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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

**सहदेवने कहा—**वत्स! तुम मेरी आज्ञासे कर लेनेके लिये लंकापुरीमें जाओ और वहाँ राक्षसराज महात्मा विभीषणसे मिलकर राजसूययज्ञके लिये भाँति-भाँतिके बहुत-से रत्न प्राप्त करो। महाबली वीर! उनकी ओरसे भेंटमें मिली हुई सब वस्तुएँ लेकर शीघ्र यहाँ लौट आओ।

नो चेदेवं वदेः पुत्र समर्थमिदमुत्तरम् । विष्णोर्भुजबलं वीक्ष्य राजसूयमथारभत् ।। कौन्तेयोः भ्रातृभिः सार्धं सर्वं जानीहि साम्प्रतम् । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सर्वं वैश्रवणानुज ।। इत्युक्त्वा शीघ्रमागच्छ मा भूत् कालस्य पर्ययः । बेटा! यदि विभीषण तुम्हें भेंट न दें, तो उन्हें अपनी शक्तिका परिचय देते हुए इस प्रकार कहना—'कुबेरके छोटे भाई लंकेश्वर! कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णके बाहुबलको देखकर भाइयोंसहित राजसूययज्ञ आरम्भ किया है। आप इस समय इन बातोंको अच्छी तरह जान लें। आपका कल्याण हो, अब मैं यहाँसे चला जाऊँगा।' इतना कहकर तुम शीघ्र लौट आना; अधिक विलम्ब मत करना।

वैशम्पायन उवाच

पाण्डवेनैवमुक्तस्तु मुदा युक्तो घटोत्कचः । तथेत्युक्त्वा महाराज प्रतस्थे दक्षिणां दिशम् ।। ययौ प्रदक्षिणं कृत्वा सहदेवं घटोत्कचः ।) **वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज जनमेजय! पाण्डुकुमार सहदेवके ऐसा कहनेपर घटोत्कच बहुत प्रसन्न हुआ और 'तथास्तु' कहकर सहदेवकी परिक्रमा करके दक्षिण दिशाकी ओर चल दिया।

ततः कच्छगतो धीमान् दूतं माद्रवतीसुतः । प्रेषयामास हैडिम्बं पौलस्त्याय महात्मने । विभीषणाय धर्मात्मा प्रीतिपूर्वमरिंदमः ।। ७३ ।। इस प्रकार समुद्रके तटपर पहुँचकर बुद्धिमान् शत्रुदमन धर्मात्मा माद्रवतीकुमारने महात्मा पुलस्त्यनन्दन विभीषणके पास प्रेमपूर्वक घटोत्कचको अपना दूत बनाकर भेजा ।। ७३ ।।

(लङ्कामभिमुखो राजन् समुद्रमवलोकयत् ।। कूर्मग्राहझषाकीर्णं नक्रैर्मीनैस्तथाऽऽकुलम् । शुक्तिव्रातैः समाकीर्णं शङ्खानां निचयाकुलम् ।। राजन्! लंकाकी ओर जाते हुए घटोत्कचने समुद्रको देखा। वह कछुओं, मगरों, नाकों तथा मत्स्य आदि जल-जन्तुओंसे भरा हुआ था। उसमें ढेर-के-ढेर शंख और सीपियाँ छा

रही थीं। स दृष्ट्वा रामसेतुं च चिन्तयन् रामविक्रमम् । प्रणम्य तमतिक्रम्य याम्यां वेलामलोकयत् ॥ भगवान् श्रीरामके द्वारा बनवाये हुए पुलको देखकर घटोत्कचको भगवान्‌के पराक्रमका चिन्तन हो आया और उस सेतुतीर्थको प्रणाम करके उसने समुद्रके दक्षिणतटकी ओर दृष्टिपात किया। गत्वा पारं समुद्रस्य दक्षिणं स घटोत्कचः । ददर्श लङ्कां राजेन्द्र नाकपृष्ठोपमां शुभाम् ॥ राजेन्द्र! तत्पश्चात् दक्षिणतटपर पहुँचकर घटोत्कचने लंकापुरी देखी, जो स्वर्गके समान सुन्दर थी। प्राकारेणावृतां रम्यां शुभद्वारैश्च शोभिताम् । प्रासादैर्बहुसाहस्रैः श्वेतरक्तैश्च संकुलाम् ॥ उसके चारों ओर चहारदीवारी बनी थी। सुन्दर फाटक उस रमणीयपुरीकी शोभा बढ़ाते थे। सफेद और लाल रंगके हजारों महलोंसे वह लंकापुरी भरी हुई थी। तापनीयगवाक्षेण मुक्ताजालान्तरेण च । हैमराजतजालेन दान्तजालैश्च शोभिताम् ॥ वहाँके गवाक्ष (जँगले) सोनेके बने हुए थे और उनके भीतर मोतियोंकी जाली लगी हुई थी। कितने ही गवाक्ष सोने, चाँदी तथा हाथीदाँतकी जालियोंसे सुशोभित थे। हर्म्यगोपुरसम्बाधां रुक्मतोरणसंकुलाम् । दिव्यदुन्दुभिनिह्र्रादामुद्यानवनशोभिताम् ॥ कितनी ही अट्टालिकाएँ तथा गोपुर उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे। स्थान-स्थानपर सोनेके फाटक लगे हुए थे। वहाँ दिव्य दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनि गूँजती रहती थी। बहुत-से उद्यान और वन उस नगरीकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। पुष्पगन्धैश्च संकीर्णां रमणीयमहापथाम् । नानारत्नैश्च सम्पूर्णाामिन्द्रस्येवामरावतीम् ॥ उसमें चारों ओर फूलोंकी सुगन्ध छा रही थी। वहाँकी लंबी-चौड़ी सड़कें बहुत सुन्दर थीं। भाँति-भाँतिके रत्नोंसे भरी-पुरी लंका इन्द्रकी अमरावतीपुरीको भी लज्जित कर रही थी। विवेश स पुरीं लङ्कां राक्षसैश्च निषेविताम् । ददर्श राक्षसत्राताञ्छूलप्राशधरान् बहून् ॥ घटोत्कचने राक्षसोंसे सेवित उस लंकापुरीमें प्रवेश किया और देखा, झुंड-के-झुंड राक्षस त्रिशूल और भाले लिये विचर रहे हैं। नानावेषधरान् दक्षान् नारीश्च प्रियदर्शनाः ।

दिव्यमाल्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिताः ॥ वे सभी युद्धमें कुशल हैं और नाना प्रकारके वेष धारण करते हैं। घटोत्कचने वहाँकी नारियोंको भी देखा। वे सब-की-सब बड़ी सुन्दर थीं। उनके अंगोंमें दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण तथा दिव्य हार शोभा दे रहे थे।

मदरक्तान्तनयनाः पीनश्रोणिपयोधराः । भैमसेनिं ततो दृष्ट्वा हृष्टास्ते विस्मयं गताः ॥ उनके नेत्रोंके किनारे मदिराके नशेसे कुछ लाल हो रहे थे। उनके नितम्ब और उरोज उभरे हुए तथा मांसल थे। भीमसेनपुत्र घटोत्कचको वहाँ आया देख लंकानिवासी राक्षसोंको बड़ा हर्ष और विस्मय हुआ।

