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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

तौ तु पूर्वमुपक्रम्य रोहिणीमभिवाद्य च । अभ्यवादयतां देवौ देवकीं रामकेशवौ ॥ देवकीं सप्तदेवीनां यथाश्रेष्ठं च मातरः । उन दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णने उठकर पहले रोहिणीजीको प्रणाम किया। फिर देवकीजीकी तथा सात देवियोंमेंसे श्रेष्ठताके क्रमसे अन्य सभी माताओंकी चरणवन्दना की। ववन्दे सह रामेण भगवान् वासवानुजः ॥ अथासनवरं प्राप्य वृष्णिदारपुरस्कृता ॥ उभावङ्कगतौ चक्रे देवकी रामकेशवौ । बलरामसहित भगवान् उपेन्द्रने जब इस प्रकार मातृचरणोंमें प्रणाम किया, तब वृष्णिकुलकी महिलाओंमें अग्रणी माता देवकीजीने एक श्रेष्ठ आसनपर बैठकर बलराम और श्रीकृष्ण दोनोंको गोदमें ले लिया। सा ताभ्यामृषभाक्षाभ्यां पुत्राभ्यां शुशुभे तदा ॥ देवकी देवमातेव मित्रेण वरुणेन च । वृषभके सदृश विशाल नेत्रोंवाले उन दोनों पुत्रोंके साथ उस समय माता देवकीकी वैसी ही शोभा हुई, जैसी मित्र और वरुणके साथ देवमाता अदितिकी होती है। ततः प्राप्ता यशोदाया दुहिता वै क्षणेन हि ॥ जाज्वल्यमाना वपुषा प्रभयातीव भारत । इसी समय यशोदाजीकी पुत्री क्षणभरमें वहाँ आ पहुँची। भारत! उसके श्रीअंग दिव्य प्रभासे प्रज्वलित-से हो रहे थे। एकानङ्गेति यामाहुः कन्यां तां कामरूपिणीम् ॥ यत्कृते सगणं कंसं जघान पुरुषोत्तमः । उस कामरूपिणी कन्याका नाम था 'एकानंगा'। जिसके निमित्तसे पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने सेवकोंसहित कंसका वध किया था। ततः स भगवान् समस्तामुपाक्रम्य भामिनीम् ॥ मूर्ध्युपाघ्राय सव्येन परिजग्राह पाणिना । दक्षिणेन कराग्रेण परिजग्राह माधवः ॥ तब भगवान् बलरामने आगे बढ़कर उस मानिनी बहिनको बायें हाथसे पकड़ लिया और वात्सल्य-स्नेहसे उसका मस्तक सूँघा। तदनन्तर श्रीकृष्णने भी उस कन्याको दाहिने हाथसे पकड़ लिया। ददृशुस्तां सभामध्ये भगिनीं रामकृष्णयोः ॥ रुक्मपद्मशयां पद्मां श्रीमिवोत्तमनागयोः । लोगोंने उस सभामें बलराम और श्रीकृष्णकी इस बहिनको देखा; मानो दो श्रेष्ठ गजराजोंके बीचमें सुवर्णमय कमलके आसनपर विराजमान भगवती लक्ष्मी हों।

अथाक्षतमहावृष्ट्या लाजपुष्पघृतैरपि ।। वृष्णयोऽवाकिरन् प्रीताः संकर्षणजनार्दनौ । तत्पश्चात् वृष्णिवंशी पुरुषोंने प्रसन्न होकर बलराम और श्रीकृष्णपर लाजा (खील), फूल और घीसे युक्त अक्षतकी वर्षा की। सबालाः सहवृद्धाश्च सजातिकुलबान्धवाः ।। उपोपविविशुः प्रीता वृष्णयो मधुसूदनम् । उस समय बालक, वृद्ध, ज्ञाति, कुल और बन्धु-बान्धवोंसहित समस्त वृष्णिवंशी प्रसन्नतापूर्वक भगवान् मधुसूदनके समीप बैठ गये। पूज्यमानो महाबाहुः पौराणां रतिवर्धनः ।। विवेश पुरुषव्याघ्रः स्ववेश्म मधुसूदनः । इसके बाद पुरवासियोंकी प्रीति बढ़ानेवाले पुरुषसिंह महाबाहु मधुसूदनने सबसे पूजित हो अपने महलमें प्रवेश किया। रुक्मिण्या सहितो देव्या प्रमुमोद सुखी सुखम् । अनन्तरं च सत्याया जाम्बवत्याश्च भारत । सर्वासां च यदुश्रेष्ठः सर्वकालविहारवान् ।। वहाँ सदा प्रसन्न रहनेवाले श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीके साथ बड़े सुखका अनुभव करने लगे। भारत! तत्पश्चात् सदा लीला-विहार करनेवाले यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण क्रमशः सत्यभामा तथा जाम्बवती आदि सभी देवियोंके निवास-स्थानोंमें गये। जगाम च हृषीकेशो रुक्मिण्याः स्वं निवेशनम् । फिर अन्तमें श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीके महलमें पधारे। एष तात महाबाहो विजयः शार्ङ्गधन्वनः ।। एतदर्थं च जन्माहुर्मानुषेषु महात्मनः । तात! महाबाहु युधिष्ठिर! शार्ङ्ग नामक धनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी यह विजयगाथा कही गयी है। इसीके लिये महात्मा श्रीकृष्णका मनुष्योंमें अवतार हुआ बताया जाता है।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा बाणासुरपर विजय और भीष्मके द्वारा श्रीकृष्ण-माहात्म्यका उपसंहार]

