महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1948, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंभारत! महात्मा केशवकी उस पुरीमें पूर्वदिशाकी ओर एक रमणीय पुष्करिणी शोभा पाती है, जिसका विस्तार सौ धनुष है।
महापुरीं द्वारवतीं पञ्चाशद्भिर्मुखैर्युताम् ।
प्रविशे द्वारकां रम्यां भासयन्तीं समन्ततः ॥
पचास दरवाजोंसे सुशोभित और सब ओरसे प्रकाशमान उस सुरम्य महापुरी द्वारकामें श्रीकृष्णने प्रवेश किया।
अप्रमेयां महोत्सेधां महागाधपरिप्लवाम् ।
प्रासादवरसम्पन्नां श्वेतप्रासादशालिनीम् ॥
वह कितनी बड़ी है, इसका कोई माप नहीं था। उसकी ऊँचाई भी बहुत अधिक थी। वह पुरी चारों ओर अत्यन्त अगाध जलराशिसे घिरी हुई थी। सुन्दर-सुन्दर महलोंसे भरी हुई द्वारका श्वेत अट्टालिकाओंसे सुशोभित होती थी।
तीक्ष्णयन्त्रशतघ्नीभिर्यन्त्रजालैः समन्विताम् ।
आयसैश्च महाचक्रैर्ददर्श द्वारकां पुरीम् ॥
तीखे यन्त्र, शतघ्नी, विभिन्न यन्त्रोंके समुदाय और लोहेके बने हुए बड़े-बड़े चक्रोंसे सुरक्षित द्वारकापुरीको भगवान्ने देखा।
अष्टौ रथसहस्राणि प्राकारे किङ्किणीकिनः ।
समुच्छ्रितपताकानि यथा देवपुरे तथा ॥
देवपुरीकी भाँति उसकी चहारदीवारीके निकट क्षुद्रघण्टिकाओंसे सुशोभित आठ हजार रथ शोभा पाते थे, जिनमें पताकाएँ फहराती रहती थीं।
अष्टयोजनविस्तीर्णामचलां द्वादशायताम् ।
द्विगुणोपनिवेशां च ददर्श द्वारकां पुरीम् ॥
द्वारकापुरीकी चौड़ाई आठ योजन है एवं लम्बाई बारह योजन है अर्थात् वह कुल ९६ योजन विस्तृत है। उसका उपनिवेश (समीपस्थ प्रदेश) उससे दुगुना अर्थात् १९२ योजन विस्तृत है। वह पुरी सब प्रकारसे अविचल है। श्रीकृष्णने उस पुरीको देखा।
अष्टमार्गां महाकक्ष्यां महाषोडशचत्वराम् ।
एवं मार्गपरिक्षिप्तां साक्षादुशनसा कृताम् ॥
उसमें जानेके लिये आठ मार्ग हैं, बड़ी-बड़ी ड्योढ़ियाँ हैं और सोलह बड़े-बड़े चौराहे हैं। इस प्रकार विभिन्न मार्गोंसे परिष्कृत द्वारकापुरी साक्षात् शुक्राचार्यकी नीतिके अनुसार बनायी गयी है।
व्यूहानामान्तरा मार्गाः सप्त चैव महापथाः ।
तत्र सा विहिता साक्षान्नगरी विश्वकर्मणा ॥
व्यूहोंके बीच-बीचमें मार्ग बने हैं, सात बड़ी-बड़ी सड़कें हैं। साक्षात् विश्वकर्माने इस द्वारकानगरीका निर्माण किया है।