आससाद गृहं राज्ञ इन्द्रस्य सदनोपमम् । स द्वारपालमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥ इधर घटोत्कच इन्द्रभवनके समान मनोहर राजमहलके द्वारपर जा पहुँचा और द्वारपालसे इस प्रकार बोला।

घटोत्कच उवाच

कुरूणामृषभो राजा पाण्डुर्नाम महाबलः । कनीयांस्तस्य दायादः सहदेव इति श्रुतः ॥ **घटोत्कचने कहा—**कुरुकुलमें एक श्रेष्ठ राजा हो गये हैं। वे महाबली नरेश 'पाण्डु' के नामसे विख्यात थे। उनके सबसे छोटे पुत्रका नाम 'सहदेव' है।

कृष्णमित्रस्य तु गुरो राजसूयार्थमुद्यतः । तेनाहं प्रेषितो दूतः करार्थं कौरवस्य च ॥ वे अपने बड़े भाई युधिष्ठिरका राजसूययज्ञ सम्पन्न करनेके लिये कटिबद्ध हैं। धर्मराज युधिष्ठिरके सहायक भगवान् श्रीकृष्ण हैं। सहदेवने कुरुराज युधिष्ठिरके लिये कर लेनेके निमित्त मुझे दूत बनाकर यहाँ भेजा है।

द्रष्टुमिच्छामि पौलस्त्यं त्वं क्षिप्रं मां निवेदय । मैं पुलस्त्यनन्दन महाराज विभीषणसे मिलना चाहता हूँ। तुम शीघ्र जाकर उन्हें मेरे आगमनकी सूचना दो।

वैशम्पायन उवाच

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा द्वारपालो महीपते । तथेत्युक्त्वा विवेशाथ भवनं स निवेदकः ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! घटोत्कचका वह वचन सुनकर वह द्वारपाल 'बहुत अच्छा' कहकर सूचना देनेके लिये राजभवनके भीतर गया।

साञ्जलिः स समाचष्ट सर्वां दूतगिरं तदा ।

द्वारपालवचः श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः ।।
उवाच वाक्यं धर्मात्मा समीपे मे प्रवेश्यताम् ।
वहाँ उसने हाथ जोड़कर दूतकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं। द्वारपालकी बात सुनकर धर्मात्मा राक्षसराज विभीषणने उससे कहा—‘दूतको मेरे समीप ले आओ'।
एवमुक्तस्तु राजेन्द्र धर्मज्ञेन महात्मना ।
अथ निष्क्रम्य सम्भ्रान्तो द्वाःस्थो हैडिम्बमब्रवीत् ।।
राजेन्द्र! धर्मज्ञ महात्मा विभीषणकी ऐसी आज्ञा होनेपर द्वारपाल बड़ी उतावलीके साथ बाहर निकला और घटोत्कचसे बोला—।
एहि दूत नृपं द्रष्टुं क्षिप्रं प्रविश च स्वयम् ।
द्वारपालवचः श्रुत्वा प्रविवेश घटोत्कचः ।।
‘दूत! आओ। महाराजसे मिलनेके लिये राजभवनमें शीघ्र प्रवेश करो।' द्वारपालका कथन सुनकर घटोत्कचने राजभवनमें प्रवेश किया।
स प्रविश्य ददर्शार्थ राक्षसेन्द्रस्य मन्दिरम् ।
ततः कैलाससंकाशं तप्तकाञ्चनतोरणम् ।।
तदनन्तर उसमें प्रवेश करके उसने राक्षसराज विभीषणका महल देखा, जो अपनी उज्ज्वल आभासे कैलासके समान जान पड़ता था। उसका फाटक तपाकर शुद्ध किये हुए सोनेसे तैयार किया गया था।
प्राकारेण परिक्षिप्तं गोपुरैश्चापि शोभितम् ।
हर्म्यप्रासादसम्बाधं नानारत्नसमन्वितम् ।।
चहारदीवारीसे घिरा हुआ वह राजमन्दिर अनेक गोपुरोंसे सुशोभित हो रहा था। उसमें बहुत-सी अट्टालिकाएँ तथा महल बने हुए थे। भाँति-भाँतिके रत्न उस राजभवनकी शोभा बढ़ाते थे।
काञ्चनैस्तापनीयैश्च स्फाटिकै राजतैरपि ।
वज्रवैडूर्यगर्भैश्च स्तम्भैर्दृष्टिमनोहरैः ।
नानाध्वजपताकाभिः सुवर्णाभिश्च चित्रितम् ।
तपाये हुए सुवर्ण, रजत (चाँदी) तथा स्फटिकमणिके बने हुए खम्भे नेत्र और मनको बरबस अपनी ओर खींच लेते थे। उन खम्भोंमें हीरे और वैदूर्य जड़े हुए थे। सुनहरे रंगकी विविध ध्वजा-पताकाओंसे उस भव्य भवनकी विचित्र शोभा हो रही थी।
चित्रमाल्यावृतं रम्यं तप्तकाञ्चनवेदिकम् ।।
तान् दृष्ट्वा तत्र सर्वान् स भैमसेनिर्मनोरमान् ।
प्रविशन्नेव हैडिम्बः शुश्राव मुरजस्वनम् ।।
विचित्र मालाओंसे अलंकृत तथा विशुद्ध स्वर्णमय वेदिकाओंसे विभूषित वह राजभवन बड़ा रमणीय दिखायी दे रहा था। उस महलकी इन सारी मनोरम विशेषताओंको देखकर

घटोत्कचने ज्यों ही भीतर प्रवेश किया, त्यों ही उसके कानोंमें मृदंगकी मधुर ध्वनि सुनायी पड़ी।
तन्त्रीगीतसमाकीर्णं समतालमिताक्षरम् ।
दिव्यदुन्दुभिनिर्ह्रादं वादित्रशतसंकुलम् ॥
वहाँ वीणाके तार झंकृत हो रहे थे और उसके लयपर गीत गाया जा रहा था, जिसका एक-एक अक्षर समतालके अनुसार उच्चारित हो रहा था। सैकड़ों वाद्योंके साथ दिव्य दुन्दुभियोंका मधुर घोष गूँज रहा था।
स श्रुत्वा मधुरं शब्दं प्रीतिमानभवत् तदा ।
ततो विगाह्य हैडिम्बो बहुकक्षां मनोरमाम् ॥
स ददर्श महात्मानं द्वाःस्थेन भरतर्षभ ।
तं विभीषणमासीनं काञ्चने परमासने ॥
भरतश्रेष्ठ! वह मधुर शब्द सुनकर घटोत्कचके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने अनेक मनोरम कक्षाओंको पार करके द्वारपालके साथ जा सुन्दर स्वर्ण सिंहासनपर बैठे हुए महात्मा विभीषणका दर्शन किया।
दिव्ये भास्करसंकाशे मुक्तामणिविभूषिते ।
दिव्याभरणचित्राङ्गं दिव्यरूपधरं विभुम् ॥
उनका सिंहासन सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था और उसमें मोती तथा मणि आदि रत्न जड़े हुए थे। दिव्य आभूषणोंसे राक्षसराज विभीषणके अंगोंकी विचित्र शोभा हो रही थी। उनका रूप दिव्य था।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धोक्षितं शुभम् ।
विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्रभम् ॥
वे दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करके दिव्य गन्धसे अभिषिक्त हो बड़े सुन्दर दिखायी दे रहे थे। उनकी अंगकान्ति सूर्य तथा अग्निके समान उद्भासित हो रही थी।
उपोपविष्टं सचिवैर्देवैरिव शतक्रतुम् ॥
यक्षैर्महारथैर्दिव्यैर्नारीभिः प्रियदर्शनैः ।
गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिः पूज्यमानं यथाविधि ॥
जैसे इन्द्रके पास बहुत-से देवता बैठते हैं, उसी प्रकार विभीषणके समीप उनके अनेक सचिव बैठे थे। बहुत-से दिव्य सुन्दर महारथी यक्ष अपनी स्त्रियोंके साथ मंगलयुक्त वाणीद्वारा विभीषणका विधिपूर्वक पूजन कर रहे थे।
चामरे व्यजने चाग्र्ये हेमदण्डे महाधने ।
गृहीते वरनारीभ्यां धूयमाने च मूर्धनि ॥
दो सुन्दरी नारियाँ सुवर्णमय दण्डसे विभूषित बहुमूल्य चँवर तथा व्यजन लेकर उनके मस्तकपर डुला रही थीं।