भीष्म उवाच

द्वारकायां ततः कृष्णः स्वदारेषु दिवानिशम् । सुखं लब्ध्वा महाराज प्रमुमोद महायशाः ॥

भीष्मजी कहते हैं—महाराज युधिष्ठिर! तदनन्तर महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्ण अपनी रानियोंके साथ दिन-रात सुखका अनुभव करते हुए द्वारकापुरीमें आनन्दपूर्वक रहने लगे।

पौत्रस्य कारणाच्चक्रे विबुधानां हितं तदा । सवासवैः सुरैः सर्वैर्दुष्करं भरतर्षभ ॥

भरतश्रेष्ठ! उन्होंने अपने पौत्र अनिरुद्धको निमित्त बनाकर देवताओंका जो हित-साधन किया, वह इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये अत्यन्त दुष्कर था।

बाणो नामाभवद् राजा बलेर्ज्येष्ठसुतो बली । वीर्यवान् भरतश्रेष्ठ स च बाहुसहस्रवान् ॥

भरतकुलभूषण! बाण नामक एक राजा हुआ था, जो बलिका ज्येष्ठ पुत्र था। वह महान् बलवान् और पराक्रमी होनेके साथ ही सहस्र भुजाओंसे सुशोभित था।

ततश्चक्रे तपस्तीव्रं सत्येन मनसा नृप । रुद्रमाराधयामास स च बाणः समा बहूः ॥

राजन्! बाणासुरने सच्चे मनसे बड़ी कठोर तपस्या की। उसने बहुत वर्षोंतक भगवान् शंकरकी आराधना की।

तस्मै बहुवरा दत्ताः शङ्करेण महात्मना । तस्माल्लब्ध्वा वरान् बाणो दुर्लभान् ससुरैरपि ॥ स शोणितपुरे राज्यं चकाराप्रतिमो बली ।

महात्मा शंकरने उसे अनेक वरदान दिये। भगवान् शंकरसे देवदुर्लभ वरदान पाकर बाणासुर अनुपम बलशाली हो गया और शोणितपुरमें राज्य करने लगा।

त्रासिताश्च सुराः सर्वे तेन बाणेन पाण्डव ॥ विजित्य विबुधान् सर्वान् सेन्द्रान् बाणः समा बहूः । अशासत महद् राज्यं कुबेर इव भारत ॥

भरतवंशी पाण्डुनन्दन! बाणासुरने सब देवताओंको आतंकित कर रखा था। उसने इन्द्र आदि सब देवताओंको जीतकर कुबेरकी भाँति दीर्घकालतक इस भूतलपर महान् राज्यका शासन किया।

ऋद्ध्यर्थं कुरुते यत्नं तस्य चैवोशना कविः ।

ज्ञानी विद्वान् शुक्राचार्य उसकी समृद्धि बढ़ानेके लिये प्रयत्न करते रहते थे।
ततो राजन्नुषा नाम बाणस्य दुहिता तथा ।।
रूपेणाप्रतिमा लोके मेनकायाः सुता यथा ।
राजन्! बाणासुरके एक पुत्री थी, जिसका नाम उषा था। संसारमें उसके रूपकी तुलना करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी। वह मेनका अप्सराकी पुत्री-सी प्रतीत होती थी।
अथोपायेन कौन्तेय अनिरुद्धो महाद्युतिः ।।
प्राद्युम्निस्तामुषां प्राप्य प्रच्छन्नः प्रमुमोद ह ।
कुन्तीनन्दन! महान् तेजस्वी प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्ध किसी उपायसे उषातक पहुँचकर छिपे रहकर उसके साथ आनन्दका उपभोग करने लगे।
अथ बाणो महातेजास्तदा तत्र युधिष्ठिर ।।
तं गुह्यनिलयं ज्ञात्वा प्राद्युम्निं सुतया सह ।
गृहीत्वा कारयामास वस्तुं कारागृहे बलात् ।।
युधिष्ठिर! महातेजस्वी बाणासुरने गुप्तरूपसे छिपे हुए प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धका अपनी पुत्रीके साथ रहना जान लिया और उन्हें अपनी पुत्रीसहित बलपूर्वक कारागारमें ठूँस देनेके लिये बंदी बना लिया।
सुकुमारः सुखार्होऽथ तदा दुःखमवाप सः ।
बाणेन खेदितो राजन्ननिरुद्धो मुमोह च ।।
राजन्! वे सुकुमार एवं सुख भोगनेके योग्य थे, तो भी उन्हें उस समय दुःख उठाना पड़ा। बाणासुरके द्वारा भाँति-भाँतिके कष्ट दिये जानेपर अनिरुद्ध मूर्च्छित हो गये।
एतस्मिन्नेव काले तु नारदो मुनिपुङ्गवः ।
द्वारकां प्राप्य कौन्तेय कृष्णं दृष्ट्वा वचोऽब्रवीत् ।।
कुन्तीकुमार! इसी समय मुनिप्रवर नारदजी द्वारकामें आकर श्रीकृष्णसे मिले और इस प्रकार बोले।

