भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1821, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1821

**सहदेवने कहा—**वत्स! तुम मेरी आज्ञासे कर लेनेके लिये लंकापुरीमें जाओ और वहाँ राक्षसराज महात्मा विभीषणसे मिलकर राजसूययज्ञके लिये भाँति-भाँतिके बहुत-से रत्न प्राप्त करो। महाबली वीर! उनकी ओरसे भेंटमें मिली हुई सब वस्तुएँ लेकर शीघ्र यहाँ लौट आओ।

नो चेदेवं वदेः पुत्र समर्थमिदमुत्तरम् । विष्णोर्भुजबलं वीक्ष्य राजसूयमथारभत् ।। कौन्तेयोः भ्रातृभिः सार्धं सर्वं जानीहि साम्प्रतम् । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सर्वं वैश्रवणानुज ।। इत्युक्त्वा शीघ्रमागच्छ मा भूत् कालस्य पर्ययः । बेटा! यदि विभीषण तुम्हें भेंट न दें, तो उन्हें अपनी शक्तिका परिचय देते हुए इस प्रकार कहना—'कुबेरके छोटे भाई लंकेश्वर! कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णके बाहुबलको देखकर भाइयोंसहित राजसूययज्ञ आरम्भ किया है। आप इस समय इन बातोंको अच्छी तरह जान लें। आपका कल्याण हो, अब मैं यहाँसे चला जाऊँगा।' इतना कहकर तुम शीघ्र लौट आना; अधिक विलम्ब मत करना।

वैशम्पायन उवाच

पाण्डवेनैवमुक्तस्तु मुदा युक्तो घटोत्कचः । तथेत्युक्त्वा महाराज प्रतस्थे दक्षिणां दिशम् ।। ययौ प्रदक्षिणं कृत्वा सहदेवं घटोत्कचः ।) **वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज जनमेजय! पाण्डुकुमार सहदेवके ऐसा कहनेपर घटोत्कच बहुत प्रसन्न हुआ और 'तथास्तु' कहकर सहदेवकी परिक्रमा करके दक्षिण दिशाकी ओर चल दिया।

ततः कच्छगतो धीमान् दूतं माद्रवतीसुतः । प्रेषयामास हैडिम्बं पौलस्त्याय महात्मने । विभीषणाय धर्मात्मा प्रीतिपूर्वमरिंदमः ।। ७३ ।। इस प्रकार समुद्रके तटपर पहुँचकर बुद्धिमान् शत्रुदमन धर्मात्मा माद्रवतीकुमारने महात्मा पुलस्त्यनन्दन विभीषणके पास प्रेमपूर्वक घटोत्कचको अपना दूत बनाकर भेजा ।। ७३ ।।

(लङ्कामभिमुखो राजन् समुद्रमवलोकयत् ।। कूर्मग्राहझषाकीर्णं नक्रैर्मीनैस्तथाऽऽकुलम् । शुक्तिव्रातैः समाकीर्णं शङ्खानां निचयाकुलम् ।। राजन्! लंकाकी ओर जाते हुए घटोत्कचने समुद्रको देखा। वह कछुओं, मगरों, नाकों तथा मत्स्य आदि जल-जन्तुओंसे भरा हुआ था। उसमें ढेर-के-ढेर शंख और सीपियाँ छा