अर्चिष्मन्तं श्रिया जुष्टं कुबेरवरुणोपमम् । धर्मे चैव स्थितं नित्यमद्भुतं राक्षसेश्वरम् ॥ राक्षसराज विभीषण कुबेर और वरुणके समान राजलक्ष्मीसे सम्पन्न एवं अद्भुत दिखायी देते थे। उनके अंगोंसे दिव्य प्रभा छिटक रही थी। वे सदा धर्ममें स्थित रहते थे। राममिक्ष्वाकुनाथं वै स्मरन्तं मनसा सदा । दृष्ट्वा घटोत्कचो राजन् ववन्दे तं कृताञ्जलिः ॥ वे मन-ही-मन इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते थे। राजन्! उन राक्षसराज विभीषणको देख घटोत्कचने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। प्रह्वस्तस्थौ महावीर्यः शक्रं चित्ररथो यथा । तं दूतमागतं दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः ॥ पूजयित्वा यथान्यायं सान्त्वपूर्वं वचोऽब्रवीत् । और जैसे महापराक्रमी चित्ररथ इन्द्रके सामने नम्र रहते हैं, उसी प्रकार महाबली घटोत्कच भी विनीतभावसे उनके सम्मुख खड़ा हो गया। राक्षसराज विभीषणने उस दूतको आया हुआ देख उसका यथायोग्य सम्मान करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंमें कहा।

विभीषण उवाच

कस्य वंशे तु संजातः करमिच्छन् महीपतिः ॥ तस्यानुजान् समस्तांश्च पुरं देशं च तस्य वै । त्वां च कार्यं च तत् सर्वं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ विस्तरेण मम ब्रूहि सर्वानैतान् पृथक्-पृथक् । विभीषणने पूछा— दूत! जो महाराज मुझसे कर लेना चाहते हैं, वे किसके कुलमें उत्पन्न हुए हैं। उनके समस्त भाइयों तथा ग्राम और देशका परिचय दो। मैं तुम्हारे विषयमें भी जानना चाहता हूँ तथा तुम जिस कार्यके लिये कर लेने आये हो, उस समस्त कार्यके विषयमें भी मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। तुम मेरी पूछी हुई इन सब बातोंको विस्तारपूर्वक पृथक्-पृथक् बताओ।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु हैडिम्बः पौलस्त्येन महात्मना ॥ कृताञ्जलिरुवाचाथ सान्त्वयन् राक्षसाधिपम् । वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! महात्मा विभीषणके इस प्रकार पूछनेपर हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने हाथ जोड़कर राक्षसराजको आश्वासन देते हुए कहा।

घटोत्कच उवाच

सोमस्य वंशे राजाऽऽसीत् पाण्डुर्नाम महाबलः ।

पाण्डोः पुत्राश्च पञ्चासञ्छक्रतुल्यपराक्रमाः ॥
तेषां ज्येष्ठस्तु नाम्नाभूद् धर्मपुत्र इति श्रुतः ।
**घटोत्कच बोला—**महाराज! चन्द्रवंशमें पाण्डु नामसे प्रसिद्ध एक महाबली राजा हो गये हैं। उनके पाँच पुत्र हैं, जो इन्द्रके समान पराक्रमी हैं। उन पाँचोंमें जो बड़े हैं, वे धर्मपुत्रके नामसे विख्यात हैं।
अजातशत्रुर्धर्मात्मा धर्मो विग्रहवानिव ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा प्राप्य राज्यमकारयत् ।
गङ्गाया दक्षिणे तीरे नगरे नागसाह्वये ॥
उनके मनमें किसीके प्रति शत्रुता नहीं है; इसलिये लोग उन्हें अजातशत्रु कहते हैं। उनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता है। वे धर्मके मूर्तिमान् स्वरूप जान पड़ते हैं। गंगाके दक्षिणतटपर हस्तिनापुर नामका एक नगर है। राजा युधिष्ठिर वहीं अपना पैतृक राज्य प्राप्त करके उसकी रक्षा करते थे।
तद् दत्त्वा धृतराष्ट्राय शक्रप्रस्थं ययौ ततः ।
भ्रातृभि सह राजेन्द्र शक्रप्रस्थे प्रमोद्ते ॥
राक्षसराज! कुछ कालके पश्चात् उन्होंने हस्तिनापुरका राज्य धृतराष्ट्रको सौंप दिया और स्वयं वे भाइयोंसहित इन्द्रप्रस्थ चले गये। इन दिनों वे वहीं आनन्दपूर्वक रहते हैं।
गङ्गायमुनोर्मध्ये तावुभौ नगरोत्तमौ ।
नित्यं धर्मे स्थितो राजा शक्रप्रस्थे प्रशासति ॥
वे दोनों श्रेष्ठ नगर गंगा-यमुनाके बीचमें बसे हुए हैं। नित्य धर्मपरायण राजा युधिष्ठिर इन्द्रप्रस्थमें ही रहकर शासन करते हैं।
तस्यानुजो महाबाहुः भीमसेनो महाबलः ।
महातेजा महावीर्यः सिंहतुल्यः स पाण्डवः ॥
उनके छोटे भाई पाण्डुकुमार महाबाहु भीमसेन भी बड़े बलवान् हैं। वे सिंहके समान महापराक्रमी और अत्यन्त तेजस्वी हैं।
दशनागसहस्राणां बले तुल्यः स पाण्डवः ।
तस्यानुजोऽर्जुनो नाम महावीर्यपराक्रमः ॥
सुकुमारो महासत्त्वो लोके वीर्येण विश्रुतः ।
उनमें दस हजार हाथियोंका बल है। उनसे छोटे भाईका नाम अर्जुन है, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न, सुकुमार तथा अत्यन्त धैर्यवान् हैं। उनका पराक्रम विश्वमें विख्यात है।
कार्तवीर्यसमो वीर्ये सागरप्रतिमो बले ॥
जामदग्न्यसमो ह्यस्त्रे संख्ये रामसमोऽर्जुनः ।
रूपे शक्रसमः पार्थस्तेजसा भास्करोपमः ॥