नारद उवाच

कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां कीर्तिवर्धन ।
त्वत्पौत्रो बाध्यमानोऽथ बाणेनामिततेजसा ।।
कृच्छ्रं प्राप्तोऽनिरुद्धो वै शेते कारागृहे सदा ।
**नारदजीने कहा—**महाबाहु श्रीकृष्ण! आप यदुवंशियोंकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। इस समय अमित-तेजस्वी बाणासुर आपके पौत्र अनिरुद्धको बहुत कष्ट दे रहा है। वे संकटमें पड़े हैं और सदा कारागारमें निवास कर रहे हैं।

भीष्म उवाच

एवमुक्त्वा सुरर्षिर्वै बाणस्याथ पुरं ययौ ।।

नारदस्य वचः श्रुत्वा ततो राजन् जनार्दनः । आहूय बलदेवं वै प्रद्युम्नं च महाद्युतिम् ॥ आरुरोह गरुत्मन्तं ताभ्यां सह जनार्दनः । भीष्मजी कहते हैं— राजन्! ऐसा कहकर देवर्षि नारद बाणासुरकी राजधानी शोणितपुरको चले गये। नारदजीकी बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजी तथा महातेजस्वी प्रद्युम्नको बुलाया और उन दोनोंके साथ वे गरुड़पर आरूढ़ हुए। ततः सुपर्णमारुह्य त्रयस्ते पुरुषर्षभाः ॥ जग्मुः क्रुद्धा महावीर्या बाणस्य नगरं प्रति । तदनन्तर वे तीनों महापराक्रमी पुरुषरत्न गरुड़पर आरूढ़ हो क्रोधमें भरकर बाणासुरके नगरकी ओर चल दिये। अथासाद्य महाराज तत्पुरीं ददृशुश्च ते ॥ ताम्रप्राकारसंवीतां रूप्यद्वारैश्च शोभिताम् । महाराज! वहाँ जाकर उन्होंने बाणासुरकी पुरीको देखा, जो ताँबेकी चहारदीवारीसे घिरी हुई थी। चाँदीके बने हुए दरवाजे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। हेमप्रासादसम्बाधां मुक्तामणिविचित्रताम् ॥ उद्यानवनसम्पन्नां नृत्तगीतैश्च शोभिताम् । वह पुरी सुवर्णमय प्रासादोंसे भरी हुई थी और मुक्तामणियोंसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी। उसमें स्थान-स्थानपर उद्यान और वन शोभा पा रहे थे। वह नगरी नृत्य और गीतोंसे सुशोभित थी। तोरणैः पक्षिभिः कीर्णां पुष्करिण्या च शोभिताम् ॥ तां पुरीं स्वर्गसंकाशां हृष्टपुष्टजनाकुलाम् । दृष्ट्वा मुदा युतां हैमां विस्मयं परमं ययुः ॥ वहाँ अनेक सुन्दर फाटक बने थे। सब ओर भाँति-भाँतिके पक्षी चहचहाते थे। कमलोंसे भरी हुई पुष्करिणी उस पुरीकी शोभा बढ़ाती थी। उसमें हृष्ट-पुष्ट स्त्री-पुरुष निवास करते थे और वह पुरी स्वर्गके समान मनोहर दिखायी देती थी। प्रसन्नतासे भरी हुई उस सुवर्णमयी नगरीको देखकर श्रीकृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न तीनोंको बड़ा विस्मय हुआ। तस्य बाणपुरस्यासन् द्वारस्था देवताः सदा । महेश्वरो गुहश्चैव भद्रकाली च पावकः ॥ एता वै देवता राजन् ररक्षुस्तां पुरीं सदा । बाणासुरकी राजधानीमें कितने ही देवता सदा द्वारपर बैठकर पहरा देते थे। राजन्! भगवान् शंकर, कार्तिकेय, भद्रकालीदेवी और अग्नि—ये देवता सदा उस पुरीकी रक्षा करते थे।

अथ कृष्णो बलाज्जित्वा द्वारपालान् युधिष्ठिर ॥

सुसंक्रुद्धो महातेजाः शङ्खचक्रगदाधरः । आससादोत्तरद्वारं शङ्करेणाभिपालितम् ॥ युधिष्ठिर! शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महातेजस्वी श्रीकृष्णने अत्यन्त कुपित हो पूर्वद्वारके रक्षकोंको बलपूर्वक जीतकर भगवान् शंकरके द्वारा सुरक्षित उत्तरद्वारपर आक्रमण किया।

तत्र तस्थौ महातेजाः शूलपाणिर्महेश्वरः । पिनाकं सशरं गृह्य बाणस्य हितकाम्यया ॥ ज्ञात्वा तमागतं कृष्णं व्यादितास्यमिवान्तकम् । महेश्वरो महाबाहुः कृष्णाभिमुखमाययौ ॥ वहाँ महान् तेजस्वी भगवान् महेश्वर हाथमें त्रिशूल लिये खड़े थे। जब उन्हें मालूम हुआ कि भगवान् श्रीकृष्ण मुँह बाये कालकी भाँति आ रहे हैं, तब वे महाबाहु महेश्वर बाणासुरके हित-साधनकी इच्छासे बाणसहित पिनाक नामक धनुष हाथमें लेकर श्रीकृष्णके सम्मुख आये।

ततस्तौ चक्रतुर्युद्धं वासुदेवमहेश्वरौ । तद् युद्धमभवद् घोरमचिन्त्यं रोमहर्षणम् ॥ तदनन्तर भगवान् वासुदेव और महेश्वर परस्पर युद्ध करने लगे। उनका वह युद्ध अचिन्त्य, रोमांचकारी तथा भयंकर था।

