भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1953

वासः स मित्रविन्दाया देवर्षिगणपूजितः ।। महिष्या वासुदेवस्य भूषणं सर्ववेश्मनाम् । भारत! वैदूर्यमणिके समान कान्तिमान् हरे रंगका महल, जिसे देखकर सब प्राणियोंको ‘श्रीहरि’ ही हैं, ऐसा अनुभव होता है, वह मित्रविन्दाका निवासस्थान है। उसकी देवगण भी सराहना करते हैं। भगवान् वासुदेवकी रानी मित्रविन्दाका यह भवन अन्य सब महलोंका आभूषणरूप है। यस्तु प्रासादमुख्योऽत्र विहितः सर्वशिल्पिभिः ।। अतीव रम्यः सोऽप्यत्र प्रहसन्निव तिष्ठति । सुदत्तायाः सुवासस्तु पूजितः सर्वशिल्पिभिः ।। महिष्या वासुदेवस्य केतुमानिति विश्रुतः । युधिष्ठिर! द्वारकामें जो दूसरा प्रमुख प्रासाद है, उसे सम्पूर्ण शिल्पियोंने मिलकर बनाया है। वह अत्यन्त रमणीय भवन हँसता-सा खड़ा है। सभी शिल्पी उसके निर्माण-कौशलकी सराहना करते हैं। उस प्रासादका नाम है केतुमान्। वह भगवान् वासुदेवकी महारानी सुदत्तादेवीका सुन्दर निवासस्थान है। प्रासादो विरजो नाम विरजस्को महात्मनः ।। उपस्थानगृहं तात केशवस्य महात्मनः । वहीं ‘विरज’ नामसे प्रसिद्ध एक प्रासाद है, जो निर्मल एवं रजोगुणके प्रभावसे शून्य है। वह परमात्मा श्रीकृष्णका उपस्थानगृह (खास रहनेका स्थान) है। यस्तु प्रासादमुख्योऽत्र यं त्वष्टा व्यदधात् स्वयम् ।। योजनायतविष्कम्भं सर्वरत्नमयं विभोः । इसी प्रकार वहाँ एक और भी प्रमुख प्रासाद है, जिसे स्वयं विश्वकर्माने बनाया है। उसकी लंबाई-चौड़ाई एक-एक योजनकी है। भगवान्का वह भवन सब प्रकारके रत्नोंद्वारा निर्मित हुआ है। तेषां तु विहिताः सर्वे रुक्मदण्डाः पताकिनः । सदने वासुदेवस्य मार्गसंजनना ध्वजाः ।। वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके सुन्दर सदनमें जो मार्गदर्शक ध्वज हैं, उन सबके दण्ड सुवर्णमय बनाये गये हैं। उन सबपर पताकाएँ फहराती रहती हैं। घण्टाजालानि तत्रैव सर्वेषां च निवेशने । आहृत्य यदुसिंहेन वैजयन्त्यचलो महान् ।। द्वारकापुरीमें सभीके घरोंमें घंटा लगाया गया है। यदुसिंह श्रीकृष्णने वहाँ लाकर वैजयन्ती पताकाओंसे युक्त पर्वत स्थापित किया है। हंसकूटस्य यच्छृङ्गमिन्रद्युम्नसरो महत् । षष्टितालसमुत्सेधमर्धयोजनविस्तृतम् ।।