वे कुन्तीनन्दन अर्जुन कार्तवीर्य अर्जुनके समान पराक्रमी, सगरपुत्रोंके समान बलवान्, परशुरामजीके समान अस्त्रविद्याके ज्ञाता, श्रीरामचन्द्रजीके समान समरविजयी, इन्द्रके समान रूपवान् तथा भगवान् सूर्यके समान तेजस्वी हैं।

देवदानवगन्धर्वैः पिशाचोरगराक्षसैः ।
मानुषैश्च समस्तैश्च अजेयः फाल्गुनो रणे ॥
देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस और मनुष्य ये सब मिलकर भी युद्धमें अर्जुनको परास्त नहीं कर सकते।

तेन तत् खाण्डवं दावं तर्पितं जातवेदसे ।
तरसा धर्षयित्वा तं शक्रं देवगणैः सह ॥
लब्धान्यस्त्राणि दिव्यानि तर्पयित्वा हुताशनम् ।
उन्होंने खाण्डववनको जलाकर अग्निदेवको तृप्त किया है। देवताओंसहित इन्द्रको वेगपूर्वक पराजित करके उन्होंने अग्निदेवको संतुष्ट किया और उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त किये हैं।

तेन लब्धा महाराज दुर्लभा देवतैरपि ।
वासुदेवस्य भगिनी सुभद्रा नाम विश्रुता ॥
महाराज! उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णकी बहिन सुभद्राको पत्नीरूपमें प्राप्त किया है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ थी।

अर्जुनस्यानुजो राजन् नकुलश्चेति विश्रुतः ॥
दर्शनीयतमो लोके मूर्तिमानिव मन्मथः ।
राजन्! अर्जुनके छोटे भाई नकुल नामसे विख्यात हैं, जो इस जगत्में मूर्तिमान् कामदेवके समान दर्शनीय हैं।

तस्यानुजो महातेजाः सहदेव इति श्रुतः ।
तेनाहं प्रेषितो राजन् सहदेवेन मारिष ॥
नकुलके छोटे भाई महातेजस्वी सहदेवके नामसे विख्यात हैं। माननीय महाराज! उन्हीं सहदेवने मुझे यहाँ भेजा है।

अहं घटोत्कचो नाम भीमसेनसुतो बली ।
मम माता महाभागा हिडिम्बा नाम राक्षसी ॥
मेरा नाम घटोत्कच है। मैं भीमसेनका बलवान् पुत्र हूँ। मेरी सौभाग्यशालिनी माताका नाम हिडिम्बा है। वे राक्षसकुलकी कन्या हैं।

पार्थानामुपकारार्थं चरामि पृथिवीमिमाम् ।
आसीत् पृथिव्याः सर्वस्या महीपालो युधिष्ठिरः ॥
मैं कुन्तीपुत्रोंका उपकार करनेके लिये ही इस पृथ्वीपर विचरता हूँ। महाराज युधिष्ठिर सम्पूर्ण भूमण्डलके शासक हो गये हैं।

राजसूयं क्रतुश्रेष्ठमाहर्तुमुपचक्रमे ।
संदिदेश च स भ्रातॄन् करार्थं सर्वतोदिशम् ॥
उन्होंने क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका अनुष्ठान करनेकी तैयारी की है। उन्हीं महाराजने अपने सब भाइयोंको कर वसूल करनेके लिये सब दिशाओंमें भेजा है।

वृष्णिवीरेण सहितः संदिदेशानुजान् नृपः ।
उदीचीमर्जुनस्तूर्णं करार्थं समुपाययौ ॥
वृष्णिवीर भगवान् श्रीकृष्णके साथ धर्मराजने जब अपने भाइयोंको दिग्विजयके लिये आदेश दिया, तब महाबली अर्जुन कर वसूल करनेके लिये तुरंत उत्तर दिशाकी ओर चल दिये।

गत्वा शतसहस्राणि योजनानि महाबलः ।
जित्वा सर्वान् नृपान् युद्धे हत्वा च तरसा वशी ॥
स्वर्गद्वारमुपागम्य रत्नान्यादाय वै भृशम् ।
उन्होंने लाख योजनकी यात्रा करके सम्पूर्ण राजाओंको युद्धमें हराया है और सामना करनेके लिये आये हुए विपक्षियोंको वेगपूर्वक मारा है। जितेन्द्रिय अर्जुनने स्वर्गके द्वारतक जाकर प्रचुर रत्न-राशि प्राप्त की है।

अश्वांश्च विविधान् दिव्यान् सर्वानदाय फाल्गुनः ॥
धनं बहुविधं राजन् धर्मपुत्राय वै ददौ ।
नाना प्रकारके दिव्य अश्व उन्हें भेंटमें मिले हैं। इस प्रकार भाँति-भाँतिके धन लाकर उन्होंने धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी सेवामें समर्पित किये हैं।

भीमसेनो हि राजेन्द्र जित्वा प्राचीं दिशं बलात् ॥
वशे कृत्वा महीपालान् पाण्डवाय धनं ददौ ।
राजेन्द्र! युधिष्ठिरके दूसरे भाई भीमसेनने पूर्व दिशामें जाकर उसे बलपूर्वक जीता है और वहाँके राजाओंको अपने वशमें करके पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको बहुत धन अर्पित किया है।

दिशं प्रतीचीं नकुलः करार्थं प्रययौ तथा ॥
सहदेवो दिशं याम्यां जित्वा सर्वान् महीक्षितः ।
नकुल कर लेनेके लिये पश्चिम दिशाकी ओर गये हैं और सहदेव सम्पूर्ण राजाओंको जीतते हुए दक्षिण दिशामें बढ़ते चले आये हैं।

मां संदिदेश राजेन्द्र करार्थमिह सत्कृतः ॥
पार्थानां चरितं तुभ्यं संक्षेपात् समुदाहृतम् ।
राजेन्द्र! उन्होंने बड़े सत्कारपूर्वक मुझे आपके यहाँ राजकीय कर देनेके लिये संदेश भेजा है। महाराज! पाण्डवोंका यह चरित्र मैंने अत्यन्त संक्षेपमें आपके समक्ष रखा है।

तमवेक्ष्य महाराज धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥

पावकं राजसूयं च भगवन्तं हरिं प्रभुम् ।
एतानवेक्ष्य धर्मज्ञ करं त्वं दातुमर्हसि ॥
आप धर्मराज युधिष्ठिरकी ओर देखिये, पवित्र करनेवाले राजसूययज्ञ तथा जगदीश्वर भगवान् श्रीहरिकी ओर भी ध्यान दीजिये। धर्मज्ञ नरेश! इन सबकी ओर दृष्टि रखते हुए आपको मुझे कर देना चाहिये।