अन्योन्यं तौ ततक्षाते अन्योन्यजयकाङ्क्षिणौ । दिव्यास्त्राणि च तौ देवौ क्रुद्धौ मुमुचतुस्तदा ॥ वे दोनों देवता एक-दूसरेपर विजय पानेकी इच्छासे परस्पर प्रहार करने लगे। दोनों ही क्रोधमें भरकर एक-दूसरेपर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करते थे।

ततः कृष्णो रणं कृत्वा मुहूर्तं शूलपाणिना । विजित्य तं महादेवं ततो युद्धे जनार्दनः ॥ अन्यांश्च जित्वा द्वारस्थान् प्रविवेश पुरोत्तमम् । तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने शूलपाणि भगवान् शंकरके साथ दो घड़ीतक युद्ध करके महादेवजीको जीत लिया तथा द्वारपर खड़े हुए अन्य शिवगणोंको भी परास्त करके उस उत्तम नगरमें प्रवेश किया।

प्रविश्य बाणमासाद्य स तत्राथ जनार्दनः ॥ चक्रे युद्धं महाक्रुद्धस्तेन बाणेन पाण्डव । पाण्डुनन्दन! पुरीमें प्रवेश करके अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए श्रीजनार्दनने बाणासुरके पास पहुँचकर उसके साथ युद्ध छेड़ दिया।

बाणोऽपि सर्वशस्त्राणि शितानि भरतर्षभ ॥ सुसंक्रुद्धस्तदा युद्धे पातयामास केशवे ।

भरतश्रेष्ठ! बाणासुर भी क्रोधसे आगबबूला हो रहा था। उसने भी युद्धमें भगवान् केशवपर सभी तीखे-तीखे अस्त्र-शस्त्र चलाये।

पुनरुद्यम्य शस्त्राणां सहस्रं सर्वबाहुभिः ॥ मुमोच बाणः संक्रुद्धः कृष्णं प्रति रणाजिरे । फिर उसने उद्योगपूर्वक अपनी सभी भुजाओंसे उस समरांगणमें कुपित हो श्रीकृष्णपर सहस्रों शस्त्रोंका प्रहार किया।

ततः कृष्णस्तु सच्छिद्य तानि सर्वाणि भारत ।। कृत्वा मुहूर्तं बाणेन युद्धं राजन्नधोक्षजः । चक्रमुद्यम्य राजन् वै दिव्यं शस्त्रोत्तमं ततः ।। सहस्रबाहूंश्चिच्छेद बाणस्यामिततेजसः । भारत! परंतु श्रीकृष्णने वे सभी शस्त्र काट डाले। राजन्! तदनन्तर भगवान् अधोक्षजने दो घड़ीतक बाणासुरके साथ युद्ध करके अपना दिव्य उत्तम शस्त्र चक्र हाथमें उठाया और अमिततेजस्वी बाणासुरकी सहस्र भुजाओंको काट दिया।

ततो बाणो महाराज कृष्णेन भृशपीडितः ।। छिन्नबाहुः पपाताशु विशाख इव पादपः । महाराज! तब श्रीकृष्णद्वारा अत्यन्त पीड़ित होकर बाणासुर भुजाएँ कट जानेपर शाखाहीन वृक्षकी भाँति धरतीपर गिर पड़ा।

स पातयित्वा बालेयं बाणं कृष्णस्त्वरान्वितः ।।

प्राद्युम्निं मोक्षयामास क्षिप्तं कारागृहे तदा ।
इस प्रकार बलिपुत्र बाणासुरको रणभूमिमें गिराकर श्रीकृष्णने बड़ी उतावलीके साथ कैदमें पड़े हुए प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धको छुड़ा लिया।
मोक्षयित्वाथ गोविन्दः प्राद्युम्निं सह भार्यया ।
बाणस्य सर्वरत्नानि असंख्यानि जहार सः ॥
पत्नीसहित अनिरुद्धको छुड़ाकर भगवान् गोविन्दने बाणासुरके सभी प्रकारके असंख्य रत्न हर लिये।
गोधनान्यथ सर्वस्वं स बाणस्यालये बलात् ।
जहार च हृषीकेशो यदूनां कीर्तिवर्धनः ॥
ततः स सर्वरत्नानि चाहृत्य मधुसूदनः ।
क्षिप्रमारोपयाञ्चक्रे तत् सर्वं गरुडोपरि ॥
उसके घरमें जो भी गोधन अथवा अन्य किसी प्रकारके धन मौजूद थे, उन सबको भी यदुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले भगवान् हृषीकेशने हर लिया। फिर वे सब रत्न लेकर मधुसूदनने शीघ्रतापूर्वक गरुड़पर रख लिये।
त्वरयाथ स कौन्तेय बलदेवं महाबलम् ।
प्रद्युम्नं च महावीर्यमनिरुद्धं महाद्युतिम् ॥
उषां च सुन्दरीं राजन् भृत्यदासीगणैः सह ।
सर्वनेतान् समारोप्य रत्नानि विविधानि च ॥
कुन्तीनन्दन! तत्पश्चात् उन्होंने महाबली बलदेव, अमितपराक्रमी प्रद्युम्न, परम कान्तिमान् अनिरुद्ध तथा सेवकों और दासियोंसहित सुन्दरी उषा—इन सबको और नाना प्रकारके रत्नोंको भी गरुड़पर चढ़ाया।
मुदा युक्तो महातेजाः पीताम्बरधरो बली ।
दिव्याभरणचित्राङ्गः शङ्खचक्रगदासिभृत् ॥
आरुरोह गरुत्मन्तमुदयं भास्करो यथा ।
इसके बाद शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले, पीताम्बरधारी, महाबली एवं महातेजस्वी श्रीकृष्ण बड़ी प्रसन्नताके साथ स्वयं भी गरुड़पर आरूढ़ हुए, मानो भगवान् भास्कर उदयाचलपर आसीन हुए हों। उस समय भगवान्‌के श्रीअंग दिव्य आभूषणोंसे विचित्र शोभा धारण कर रहे थे।
अथारुह्य सुपर्णं स प्रययौ द्वारकां प्रति ॥
प्रविश्य स्वपुरं कृष्णो यादवैः सहितस्ततः ।
प्रमुमोद तदा राजन् स्वर्गस्थो वासवो यथा ॥
गरुड़पर आरूढ़ हो श्रीकृष्ण द्वारकाकी ओर चल दिये। राजन्! अपनी पुरी द्वारकामें पहुँचकर वे यदुवंशियोंके साथ ठीक वैसे ही आनन्दपूर्वक रहने लगे, जैसे इन्द्र स्वर्गलोकमें

