महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1956, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंनारियल, इंगुद (हिंगोट), उत्क्रोशक़वन, कदलीवन, जाति (चमेली), मल्लिका (मोतिया), पाटल, भल्लातक, कपित्थ, तैतभ, बन्धुजीव (दुपहरिया), प्रवाल, अशोक और काश्मरी (गाँभारी) आदि सब प्रकारके प्राचीन वृक्ष, प्रियंगुलता, बेर, जौ, स्पन्दन, चन्दन, शमी, बिल्व, पलाश, पाटला, बड़, पीपल, गूलर, द्विदल, पालाश, पारिभद्रक, इन्द्रवृक्ष, अर्जुनवृक्ष, अश्वत्थ, चिरिबिल्व, सौभंजन, भल्लट, अश्वपुष्प, सर्ज, ताम्बूललता, लवंग, सुपारी तथा नाना प्रकारके बाँस—ये सब द्वारकापुरीमें श्रीकृष्णभवनके चारों ओर लगाये हैं।
ये च नन्दनजा वृक्षा ये च चैत्ररथे वने ।
सर्वे ते यदुनाथेन समन्तात् परिरोपिताः ॥
नन्दनवनमें और चैत्ररथवनमें जो-जो वृक्ष होते हैं, वे सभी यदुपति भगवान् श्रीकृष्णने लाकर यहाँ सब ओर लगाये हैं।
कुमुदोत्पलपूर्णाश्च वाप्यः कूपाः सहस्रशः ।
समाकुलमहावाप्यः पीता लोहितवालुकाः ॥
भगवान् श्रीकृष्णके गृहोद्यानमें कुमुद और कमलोंसे भरी हुई कितनी ही छोटी बावलियाँ हैं। सहस्रों कुएँ बने हुए हैं। जलसे भरी हुई बड़ी-बड़ी वापिकाएँ भी तैयार करायी गयी हैं, जो देखनेमें पीत वर्णकी हैं और जिनकी बालुकाएँ लाल हैं।
तस्मिन् गृहवने नद्यः प्रसन्नसलिला हृदाः ।
फुल्लोत्पलजलोपेता नानाद्रुमसमाकुलाः ॥
उनके गृहोद्यानमें स्वच्छ जलसे भरे हुए कुण्डवाली कितनी ही कृत्रिम नदियाँ प्रवाहित होती रहती हैं, जो प्रफुल्ल उत्पलयुक्त जलसे परिपूर्ण हैं तथा जिन्हें दोनों ओरसे अनेक प्रकारके वृक्षोंने घेर रखा है।
तस्मिन् गृहवने नद्यो मणिशर्करवालुकाः ।
मत्तबर्हिणसङ्घाश्च कोकिलाश्च मदोद्धताः ॥
उस भवनके उद्यानकी सीमामें मणिमय कंकड़ और बालुकाओंसे सुशोभित नदियाँ निकाली गयी हैं, जहाँ मतवाले मयूरोंके झुंड विचरते हैं और मदोन्मत्त कोकिलाएँ कुहू-कुहू किया करती हैं।
बभूवुः परमोपेताः सर्वे जगतिपर्वताः ।
तत्रैव गजयूथानि तत्र गोमहिषास्तथा ॥
निवासाश्च कृतास्तत्र वराहमृगपक्षिणाम् ।
उस गृहोद्यानमें जगत्के सभी श्रेष्ठ पर्वत अंशतः संगृहीत हुए हैं। वहाँ हाथियोंके यूथ तथा गाय-भैंसोंके झुंड रहते हैं। वहीं जंगली सूअर, मृग और पक्षियोंके रहनेयोग्य निवासस्थान भी बनाये गये हैं।
विश्वकर्मकृतः शैलः प्राकारस्तस्य वेश्मनः ॥
व्यक्तं किष्कुशतोद्यामः सुधाकरसमप्रभः ।