वैशम्पायन उवाच

तेन तद् भाषितं श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो विभीषणः ।
प्रीतिमानभवद् राजन् धर्मात्मा सचिवैः सह ॥)
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! घटोत्कचकी वह बात सुनकर धर्मात्मा राक्षसराज विभीषण अपने मन्त्रियोंके साथ बड़े प्रसन्न हुए।
स चास्य प्रतिजग्राह शासनं प्रीतिपूर्वकम् ।
तच्च कालकृतं धीमानभ्यमन्यत स प्रभुः ॥ ७४ ॥
विभीषणने प्रेमपूर्वक ही उनका शासन स्वीकार कर लिया। शक्तिशाली एवं बुद्धिमान् विभीषणने उसे कालका ही विधान समझा ॥ ७४ ॥
(ततो ददौ विचित्राणि कम्बलानि कुथानि च ।
दन्तकाञ्चनपर्यङ्कान् मणिहेमविचित्रितान् ॥
उन्होंने सहदेवके लिये हाथीकी पीठपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल (कालीन) तथा हाथीदाँत और सुवर्णके बने हुए पलंग दिये, जिनमें सोने तथा रत्न जड़े हुए थे।
भूषणानि विचित्राणि महार्हाणि बहूनि च ।
प्रवालानि च शुभ्राणि मणींश्च विविधान् बहून् ॥
काञ्चनानि च भाण्डानि कलशानि घटानि च ।
कटाहान्यपि चित्राणि द्रोण्यश्चैव सहस्रशः ॥
इसके सिवा बहुत-से विचित्र और बहुमूल्य आभूषण भी भेंट किये। सुन्दर मूँगे, भाँति-भाँतिके मणिरत्न, सोनेके बर्तन, कलश, घड़े, विचित्र कड़ाहे और हजारों जलपात्र समर्पित किये।
राजतानि च भाण्डानि चित्राणि च बहूनि च ।
शस्त्राणि रुक्मचित्राणि मणिमुक्तैर्विचित्रितान् ॥
इनके सिवा चाँदीके भी बहुत-से ऐसे बर्तन दिये, जिनमें चित्रकारी की गयी थी। कुछ ऐसे शस्त्र भेंट किये, जिनमें सुवर्ण, मणि और मोती जड़े हुए थे।
यज्ञस्य तोरणे युक्तान् ददौ तालांश्चतुर्दश ।
रुक्मपङ्कजपुष्पाणि शिबिका मणिभूषिताः ॥

यज्ञके फाटकपर लगानेयोग्य चौदह ताड़ प्रदान किये। सुवर्णमय कमलपुष्प और मणिजटित शिबिकाएँ भी दीं।
मुकुटानि महार्हाणि हेमवर्णांश्च कुण्डलान् ।
हेमपुष्पाण्यनेकानि रुक्ममाल्यानि चापरान् ॥
शङ्खांश्च चन्द्रसंकाशाञ्छतावर्तन् विचित्रिणः ।
बहुमूल्य मुकुट, सुनहले कुण्डल, सोनेके बने हुए अनेकानेक पुष्प, सोनेके ही हार तथा चन्द्रमाके समान उज्ज्वल एवं विचित्र शतावर्त शंख भेंट किये।
चन्दनानि च मुख्यानि रुक्मरत्नान्यनेकशः ।।
वासांसि च महार्हाणि कम्बलानि बहून्यपि ।
अन्यांश्च विविधान् राजन् रत्नानि च बहूनि च ।।
स ददौ सहदेवाय तदा राजा विभीषणः ।)
श्रेष्ठ चन्दन, अनेक प्रकारके सुवर्ण तथा रत्न, महँगे वस्त्र, बहुत-से कम्बल, अनेक जातिके रत्न तथा और भी भाँति-भाँतिके बहुमूल्य पदार्थ राजा विभीषणने सहदेवको भेंट किये।

ततः सम्प्रेषयामास रत्नानि विविधानि च ।
चन्दनागुरुकाष्ठानि दिव्यान्‍याभरणानि च ॥ ७५ ॥
वासांसि च महार्हाणि मणींश्चैव महाधनान् ।
तथा उन्होंने नाना प्रकारके रत्न, चन्दन, अगुरुके काष्ठ, दिव्य आभूषण, बहुमूल्य वस्त्र और विशेष मूल्यवान् मणि-रत्न भी उसके साथ भिजवाये ।। ७५ १/२ ।।

(विभीषणं च राजानमभिवाद्य कृताञ्जलिः ।।
प्रदक्षिणं परीत्यैव निर्जगाम घटोत्कचः ।
तदनन्तर घटोत्कचने हाथ जोड़कर राजा विभीषणको प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके वहाँसे प्रस्थान किया।

तानि सर्वाणि रत्नानि अष्टाशीतिर्निशाचराः ।।
आजह्नुः समुदा राजन् हैडिम्बेन तदा सह ।
राजन्! घटोत्कचके साथ अठासी निशाचर उन सब रत्नोंको पहुँचानेके लिये प्रसन्नतापूर्वक आये।

रत्नान्यादाय सर्वाणि प्रतस्थे स घटोत्कचः ।।
ततो रत्नान्युपादाय हैडिम्बो राक्षसैः सह ।
जगाम तूर्णं लङ्कायाः सहदेवपदं प्रति ।।
आसेदुः पाण्डवं सर्वे लङ्घयित्वा महोदधिम् ।।
इस प्रकार उन सब रत्नोंको साथ ले घटोत्कचने राक्षसोंके साथ लंकासे सहदेवके पड़ावकी ओर प्रस्थान किया और समुद्र लाँघकर वे सब-के-सब पाण्डुनन्दन सहदेवके

निकट आ पहुँचे। सहदेवो ददर्शार्थ रत्नाहारान् निशाचरान् । आगतान् भीमसंकाशान् हैडिम्बं च तथा नृप ॥ राजन्! सहदेवने रत्न लेकर आये हुए भयंकर निशाचरों तथा घटोत्कचको भी देखा। द्रमिला नैर्ऋतान् दृष्ट्वा दुद्रुवुस्ते भयार्दिताः । भैमसेनिस्ततो गत्वा माद्रेयं प्राञ्जलिः स्थितः ॥ उस समय उन राक्षसोंको देखकर द्राविड़ सैनिक भयभीत हो सब ओर भागने लगे। इतनेमें ही भीमसेनकुमार घटोत्कच माद्रीनन्दन सहदेवके पास आ हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। प्रीतिमानभवद् दृष्ट्वा रत्नौघं तं च पाण्डवः । तं परिष्वज्य पाणिभ्यां दृष्ट्वा तान् प्रीतिमानभूत् ॥ विसृज्य द्रमिलान् सर्वान् गमनायोपचक्रमे ।) पाण्डुकुमार सहदेव वह रत्न-राशि देखकर बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने घटोत्कचको दोनों हाथोंसे पकड़कर गले लगाया और दूसरे राक्षसोंकी ओर देखकर भी बड़ी प्रसन्नता प्रकट की। इसके बाद समस्त द्राविड़ सैनिकोंको विदा करके सहदेव वहाँसे लौटनेकी तैयारी करने लगे। न्यवर्तत ततो धीमान् सहदेवः प्रतापवान् ॥ ७६ ॥ तैयारी पूरी हो जानेपर प्रतापी और बुद्धिमान् सहदेव इन्द्रप्रस्थकी ओर चल दिये ॥ ७६ ॥ एवं निर्जित्य तरसा सान्त्वेन विजयेन च । करदान् पार्थिवान् कृत्वा प्रत्यागच्छदरिंदमः ॥ ७७ ॥ इस प्रकार बलपूर्वक जीतकर तथा सामनीतिसे समझा-बुझाकर सब राजाओंको अपने अधीन करके उन्हें करद बनाकर शत्रुदमन माद्रीनन्दन इन्द्रप्रस्थमें वापस आ गये ॥ ७७ ॥ (रत्नभारमुपादाय ययौ सह निशाचरैः । इन्द्रप्रस्थं विवेशाथ कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ रत्नोंका वह भारी भार साथ लिये निशाचरोंके साथ सहदेवने इन्द्रप्रस्थ नगरमें प्रवेश किया। उस समय वे पैरोंकी धमकसे सारी पृथ्वीको कम्पित करते हुए-से चल रहे थे। दृष्ट्वा युधिष्ठिरं राजन् सहदेवः कृताञ्जलिः । प्रह्वोऽभिवाद्य तस्थौ स पूजितश्चैव तेन वै ॥ राजन्! युधिष्ठिरको देखते ही सहदेव हाथ जोड़ नम्रतापूर्वक उनके चरणोंमें पड़ गये। फिर विनीतभावसे उनके समीप खड़े हो गये। उस समय युधिष्ठिरने भी उनका बहुत सम्मान किया। लङ्काप्राप्तान् धनौघांश्च दृष्ट्वा तान् दुर्लभान् बहून् ।