देवताओंके साथ रहते हैं।
सूदिता मौरवाः पाशा निशुम्भनरकौ हतौ ।
कृतक्षेमः पुनः पन्थाः पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ॥
शौरिणा पृथिवीपालास्त्रासिता भरतर्षभ ।
धनुषश्च प्रणादेन पाञ्चजन्यस्वनेन च ॥
भरतश्रेष्ठ! भगवान् श्रीकृष्णने मुरदैत्यके पाश काट दिये, निशुम्भ और नरकासुरको मार डाला और प्राग्ज्योतिषपुरका मार्ग सब लोगोंके लिये निष्कण्टक बना दिया। इन्होंने अपने धनुषकी टंकार और पांचजन्य शंखके हुंकारसे समस्त भूपालोंको आतंकित कर दिया है।
मेघप्रख्यैरनीकैश्च दाक्षिणात्यैः सुसंवृतम् ।
रुक्मिणं त्रासयामास केशवो भरतर्षभ ॥
भरतकुलभूषण! भगवान् केशवने उस रुक्मीको भी भयभीत कर दिया, जिसके पास मेघोंकी घटाके समान असंख्य सेनाएँ हैं और जो दाक्षिणात्य सेवकोंसे सदा सुरक्षित रहता है।
ततः पर्जन्यघोषेण रथेनादित्यवर्चसा ।
उवाह महिषीं भोज्यामेष चक्रगदाधरः ॥
इन चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्ने रुक्मीको हराकर सूर्यके समान तेजस्वी तथा मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले रथके द्वारा भोजकुलोत्पन्ना रुक्मिणीका अपहरण किया, जो इस समय इनकी महारानीके पदपर प्रतिष्ठित हैं।
जारूथ्यामाहुतिः क्राथः शिशुपालश्च निर्जितः ।
वक्रश्च सह शैब्येन शतधन्वा च क्षत्रियः ॥
ये जारूथी नगरीमें वहाँके राजा आहुतिको तथा क्राथ एवं शिशुपालको भी परास्त कर चुके हैं। इन्होंने शैब्य, दन्तवक्र तथा शतधन्वा नामक क्षत्रियोंको भी हराया है।
इन्द्रद्युम्नो हतः क्रोधाद् यवनश्च कशेरुमान् ।
इन्होंने इन्द्रद्युम्न, कालयवन और कशेरुमान्का भी क्रोधपूर्वक वध किया है।
पर्वतानां सहस्रं च चक्रेण पुरुषोत्तमः ॥
विभिद्य पुण्डरीकाक्षो द्युमत्सेनमयोधयत् ।
कमलनयन पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने चक्रद्वारा सहस्रों पर्वतोंको विदीर्ण करके द्युमत्सेनके साथ युद्ध किया।
महेन्द्रशिखरे चैव निमेषान्तरचारिणौ ॥
जग्राह भरतश्रेष्ठ वरुणस्याभितश्चरौ ।
इरावत्यामुभौ चैतावग्निसूर्यसमौ बले ॥
गोपतिस्तालकेतुश्च निहतौ शार्ङ्गधन्वना ।

भरतश्रेष्ठ! जो बलमें अग्नि और सूर्यके समान थे और वरुणदेवताके उभय पार्श्वमें विचरण करते तथा जिनमें पलक मारते-मारते एक स्थानसे दूसरे स्थानमें पहुँच जानेकी शक्ति थी, वे गोपति और तालकेतु भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा महेन्द्र पर्वतके शिखरपर इरावती नदीके किनारे पकड़े और मारे गये।

अक्षप्रपतने चैव नेमिहंसपथेषु च ।। उभौ तावपि कृष्णेन स्वराष्ट्रे विनिपातितौ ।

अक्षप्रपतनके अन्तर्गत नेमिहंसपथ नामक स्थानमें, जो उनके अपने ही राज्यमें पड़ता था, उन दोनोंको भगवान् श्रीकृष्णने मारा था।

