महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1959, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंफिर विशाल एवं कुछ लाल नेत्रोंवाले उन महायशस्वी महाबाहुने पहले मन-ही-मन गुरु सान्दीपनिके चरणोंका स्पर्श किया। तथाश्रुपरिपूर्णाक्षमानन्दगतचेतसम् ।। ववन्दे सह रामेण पितरं वासवानुजः । तत्पश्चात् भाई बलरामजीके साथ जाकर श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक पिताके चरणोंमें प्रणाम किया। उस समय पिता वसुदेवके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू भर आये और उनका हृदय आनन्दके समुद्रके निमग्न हो गया। रामकृष्णौ समाश्लिष्य सर्वे चान्धकवृष्णयः ।। अन्धक और वृष्णिवंशके सब लोगोंने बलराम और श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया। तं तु कृष्णः समाहृत्य रत्नौघधनसंचयम् ।। व्यभजत् सर्ववृष्णिभ्य आध्वमिति चाब्रवीत् । भगवान् श्रीकृष्णने रत्न और धनकी उस राशिको एकत्र करके अलग-अलग बाँट दिया और सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंसे कहा—‘यह सब आपलोग ग्रहण करें’। यथाश्रेष्ठमुपागम्य सात्वतान् यदुनन्दनः ।। सर्वेषां नाम जग्राह दाशार्हाणामधोक्षजः । ततः सर्वाणि वित्तानि सर्वरत्नमयानि च ।। व्यभजत् तानि तेभ्योऽथ सर्वेभ्यो यदुनन्दनः । तदनन्तर यदुनन्दन श्रीकृष्णने यदुवंशियोंमें जो श्रेष्ठ पुरुष थे, उन सबसे क्रमशः मिलकर सब यादवोंको नाम ले-लेकर बुलाया और उन सबको वे सभी रत्नमय धन पृथक्-पृथक् बाँट दिये। सा केशवमहामात्रैर्महेन्द्रप्रमुखैः सह ।। शुशुभे वृष्णिशार्दूलैः सिंहैरिव गिरेर्गुहा । जैसे पर्वतकी कन्दरा सिंहोंसे सुशोभित होती है, उसी प्रकार द्वारकापुरी उस समय भगवान् श्रीकृष्ण, देवराज इन्द्र तथा वृष्णिवंशी वीर पुरुषसिंहोंसे अत्यन्त शोभा पा रही थी। अथासनगतान् सर्वानुवाच विबुधाधिपः ।। शुभया हर्षयन् वाचा महेन्द्रस्तान् महायशाः । कुकुरान्धकमुख्यांश्च तं च राजानमाहुकम् ।। जब सभी यदुवंशी अपने-अपने आसनोंपर बैठ गये, उस समय देवताओंके स्वामी महायशस्वी महेन्द्र अपनी कल्याणमयी वाणीद्वारा कुकुर और अन्धक आदि यादवों तथा राजा उग्रसेनका हर्ष बढ़ाते हुए बोले।
इन्द्र उवाच
यदर्थं जन्म कृष्णस्य मानुषेषु महात्मनः ।