प्रीतिमानभवद् राजा विस्मयं च ययौ तदा ॥
लंकासे प्राप्त हुई अत्यन्त दुर्लभ एवं प्रचुर धनराशियोंको देखकर राजा युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न और विस्मित हुए।

कोटीसहस्रमधिकं हिरण्यस्य महात्मने ।
विचित्रांस्तु मणींश्चैव गोऽजाविमहिषांस्तथा ॥)
धर्मराजाय तत् सर्वं निवेद्य भरतर्षभ ।
कृतकर्मा सुखं राजन्नुवास जनमेजय ॥ ७८ ॥
भरतश्रेष्ठ जनमेजय! उस धनराशिमें सहस्र कोटिसे भी अधिक सुवर्ण था। विचित्र मणि एवं रत्न थे। गाय, भैंस, भेड़ और बकरियोंकी संख्या भी अधिक थी। राजन्! इन सबको महात्मा धर्मराजकी सेवामें समर्पित करके कृतकृत्य हो सहदेव सुखपूर्वक राजधानीमें रहने लगे ॥ ७८ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि सहदेवदक्षिणदिग्विजये एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०० श्लोक मिलाकर कुल १७८ श्लोक हैं)


* यह इक्ष्वाकुवंशीय दुर्जयका पुत्र था। इसका दूसरा नाम दुर्योधन था। यह राजा बड़ा धर्मात्मा था। इसकी कथा अनुशासनपर्वके दूसरे अध्यायमें आती है।
* जो अपने कानोंसे ही शरीरको ढक लें उन्हें ‘कर्णप्रावरण’ कहते हैं। प्राचीन कालमें ऐसी जातिके लोग थे, जिनके कान पैरोंतक लटकते थे।

अध्याय (पृष्ठ 1834)

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द्वात्रिंशोऽध्यायः

नकुलके द्वारा पश्चिम दिशाकी विजय

वैशम्पायन उवाच

नकुलस्य तु वक्ष्यामि कर्माणि विजयं तथा ।
वासुदेवजितामाशां यथासावजयत् प्रभुः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अब मैं नकुलके पराक्रम और विजयका वर्णन करूँगा। शक्तिशाली नकुलने जिस प्रकार भगवान् वासुदेवद्वारा अधिकृत पश्चिम दिशापर विजय पायी थी, वह सुनो ॥ १ ॥

निर्याय खाण्डवप्रस्थात् प्रतीचीमभितोदिशम् ।
उद्दिश्य मतिमान् प्रायान्महत्या सेनया सह ॥ २ ॥
बुद्धिमान् माद्रीकुमारने विशाल सेनाके साथ खाण्डवप्रस्थसे निकलकर पश्चिम दिशामें जानेके लिये प्रस्थान किया ॥ २ ॥

सिंहनादेन महता योधानां गर्जितेन च ।
रथनेमिनिनादैश्च कम्पयन् वसुधामिमाम् ॥ ३ ॥
वे अपने सैनिकोंके महान् सिंहनाद, गर्जना तथा रथके पहियोंकी घर्घरहाटकी तुमुल ध्वनिसे इस पृथ्वीको कम्पित करते हुए जा रहे थे ॥ ३ ॥

ततो बहुधनं रम्यं गवाढ्यं धनधान्यवत् ।
कार्तिकेयस्य दयितं रोहीतकमुपाद्रवत् ॥ ४ ॥
जाते-जाते वे बहुत धन-धान्यसे सम्पन्न, गौओंकी बहुलतासे युक्त तथा स्वामिकार्तिकेयके अत्यन्त प्रिय रमणीय रोहीतक* पर्वत एवं उसके समीपवर्ती देशमें जा पहुँचे ॥ ४ ॥

तत्र युद्धं महच्चासीच्छूरैर्मत्तमयूरकैः ।
मरुभूमिं स कार्त्स्न्येन तथैव बहुधान्यकम् ॥ ५ ॥
शैरीषकं महोत्थं च वशे चक्रे महाद्युतिः ।
आक्रोशं चैव राजर्षिं तेन युद्धमभून्महत् ॥ ६ ॥
वहाँ उनका मत्तमयूर नामवाले शूरवीर क्षत्रियोंके साथ घोर संग्राम हुआ। उसपर अधिकार करनेके पश्चात् महान् तेजस्वी नकुलने समूची मरुभूमि (मारवाड़), प्रचुर धन-धान्यपूर्ण शैरीषक और महोत्थ नामक देशोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया। महोत्थ देशके अधिपति राजर्षि आक्रोशको भी जीत लिया। आक्रोशके साथ उनका बड़ा भारी युद्ध हुआ था ॥ ५-६ ॥

तान् दशार्णान् स जित्वा च प्रतस्थे पाण्डुनन्दनः ।

शिबींस्त्रिगर्तानम्बष्ठान् मालवान् पञ्चकर्पटान् ।। ७ ।।
तथा माध्यमिकांश्चैव वाटधानान् द्विजानथ ।
तत्पश्चात् दशार्णदेशपर विजय प्राप्त करके पाण्डुनन्दन नकुलने शिबि, त्रिगर्त, अम्बष्ठ, मालव, पंचकर्पट एवं माध्यमिक देशोंको प्रस्थान किया और उन सबको जीतकर वाटधानदेशीय क्षत्रियोंको भी हराया ।। ७ १/२ ।।

पुनश्च परिवृत्याथ पुष्करारण्यवासिनः ।। ८ ।।
गणानुत्सवसंकेतान् व्यजयत् पुरुषर्षभः ।
पुनः उधरसे लौटकर नरश्रेष्ठ नकुलने पुष्करारण्य-निवासी उत्सवसंकेत नामक गणोंको परास्त किया ।। ८ १/२ ।।