प्राग्ज्योतिषं पुरश्रेष्ठमसुरैर्बहुभिर्वृतम् । प्राप्य लोहितकूटानि कृष्णेन वरुणो जितः ।। अजेयो दुष्प्रधर्षश्च लोकपालो महाद्युतिः ।

बहुतेरे असुरोंसे घिरे हुए पुरश्रेष्ठ प्राग्ज्योतिषमें पहुँचकर वहाँकी पर्वतमालाके लाल शिखरोंपर जाकर श्रीकृष्णने उन लोकपाल वरुणदेवतापर विजय पायी, जो दूसरोंके लिये दुर्धर्ष, अजेय एवं अत्यन्त तेजस्वी हैं।

इन्द्रद्वीपो महेन्द्रेण गुप्तो मघवता स्वयम् ।। पारिजातो हृतः पार्थ केशवेन बलीयसा ।

पार्थ! यद्यपि इन्द्र पारिजातके लिये द्वीप (रक्षक) बने हुए थे, स्वयं ही उसकी रक्षा करते थे, तथापि महाबली केशवने उस वृक्षका अपहरण कर लिया।

पाण्ड्यं पौण्ड्रं च मात्स्यं च कलिङ्गं च जनार्दनः ।। जघान सहितान् सर्वानङ्गराजं च माधवः ।

लक्ष्मीपति जनार्दनने पाण्ड्य, पौण्ड्र, मत्स्य, कलिंग और अंग आदि देशोंके समस्त राजाओंको एक साथ पराजित किया।

एष चैकशतां हत्वा रथेन क्षत्रपुङ्गवान् ।। गान्धारीमवहत् कृष्णो महिषीं यादवर्षभः ।

यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने केवल एक रथपर चढ़कर अपने विरोधमें खड़े हुए सौ क्षत्रियनरेशोंको मौतके घाट उतारकर गान्धारराजकुमारी शिंशुमाको अपनी महारानी बनाया।

बभ्रोश्च प्रियमन्विच्छन्नेष चक्रगदाधरः ।। वेणुदारिहतां भार्यामुन्ममाथ युधिष्ठिर ।

युधिष्ठिर! चक्र और गदा धारण करनेवाले इन भगवान्ने बभ्रुका प्रिय करनेकी इच्छासे वेणुदारिके द्वारा अपहृत की हुई उनकी भार्याका उद्धार किया था।

पर्याप्तां पृथिवीं सर्वां साश्वां सरथकुञ्जराम् ।। वेणुदारिवशे युक्तां जिगाय मधुसूदनः ।

इतना ही नहीं; मधुसूदनने वेणुदारिके वशमें पड़ी हुई घोड़ों, हाथियों एवं रथोंसहित

सम्पूर्ण पृथ्वीको भी जीत लिया।

अवाप्य तपसा वीर्यं बलमोजश्च भारत ।।

त्रासिताः सगणाः सर्वे बाणेन विबुधाधिपाः ।

वज्राशनिगदापाशैस्त्रासयद्भिरनेकशः ।।

तस्य नासीद् रणे मृत्युर्देवैरपि सवासवैः ।

सोऽभिभूतश्च कृष्णेन निहतश्च महात्मना ।।

छित्त्वा बाहुसहस्रं तद् गोविन्देन महात्मना।

भारत! जिस बाणासुरने तपस्याद्वारा बल, वीर्य और ओज पाकर समस्त देवेश्वरोंको

उनके गणोंसहित भयभीत कर दिया था, इन्द्र आदि देवताओंके द्वारा बारंबार वज्र, अशनि,

गदा और पाशोंका प्रहार करके त्रास दिये जानेपर भी समरांगणमें जिसकी मृत्यु न हो सकी,

उसी दैत्यराज बाणासुरको महामना भगवान् गोविन्दने उसकी सहस्र भुजाएँ काटकर

पराजित एवं क्षत-विक्षत कर दिया।

एष पीठं महाबाहुः कंसं च मधुसूदनः ।।

पैठकं चातिलोमानं निजघान जनार्दनः ।

मधु दैत्यका विनाश करनेवाले इन महाबाहु जनार्दनने पीठ, कंस, पैठक और

अतिलोमा नामक असुरोंको भी मार दिया।

जम्भमैरावतं चैव विरूपं च महायशाः ।।

जघान भरतश्रेष्ठ शम्बरं चारिमर्दनम् ।

भरतश्रेष्ठ! इन महायशस्वी श्रीकृष्णने जम्भ, ऐरावत, विरूप और शत्रुमर्दन

शम्बरासुरको भी (अपनी विभूतियों-द्वारा) मरवा डाला।

एष भोगवतीं गत्वा वासुकिं भरतर्षभ ।।

निर्जित्य पुण्डरीकाक्षो रौहिणेयममोचयत् ।

भरतकुलभूषण! इन कमलनयन श्रीहरिने भोगवती-पुरीमें जाकर वासुकि नागको

हराकर रोहिणीनन्दनको* बन्धनसे छुड़ाया।

एवं बहूनि कर्माणि शिशुरेव जनार्दनः ।।

कृतवान् पुण्डरीकाक्षः संकर्षणसहायवान् ।

इस प्रकार संकर्षणसहित कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने बाल्यावस्थामें ही बहुत-से

अद्भुत कर्म किये थे।

एवमेषोऽसुराणां च सुराणां चापि सर्वशः ।।

भयाभयकरः कृष्णः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ।

ये ही देवताओं और असुरोंको सर्वथा अभय तथा भय देनेवाले हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ही

सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर हैं।

एवमेष महाबाहुः शास्ता सर्वदुरात्मनाम् ।।
कृत्वा देवार्थममितं स्वस्थानं प्रतिपत्स्यते ।
इस प्रकार सम्पूर्ण दुष्टोंका दमन करनेवाले ये महाबाहु भगवान् श्रीहरि अनन्त देवकार्य सिद्ध करके अपने परमधामको पधारेंगे।

एष भोगवतीं रम्यामृषिकान्तां महायशाः ।।
द्वारकामात्मसात् कृत्वा सागरं गमयिष्यति ।
ये महायशस्वी श्रीकृष्ण मुनिजनवांछित एवं भोगोंसे सम्पन्न रमणीय द्वारकापुरीको आत्मसात् करके समुद्रमें विलीन कर देंगे।

बहुपुण्यवतीं रम्यां चैत्ययूपवतीं शुभाम् ।।
द्वारकां वरुणावासं प्रवेश्यति सकाननाम् ।
ये चैत्य और यूपोंसे सम्पन्न, परम पुण्यवती, रमणीय एवं मंगलमयी द्वारकाको वन-उपवनोंसहित वरुणालयमें डुबा देंगे।

तां सूर्यसदनप्रख्यां मनोज्ञां शार्ङ्गधन्वना ।।
विश्लिष्टां वासुदेवेन सागरः प्लावयिष्यति ।
सूर्यलोकके समान कान्तिमती एवं मनोरम द्वारकापुरीको जब शार्ङ्गधन्वा वासुदेव त्याग देंगे, उस समय समुद्र इसे अपने भीतर ले लेगा।

सुरासुरमनुष्येषु नाभून्न भविता क्वचित् ।।
यस्तामध्यवसद् राजा अन्यत्र मधुसूदनात् ।
भगवान् मधुसूदनके सिवा देवताओं, असुरों और मनुष्योंमें ऐसा कोई राजा न हुआ और न होगा ही, जो द्वारकापुरीमें रहनेका संकल्प भी कर सके।

भ्राजमानास्तु शिशवो वृष्ण्यन्धकमहारथाः ।।
तज्जुष्टं प्रतिपत्स्यन्ते नाकपृष्ठं गतासवः ।
उस समय वृष्णि और अन्धकवंशके महारथी एवं उनके कान्तिमान् शिशु भी प्राण त्यागकर भगवत्सेवित परमधामको प्राप्त करेंगे।

एवमेव दशार्हाणां विधाय विधिना विधिम् ।।
विष्णुर्नारायणः सोमः सूर्यश्च सविता स्वयम् ।
इस प्रकार ये दशार्हवंशियोंके सब कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न करेंगे। ये स्वयं ही विष्णु, नारायण, सोम, सूर्य और सविता हैं।

अप्रमेयोऽनियोज्यश्च यत्रकामगमो वशी ।।
मोदते भगवान् भूतैर्बालः क्रीडनकैरिव ।
ये अप्रमेय हैं। इनपर किसीका नियन्त्रण नहीं चल सकता। ये इच्छानुसार चलनेवाले और सबको अपने वशमें रखनेवाले हैं। जैसे बालक खिलौनेसे खेलता है, उसी प्रकार ये भगवान् सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ आनन्दमयी क्रीड़ा करते हैं।

नैष गर्भत्वमापेदे न योन्यामवसत् प्रभुः ।।
आत्मनस्तेजसा कृष्णः सर्वेषां कुरुते गतिम् ।
ये प्रभु न तो किसीके गर्भमें आते हैं और न किसी योनिविशेषमें ही इनका आवास हुआ है अर्थात् ये अपने-आप ही प्रकट हो जाते हैं। श्रीकृष्ण अपने ही तेजसे सबकी सद्गति करते हैं।
यथा बुद्बुद उत्थाय तत्रैव प्रविलीयते ।।
चराचराणि भूतानि तथा नारायणे सदा ।
जैसे बुद्बुद पानीसे उठकर फिर उसीमें विलीन हो जाता है, उसी प्रकार समस्त चराचर भूत सदा भगवान् नारायणसे प्रकट होकर उन्हींमें विलीन हो जाते हैं।
न प्रमातुं महाबाहुः शक्यो भारत केशवः ।।
परं ह्यपरमेतस्माद् विश्वरूपान्न विद्यते ।
भारत! इन महाबाहु केशवकी कोई इतिश्री नहीं बतायी जा सकती। इन विश्वरूप परमेश्वरसे भिन्न पर और अपर कुछ भी नहीं है।
अयं तु पुरुषो बालः शिशुपालो न बुध्यते ।
सर्वत्र सर्वदा कृष्णं तस्मादेवं प्रभाषते ।। ३० ।।
यह शिशुपाल मूढ़बुद्धि पुरुष है, यह भगवान् श्रीकृष्णको सर्वत्र व्यापक तथा सर्वदा स्थिर नहीं जानता है, इसीलिये उनके सम्बन्धमें ऐसी बातें कहता है ।। ३० ।।
यो हि धर्मं विचिनुयादुत्कृष्टं मतिमान् नरः ।
स वै पश्येद् यथा धर्मं न तथा चेदिराडयम् ।। ३१ ।।
जो बुद्धिमान् मनुष्य उत्तम धर्मकी खोज करता है, वह धर्मके स्वरूपको जैसा समझता है, वैसा यह चेदिराज शिशुपाल नहीं समझता ।। ३१ ।।
सवृद्धबालेष्वथवा पार्थिवेषु महात्मसु ।
को नार्हं मन्यते कृष्णं को वाप्येनं न पूजयेत् ।।
अथवा वृद्धों और बालकोंसहित यहाँ बैठे हुए समस्त महात्मा राजाओंमें ऐसा कौन है, जो श्रीकृष्ण-को पूज्य न मानता हो या कौन है, जो इनकी पूजा न करता हो? ।। ३२ ।।
अथैनां दुष्कृतां पूजां शिशुपालो व्यवस्यति ।
दुष्कृतायां यथान्यायं तथायं कर्तुमर्हति ।। ३३ ।।
यदि शिशुपाल इस पूजाको अनुचित मानता है, तो अब उस अनुचित पूजाके विषयमें उसे जो उचित जान पड़े, वैसा करे ।। ३३ ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहरणपर्वणि भीष्मवाक्ये अष्टात्रिंशोऽध्यायः ।।
३८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अर्घाभिहरणपर्वमें भीष्मवाक्य नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३८ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७२८ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७६१ १/३ श्लोक हैं)


