भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1958

ततस्तूर्यप्रणादश्च भेरीणां च महास्वनः ॥ सिंहनादश्च सञ्जज्ञे सर्वेषां पुरवासिनाम् । तदनन्तर तुरही और भेरियाँ बज उठीं। उनकी आवाज बहुत दूरतक फैल गयी। समस्त पुरवासी भी सिंहनाद कर उठे।

ततस्ते सर्वदाशार्हाः सर्वे च कुकुरान्धकाः ॥ प्रीयमाणाः समाजग्मुरालोक्य मधुसूदनम् । उस समय दाशार्ह, कुकुर और अन्धकवंशके सब लोग भगवान् मधुसूदनका दर्शन करके बड़े प्रसन्न हुए और सभी उनकी अगवानीके लिये आ गये।

वासुदेवं पुरस्कृत्य वेणुशंखरवैः सह ॥ उग्रसेनो ययौ राजा वासुदेवनिवेशनम् । राजा उग्रसेन भगवान् वासुदेवको आगे करके वेणुनाद और शंखध्वनिके साथ उनके महलतक उन्हें पहुँचानेके लिये गये।

आनन्दितुं पर्यचरन् स्वेषु वेश्मसु देवकी ॥ रोहिणी च यथोद्देशमाहुकस्य च याः स्त्रियः । देवकी, रोहिणी तथा उग्रसेनकी स्त्रियाँ अपने-अपने महलोंमें भगवान् श्रीकृष्णका अभिनन्दन करनेके लिये यथास्थान खड़ी थीं। पास आनेपर उन सबने उनका यथावत् सत्कार किया।

हता ब्रह्मद्विषः सर्वे जयन्त्यन्धकवृष्णयः ॥ एवमुक्तः स ह स्त्रीभिरीक्षितो मधुसूदनः । वे आशीर्वाद देती हुई इस प्रकार बोलीं—‘समस्त ब्राह्मणद्वेषी असुर मारे गये; अन्धक और वृष्णिवंशके वीर सर्वत्र विजयी हो रहे हैं।’ स्त्रियोंने भगवान् मधुसूदनसे ऐसा कहकर उनकी ओर देखा।

ततः शौरिः सुपर्णेन स्वं निवेशनमभ्ययात् ॥ चकाराथ यथोद्देशमीश्वरो मणिपर्वतम् । तदनन्तर श्रीकृष्ण गरुडके द्वारा ही अपने महलमें गये। वहाँ उन परमेश्वरने एक उपयुक्त स्थानमें मणिपर्वतको स्थापित कर दिया।

ततो धनानि रत्नानि सभायां मधुसूदनः ॥ निधाय पुण्डरीकाक्षः पितुर्दर्शनलालसः । इसके बाद कमलनयन मधुसूदनने सभाभवनमें धन और रत्नोंको रखकर मन-ही-मन पिताके दर्शनकी अभिलाषा की।

ततः सान्दीपनिं पूर्वमुपस्पृष्ट्वा महायशाः ॥ ववन्दे पृथुताम्राक्षः प्रीयमाणो महाभुजः ।