भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1957

विश्वकर्माद्वारा निर्मित पर्वतमाला ही उस विशाल भवनकी चहारदीवारी है। उसकी ऊँचाई सौ हाथकी है और वह चन्द्रमाके समान अपनी श्वेत छटा छिटकाती रहती है। तेन ते च महाशैलाः सरितश्च सरांसि च ।। परिक्षिप्तानि हर्म्यस्य वनान्युपवनानि च । पूर्वोक्त बड़े-बड़े पर्वत, सरिताएँ, सरोवर और प्रासादके समीपवर्ती वन-उपवन इस चहारदीवारीसे घिरे हुए हैं। एवं तच्छिल्पिवर्येण विहितं विश्वकर्मणा ।। प्रविशन्नेव गोविन्दो ददर्श परितो मुहुः । इस प्रकार शिल्पियोंमें श्रेष्ठ विश्वकर्माद्वारा बनाये हुए द्वारकानगरमें प्रवेश करते समय भगवान् श्रीकृष्णने बारंबार सब ओर दृष्टिपात किया। इन्द्रः सहामरैः श्रीमांस्तत्र तत्रावलोकयत् । देवताओंके साथ श्रीमान् इन्द्रने वहाँ द्वारकाको सब ओर दृष्टि दौड़ाते हुए देखा। एवमालोक्यांचक्रुर्द्वारकामृभास्त्रयः । उपेन्द्रबलदेवौ च वासवश्च महायशाः ।। इस प्रकार उपेन्द्र (श्रीकृष्ण), बलराम तथा महायशस्वी इन्द्र इन तीनों श्रेष्ठ महापुरुषोंने द्वारकापुरीकी शोभा देखी। ततस्तं पाण्डरं शौरिर्मूर्ध्नि तिष्ठन् गरुत्मतः ।। प्रीतः शङ्खमुपादध्मौ विद्धिषां रोमहर्षणम् । तदनन्तर गरुडके ऊपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक श्वेतवर्णवाले अपने उस पांचजन्य शंखको बजाया, जो शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला है। तस्य शङ्खस्य शब्देन सागरश्चुक्षुभे भृशम् ।। ररास च नभः सर्वं तच्चित्रमभवत् तदा । उस घोर शंखध्वनिसे समुद्र विक्षुब्ध हो उठा तथा सारा आकाशमण्डल गूँजने लगा। उस समय वहाँ यह अद्भुत बात हुई। पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं निशम्य कुकुरान्धकाः ।। विशोकाः समपद्यन्त गरुडस्य च दर्शनात् । पांचजन्यका गम्भीर घोष सुनकर और गरुडका दर्शन कर कुकुर और अन्धकवंशी यादव शोकरहित हो गये। शङ्खचक्रगदापाणिं सुपर्णशिरसि स्थितम् ।। दृष्ट्वा जहृषिरे कृष्णं भास्करोदयतेजसम् । भगवान् श्रीकृष्णके हाथोंमें शंख, चक्र और गदा आदि आयुध सुशोभित थे। वे गरुडके ऊपर बैठे थे। उनका तेज सूर्योदयके समान नूतन चेतना और उत्साह पैदा करनेवाला था। उन्हें देखकर सबको बड़ा हर्ष हुआ।