सिन्धुकूलाश्रिता ये च ग्रामणीया महाबलाः ।। ९ ।।
शूद्राभीरगणांश्चैव ये चाश्रित्य सरस्वतीम् ।
वर्तयन्ति च ये मत्स्यैर्यै च पर्वतवासिनः ।। १० ।।
समुद्रके तटपर रहनेवाले जो महाबली ग्रामणीय (ग्राम शासकके वंशज) क्षत्रिय थे, सरस्वती नदीके किनारे निवास करनेवाले जो शूद्र आभीरगण थे, मछलियोंसे जीविका चलानेवाले जो धीवर जातिके लोग थे तथा जो पर्वतोंपर वास करनेवाले दूसरे-दूसरे मनुष्य थे, उन सबको नकुलने जीतकर अपने वशमें कर लिया ।। ९-१० ।।

कृत्स्नं पञ्चनदं चैव तथैवामरपर्वतम् ।
उत्तरज्योतिषं चैव तथा दिव्यकटं पुरम् ।। ११ ।।
द्वारपालं च तरसा वशे चक्रे महाद्युतिः ।
फिर सम्पूर्ण पंचनददेश (पंजाब), अमरपर्वत, उत्तरज्योतिष, दिव्यकट नगर और द्वारपालपुरको अत्यन्त कान्तिमान् नकुलने शीघ्र ही अपने अधिकारमें कर लिया ।। ११ १/२ ।।

रामठान् हारहूणांश्च प्रतीच्यांश्चैव ये नृपाः ।। १२ ।।
तान् सर्वान् स वशे चक्रे शासनादेव पाण्डवः ।
तत्रस्थः प्रेषयामास वासुदेवाय भारत ।। १३ ।।
रामठ, हार, हूण तथा अन्य जो पश्चिमी नरेश थे, उन सबको पाण्डुकुमार नकुलने आज्ञामात्रसे ही अपने अधीन कर लिया। भारत! वहीं रहकर उन्होंने वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके पास दूत भेजा ।। १२-१३ ।।

स चास्य गतभी राजन् प्रतिजग्राह शासनम् ।
ततः शाकलमभ्येत्य मद्राणां पुटभेदनम् ।। १४ ।।
मातुलं प्रीतिपूर्वेण शल्यं चक्रे वशे बली ।

राजन्! उन्होंने केवल प्रेमके कारण नकुलका शासन स्वीकार कर लिया। इसके बाद शाकलदेशको जीतकर बलवान् नकुलने मद्रदेशकी राजधानीमें प्रवेश किया और वहाँके शासक अपने मामा शल्यको प्रेमसे ही वशमें कर लिया ।। १४ १/२ ।।
स तेन सत्कृतो राज्ञा सत्कारार्हो विशाम्पते ।। १५ ।।
रत्नानि भूरीण्यादाय सम्प्रतस्थे युधाम्पतिः ।
राजन्! राजा शल्यने सत्कारके योग्य नकुलका यथावत् सत्कार किया। शल्यसे भेंटमें बहुत-से रत्न लेकर योद्धाओंके अधिपति माद्रीकुमार आगे बढ़ गये ।। १५ १/२ ।।
ततः सागरकुक्षिस्थान् म्लेच्छान् परमदारुणान् ।। १६ ।।
पह्लवान् बर्बरांश्चैव किरातान् यवनाञ्छकान् ।
ततो रत्नान्युपादाय वशे कृत्वा च पार्थिवान् ।
न्यवर्तत कुरुश्रेष्ठो नकुलश्चित्रमार्गवित् ।। १७ ।।
तदनन्तर समुद्री टापुओंमें रहनेवाले अत्यन्त भयंकर म्लेच्छ, पह्लव, बर्बर, किरात, यवन और शकोंको जीतकर उनसे रत्नोंकी भेंट ले विजयके विचित्र उपायोंके जाननेवाले कुरुश्रेष्ठ नकुल इन्द्रप्रस्थकी ओर लौटे ।। १६-१७ ।।
करभाणां सहस्राणि कोशं तस्य महात्मनः ।
ऊहुर्दश महाराज कृच्छ्रादिव महाधनम् ।। १८ ।।
महाराज! उन महामना नकुलके बहुमूल्य खजानेका बोझ दस हजार हाथी बड़ी कठिनाईसे ढो रहे थे ।। १८ ।।
इन्द्रप्रस्थगतं वीरमभ्येत्य स युधिष्ठिरम् ।
ततो माद्रीसुतः श्रीमान् धनं तस्मै न्यवेदयत् ।। १९ ।।
तदनन्तर श्रीमान् माद्रीकुमारने इन्द्रप्रस्थमें विराजमान वीरवर राजा युधिष्ठिरसे मिलकर वह सारा धन उन्हें समर्पित कर दिया ।। १९ ।।
एवं विजित्य नकुलो दिशं वरुणपालिताम् ।
प्रतीचीं वासुदेवेन निर्जितां भरतर्षभ ।। २० ।।
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार भगवान् वासुदेवके द्वारा अपने अधिकारमें की हुई, वरुणपालित पश्चिम दिशापर विजय पाकर नकुल इन्द्रप्रस्थ लौट आये ।। २० ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि नकुलप्रतीचीविजये द्वात्रिंशोऽध्यायः ।। ३२ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें नकुलके द्वारा पश्चिम दिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३२ ।।

* - इसीको आजकल रोहतक (पंजाब) कहते हैं।

(राजसूयपर्व)

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(राजसूयपर्व)

त्रयस्त्रिंंशोऽध्यायः

युधिष्ठिरके शासनकी विशेषता, श्रीकृष्णकी आज्ञासे युधिष्ठिरका राजसूययज्ञकी दीक्षा लेना तथा राजाओं, ब्राह्मणों एवं सगे-सम्बन्धियोंको बुलानेके लिये निमन्त्रण भेजना

वैशम्पायन उवाच

(एवं निर्जित्य पृथिवीं भ्रातरः कुरुनन्दन ।
वर्तमानाः स्वधर्मेण शशासुः पृथिवीमिमाम् ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**कुशनन्दन! इस प्रकार सारी पृथ्‍वीको जीतकर अपने धर्मके अनुसार बर्ताव करते हुए पाँचों भाई पाण्डव इस भूमण्डलका शासन करने लगे।

चतुर्भिर्भीमसेनाद्यैर्भ्रातृभिः सहितो नृपः ।
अनुगृह्य प्रजाः सर्वाः सर्ववर्णानगोपयत् ॥
भीमसेन आदि चारों भाइयोंके साथ राजा युधिष्ठिर सम्पूर्ण प्रजापर अनुग्रह करते हुए सब वर्णके लोगोंको संतुष्ट रखते थे।

अविरोधेन सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिरः ।
प्रीयतां दीयतां सर्वं मुक्त्वा कोषं बलं विना ॥
साधु धर्मेति पार्थस्य नान्यच्छ्रूयेत भाषितम् ।
युधिष्ठिर किसीका भी विरोध न करके सबके हितसाधनमें लगे रहते थे। 'सबको तृप्त एवं प्रसन्न किया जाय, खजाना खोलकर सबको खुले हाथ दान दिया जाय, किसीपर बलप्रयोग न किया जाय, धर्म! तुम धन्य हो।' इत्यादि बातोंके सिवा युधिष्ठिरके मुखसे और कुछ नहीं सुनायी पड़ता था।

