।
तानि सर्वाणि रत्नानि अष्टाशीतिर्निशाचराः ।।
आजह्नुः समुदा राजन् हैडिम्बेन तदा सह ।
राजन्! घटोत्कचके साथ अठासी निशाचर उन सब रत्नोंको पहुँचानेके लिये प्रसन्नतापूर्वक आये।
रत्नान्यादाय सर्वाणि प्रतस्थे स घटोत्कचः ।।
ततो रत्नान्युपादाय हैडिम्बो राक्षसैः सह ।
जगाम तूर्णं लङ्कायाः सहदेवपदं प्रति ।।
आसेदुः पाण्डवं सर्वे लङ्घयित्वा महोदधिम् ।।
इस प्रकार उन सब रत्नोंको साथ ले घटोत्कचने राक्षसोंके साथ लंकासे सहदेवके पड़ावकी ओर प्रस्थान किया और समुद्र लाँघकर वे सब-के-सब पाण्डुनन्दन सहदेवके