भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1949

काञ्चनैर्मणिसोपानैरुपैता जनहर्षिणी।
गीतघोषमहाघोषैः प्रासादप्रवरैः शुभा॥
सोने और मणियोंकी सीढ़ियोंसे सुशोभित यह नगरी जन-जनको हर्ष प्रदान करनेवाली है। यहाँ गीतके मधुर स्वर तथा अन्य प्रकारके घोष गूँजते रहते हैं। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंके कारण वह पुरी परम सुन्दर प्रतीत होती है।
तस्मिन् पुरवरश्रेष्ठे दाशार्हाणां यशस्विनाम्।
वेश्मानि जहृषे दृष्ट्वा भगवान् पाकशासनः॥
नगरोंमें श्रेष्ठ उस द्वारकामें यशस्वी दशार्हवंशियोंके महल देखकर भगवान् पाकशासन इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई।
समुच्छ्रितपताकानि पारिप्लवनिभानि च।
काञ्चनाभानि भास्वन्ति मेरुकूटनिभानि च॥
उन महलोंके ऊपर ऊँची पताकाएँ फहरा रही थीं। वे मनोहर भवन मेघोंके समान जान पड़ते थे और सुवर्णमय होनेके कारण अत्यन्त प्रकाशमान थे। वे मेरुपर्वतके उत्तुंग शिखरोंके समान आकाशको चूम रहे थे।
सुधापाण्डरशृङ्गैश्च शातकुम्भपरिच्छदैः।
रत्नसानुगुहाशृङ्गैः सर्वरत्नविभूषितैः॥
उन गृहोंके शिखर चूनेसे लिपे-पुते और सफेद थे। उनकी छतें सुवर्णकी बनी हुई थीं। वहाँके शिखर, गुफा और शृंग—सभी रत्नमय थे। उस पुरीके भवन सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे।
सहर्म्यैः सार्धचन्द्रैश्च सनिर्यूहैः सपञ्जरैः।
सयन्त्रगृहसम्बाधैः सधातुभिरिवाद्रिभिः॥
(भगवान्ने देखा) वहाँ बड़े-बड़े महल, अटारी तथा छज्जे हैं और उन छज्जोंमें लटकते हुए पक्षियोंके पिंजड़े शोभा पाते हैं। कितने ही यन्त्रगृह वहाँके महलोंकी शोभा बढ़ाते हैं। अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटिल होनेके कारण द्वारकाके भवन विविध धातुओंसे विभूषित पर्वतोंके समान शोभा धारण करते हैं
मणिकाञ्चनभौमैश्च सुधामृष्टतलैस्तथा।
जाम्बूनदमयैर्द्वारैर्वैदूर्यविकृतार्गलैः॥
कुछ गृह तो मणिके बने हैं, कुछ सुवर्णसे तैयार किये गये हैं और कुछ पार्थिव पदार्थों (ईंट, पत्थर आदि) द्वारा निर्मित हुए हैं। उन सबके निम्नभाग चूनेसे स्वच्छ किये गये हैं। उनके दरवाजे (चौखट-किंवाड़े) जाम्बूनद सुवर्णके बने हैं और अर्गलाएँ (सिटकनियाँ) वैदूर्यमणिसे तैयार की गयी हैं।
सर्वर्तुसुखसंस्पर्शैर्महाधनपरिच्छदैः।
रम्यसानुगुहाशृङ्गैर्विचित्रैरिव पर्वतैः॥