भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1954

वहाँ हंसकूट पर्वतका शिखर है, जो साठ ताड़के बराबर ऊँचा और आधा योजन चौड़ा है। वहीं इन्द्रद्युम्नसरोवर भी है, जिसका विस्तार बहुत बड़ा है। सकिन्नरमहानादं तदप्यमिततेजसः । पश्यतां सर्वभूतानां त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ वहाँ सब भूतोंके देखते-देखते किन्नरोंके संगीतका महान् शब्द होता रहता है। वह भी अमिततेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णका ही लीलास्थल है। उसकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है। आदित्यपथगं यत् तन्मेरोः शिखरमुत्तमम् । जाम्बूनदमयं दिव्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ तदप्युत्पाट्य कृच्छ्रेण स्वं निवेशनमाहृतम् । भ्राजमानं पुरा तत्र सर्वौषधिविभूषितम् ॥ मेरुपर्वतका जो सूर्यके मार्गतक पहुँचा हुआ जाम्बूनदमय दिव्य और त्रिभुवनविख्यात उत्तम शिखर है, उसे उखाड़कर भगवान् श्रीकृष्ण कठिनाई उठाकर भी अपने महलमें ले आये हैं। सब प्रकारकी ओषधियोंसे अलंकृत वह मेरुशिखर द्वारकामें पूर्ववत् प्रकाशित है। यमिन्द्रभवनाच्छौरिराजहार परंतपः । पारिजातः स तत्रैव केशवेन निवेशितः ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण जिसे इन्द्रभवनसे हर ले आये थे, वह पारिजातवृक्ष भी उन्होंने द्वारकामें ही लगा रखा है। विहिता वासुदेवेन ब्रह्मस्थलमहाद्रुमाः ॥ शालतालाश्वकर्णाश्चशतशाखाश्च रोहिणाः । भल्लातककपित्थाश्च चन्द्रवृक्षाश्च चम्पकाः ॥ खर्जूराः केतकाश्चैव समन्तात् परिरोपिताः । भगवान् वासुदेवने ब्रह्मलोकके बड़े-बड़े वृक्षोंको भी लाकर द्वारकामें लगाया है। साल, ताल, अश्वकर्ण (कनेर), सौ शाखाओंसे सुशोभित वटवृक्ष, भल्लातक (भिलावा), कपित्थ (कैथ), चन्द्र (बड़ी इलायचीके) वृक्ष, चम्पा, खजूर और केतक (केवड़ा)—ये वृक्ष वहाँ सब ओर लगाये गये थे। पद्माकुलजलोपेता रक्ताः सौगन्धिकोत्पलाः ॥ मणिमौक्तिकवालूकाः पुष्करिण्यः सरांसि च । तासां परमकूलानि शोभयन्ति महाद्रुमाः ॥ द्वारकामें जो पुष्करिणियाँ और सरोवर हैं, वे कमलपुष्पोंसे सुशोभित स्वच्छ जलसे भरे हुए हैं। उनकी आभा लाल रंगकी है। उनमें सुगन्धयुक्त उत्पल खिले हुए हैं। उनमें स्थित बालूके कण मणियों और मोतियोंके चूर्ण-जैसे जान पड़ते हैं। वहाँ लगाये हुए बड़े-बड़े वृक्ष उन सरोवरोंके सुन्दर तटोंकी शोभा बढ़ाते हैं। ये च हैमवता वृक्षा ये च नन्दनजास्तथा ।