एवंवृत्ते जगत् तस्मिन् पितरीवान्वरज्यत ॥
न तस्य विद्यते द्वेष्टा ततोऽस्याजातशत्रुता ।)
उनके ऐसे बर्तावके कारण सारा जगत् उनके प्रति वैसा ही अनुराग रखने लगा, जैसे पुत्र पिताके प्रति अनुरक्त होता है। राजा युधिष्ठिरसे द्वेष रखनेवाला कोई नहीं था, इसीलिये वे 'अजातशत्रु' कहलाते थे।

रक्षणाद् धर्मराजस्य सत्यस्य परिपालनात् । शत्रूणां क्षपणाच्चैव स्वकर्मनिरताः प्रजाः ॥ १ ॥ धर्मराज युधिष्ठिर प्रजाकी रक्षा, सत्यका पालन और शत्रुओंका संहार करते थे। उनके इन कार्योंसे निश्चिन्त एवं उत्साहित होकर प्रजावर्गके सब लोग अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्मोंके पालनमें संलग्न रहते थे ॥ १ ॥

बलीनां सम्यगादानाद् धर्मतश्चानुशासनात् । निकामवर्षी पर्जन्यः स्फीतो जनपदोऽभवत् ॥ २ ॥ न्यायपूर्वक कर लेने और धर्मपूर्वक शासन करनेसे उनके राज्यमें मेघ इच्छानुसार वर्षा करते थे। इस प्रकार युधिष्ठिरका सम्पूर्ण जनपद धन-धान्यसे सम्पन्न हो गया था ॥ २ ॥

सर्वारम्भाः सुप्रवृत्ता गोरक्षा कर्षणं वणिक् । विशेषात् सर्वमेवैतत् संजज्ञे राजकर्मणः ॥ ३ ॥ गोरक्षा, खेती और व्यापार आदि सभी कार्य अच्छे ढंगसे होने लगे। विशेषतः राजाकी सुव्यवस्थासे ही यह सब कुछ उत्तमरूपसे सम्पन्न होता था ॥ ३ ॥

दस्युभ्यो वञ्चकेभ्यो वा राजन् प्रति परस्परम् । राजवल्लभतश्चैव नाश्रूयन्त मृषा गिरः ॥ ४ ॥ राजन्! औरोंकी तो बात ही क्या है, चोरों, ठगों, राजा अथवा राजाके विश्वासपात्र व्यक्तियोंके मुखसे भी वहाँ कोई झूठी बात नहीं सुनी जाती थी। केवल प्रजाके साथ ही नहीं, आपसमें भी वे लोग झूठ-कपटका बर्ताव नहीं करते थे ॥ ४ ॥

अवर्षं चातिवर्षं च व्याधिपावकमूर्च्छनम् । सर्वमेतत् तदा नासीद् धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ॥ ५ ॥ धर्मपरायण युधिष्ठिरके शासनकालमें अनावृष्टि, अतिवृष्टि, रोग-व्याधि तथा आग लगने आदि उपद्रवोंका नाम भी नहीं था ॥ ५ ॥

प्रियं कर्तुमुपस्थातुं बलिकर्म स्वभावजम् । अभिहर्तुं नृपा जग्मुर्नान्यैः कार्यैः कथंचन ॥ ६ ॥ राजा लोग उनके यहाँ स्वाभाविक भेंट देने अथवा उनका कोई प्रिय कार्य करनेके लिये ही आते थे, युद्ध आदि दूसरे किसी कामसे नहीं ॥ ६ ॥

धर्म्यैर्धनागमैस्तस्य ववृधे निचयो महान् । कर्तुं यस्य न शक्येत क्षयो वर्षशतैरपि ॥ ७ ॥ धर्मपूर्वक प्राप्त होनेवाले धनकी आयसे उनका महान् धन-भण्डार इतना बढ़ गया था कि सैकड़ों वर्षोंतक खुले हाथ लुटानेपर भी उसे समाप्त नहीं किया जा सकता था ॥ ७ ॥

स्वकोषस्य परीमाणं कोशस्य च महीपतिः । विज्ञाय राजा कौन्तेयो यज्ञायैव मनो दधे ॥ ८ ॥

कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरने अपने अन्न-वस्त्रके भंडार तथा खजानेका परिमाण जानकर यज्ञ करनेका ही निश्चय किया ॥ ८ ॥ सुहृदश्चैव ये सर्वे पृथक् च सह चाब्रुवन् । यज्ञकालस्तव विभो क्रियतामत्र साम्प्रतम् ॥ ९ ॥ उनके जितने हितैषी सुहृद् थे, वे सभी अलग-अलग और एक साथ यही कहने लगे—‘प्रभो! यह आपके यज्ञ करनेका उपयुक्त समय आया है; अतः अब उसका आरम्भ कीजिये’ ॥ ९ ॥ अथैवं ब्रुवतामेव तेषामभ्याययौ हरिः । ऋषिः पुराणो वेदात्मादृश्यश्चैव विजानताम् ॥ १० ॥ वे सुहृद् इस तरहकी बातें कर ही रहे थे कि उसी समय भगवान् श्रीहरि आ पहुँचे। वे पुराणपुरुष, नारायण ऋषि, वेदात्मा एवं विज्ञानीजनोंके लिये भी अगम्य परमेश्वर हैं ॥ १० ॥ जगतस्तस्थुषां श्रेष्ठः प्रभवश्चाप्ययश्च ह । भूतभव्यभवन्नाथः केशवः केशिसूदनः ॥ ११ ॥ वे ही स्थावर-जंगम प्राणियोंके उत्तम उत्पत्ति-स्थान और लयके अधिष्ठान हैं। भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंके नियन्ता हैं। वे ही केशी दैत्यको मारनेवाले केशव हैं ॥ ११ ॥ प्राकारः सर्ववृष्णीनामापत्स्वभयदोऽरिहा । बलाधिकारे निक्षिप्य सम्यगानकदुन्दुभिम् ॥ १२ ॥ उच्चावचमुपादाय धर्मराजाय माधवः । धनौघं पुरुषव्याघ्रो बलेन महताऽऽवृतः ॥ १३ ॥ वे सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंके परकोटेकी भाँति संरक्षक, आपत्तिमें अभय देनेवाले तथा उनके शत्रुओंका संहार करनेवाले हैं। पुरुषसिंह माधव अपने पिता वसुदेवजीको द्वारकाकी सेनाके आधिपत्यपर स्थापित करके धर्मराजके लिये नाना प्रकारके धन-रत्नोंकी भेंट ले विशाल सेनाके साथ वहाँ आये थे ॥ १२-१३ ॥ तं धनौघमपर्यन्तं रत्नसागरमक्षयम् । नादयन् रथघोषेण प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥ १४ ॥ उस धनराशिकी कहीं सीमा नहीं थी, मानो रत्नोंका अक्षय महासागर हो। उसे लेकर रथोंकी आवाजसे समूची दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए वे उत्तम नगर इन्द्रप्रस्थमें प्रविष्ट हुए ॥ १४ ॥ पूर्णमापूरयंस्तेषां द्विषच्छोकावहोऽभवत् । असूर्यमिव सूर्येण निवातमिव वायुना । कृष्णेन समुपेतेन जहृषे भारतं पुरम् ॥ १५ ॥