भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1963, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1963

तौ तु पूर्वमुपक्रम्य रोहिणीमभिवाद्य च । अभ्यवादयतां देवौ देवकीं रामकेशवौ ॥ देवकीं सप्तदेवीनां यथाश्रेष्ठं च मातरः । उन दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णने उठकर पहले रोहिणीजीको प्रणाम किया। फिर देवकीजीकी तथा सात देवियोंमेंसे श्रेष्ठताके क्रमसे अन्य सभी माताओंकी चरणवन्दना की। ववन्दे सह रामेण भगवान् वासवानुजः ॥ अथासनवरं प्राप्य वृष्णिदारपुरस्कृता ॥ उभावङ्कगतौ चक्रे देवकी रामकेशवौ । बलरामसहित भगवान् उपेन्द्रने जब इस प्रकार मातृचरणोंमें प्रणाम किया, तब वृष्णिकुलकी महिलाओंमें अग्रणी माता देवकीजीने एक श्रेष्ठ आसनपर बैठकर बलराम और श्रीकृष्ण दोनोंको गोदमें ले लिया। सा ताभ्यामृषभाक्षाभ्यां पुत्राभ्यां शुशुभे तदा ॥ देवकी देवमातेव मित्रेण वरुणेन च । वृषभके सदृश विशाल नेत्रोंवाले उन दोनों पुत्रोंके साथ उस समय माता देवकीकी वैसी ही शोभा हुई, जैसी मित्र और वरुणके साथ देवमाता अदितिकी होती है। ततः प्राप्ता यशोदाया दुहिता वै क्षणेन हि ॥ जाज्वल्यमाना वपुषा प्रभयातीव भारत । इसी समय यशोदाजीकी पुत्री क्षणभरमें वहाँ आ पहुँची। भारत! उसके श्रीअंग दिव्य प्रभासे प्रज्वलित-से हो रहे थे। एकानङ्गेति यामाहुः कन्यां तां कामरूपिणीम् ॥ यत्कृते सगणं कंसं जघान पुरुषोत्तमः । उस कामरूपिणी कन्याका नाम था 'एकानंगा'। जिसके निमित्तसे पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने सेवकोंसहित कंसका वध किया था। ततः स भगवान् समस्तामुपाक्रम्य भामिनीम् ॥ मूर्ध्युपाघ्राय सव्येन परिजग्राह पाणिना । दक्षिणेन कराग्रेण परिजग्राह माधवः ॥ तब भगवान् बलरामने आगे बढ़कर उस मानिनी बहिनको बायें हाथसे पकड़ लिया और वात्सल्य-स्नेहसे उसका मस्तक सूँघा। तदनन्तर श्रीकृष्णने भी उस कन्याको दाहिने हाथसे पकड़ लिया। ददृशुस्तां सभामध्ये भगिनीं रामकृष्णयोः ॥ रुक्मपद्मशयां पद्मां श्रीमिवोत्तमनागयोः । लोगोंने उस सभामें बलराम और श्रीकृष्णकी इस बहिनको देखा; मानो दो श्रेष्ठ गजराजोंके बीचमें सुवर्णमय कमलके आसनपर विराजमान भगवती लक्ष्मी हों।

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