* जिनमें ऋतुधर्म (रजस्वलावस्था)-का प्रादुर्भाव न हुआ हो, उन्हें नग्निका कहते हैं।
* मूर्ति या शिवलिंगके आकारका कोई दुर्भेद्य गृह, जो पृथ्वीके भीतर गुफामें बनाया गया हो। शत्रुओंसे आत्मरक्षाकी दृष्टिसे नरकासुरने ऐसे निवासस्थानका निर्माण करा रखा था।
* रोहिणीके गद और सारण आदि कई पुत्र थे।

अध्याय (पृष्ठ 1977)

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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

सहदेवकी राजाओंको चुनौती तथा क्षुब्ध हुए शिशुपाल आदि नरेशोंका युद्धके लिये उद्यत होना

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा ततो भीष्मो विरराम महाबलः ।
व्याजहारोत्तरं तत्र सहदेवोऽर्थवद् वचः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसा कहकर महाबली भीष्म चुप हो गये। तत्पश्चात् माद्रीकुमार सहदेवने शिशुपालकी बातोंका मुँहतोड़ उत्तर देते हुए यह सार्थक बात कही— ॥ १ ॥

केशवं केशिहन्तारमप्रमेयपराक्रमम् ।
पूज्यमानं मया यो वः कृष्णं न सहते नृपाः ॥ २ ॥
सर्वेषां बलिनां मूर्ध्नि मयेदं निहितं पदम् ।
एवमुक्ते मया सम्यगुत्तरं प्रब्रवीतु सः ॥ ३ ॥
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशयः ।
‘राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है ॥ २-३ १/२ ॥

मतिमन्तश्च ये केचिदाचार्यं पितरं गुरुम् ॥ ४ ॥
अर्च्यमर्चितमर्हार्हमनुजानन्तु ते नृपाः ।
‘जो बुद्धिमान् राजा हों वे मेरे द्वारा की हुई आचार्य, पिता, गुरु, पूजनीय तथा अर्घ्यनिवेदनके सर्वथा योग्य भगवान् श्रीकृष्णकी पूजाका हृदयसे अनुमोदन करें’ ॥ ४ १/२ ॥

ततो न व्याजहारैषां कश्चिद् बुद्धिमतां सताम् ॥ ५ ॥
मानिनां बलिनां राज्ञां मध्ये वै दर्शिते पदे ।
सहदेवने महामानी और बलवान् राजाओंके बीच खड़े होकर अपना पैर दिखाया था, तो भी जो बुद्धिमान् एवं श्रेष्ठ नरेश थे, उनमेंसे कोई कुछ न बोला ॥ ५ १/२ ॥

ततोऽपतत् पुष्पवृष्टिः सहदेवस्य मूर्धनि ॥ ६ ॥
अदृश्यरूपा वाचश्चाप्यब्रुवन् साधु साध्विति ।

उस समय सहदेवके मस्तकपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी और अदृश्यरूपसे खड़े हुए देवताओंने 'साधु', 'साधु' कहकर उनके सत्‌साहसकी प्रशंसा की॥ ६ १/२॥

आविध्यदजितं कृष्णं भविष्यद्भूतजल्पकः॥ ७॥
सर्वसंशयनिर्मोक्ता नारदः सर्वलोकवित्।
उवाचाखिलभूतानां मध्ये स्पष्टतरं वचः॥ ८॥
तदनन्तर कभी पराजित न होनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाके ज्ञाता, भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंकी बातें बतानेवाले, सब लोगोंके सभी संशयोंका निवारण करनेवाले तथा सम्पूर्ण लोकोंसे परिचित देवर्षि नारद समस्त उपस्थित प्राणियोंके बीच स्पष्ट शब्दोंमें बोले—॥ ७-८॥

कृष्णं कमलपत्राक्षं नार्चयिष्यन्ति ये नराः।
जीवन्मृतास्तु ते ज्ञेया न सम्भाष्याः कदाचन॥ ९॥
'जो मानव कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा नहीं करेंगे, वे जीते-जी ही मृतक-तुल्य समझे जायँगे। ऐसे लोगोंसे कभी बातचीत नहीं करनी चाहिये'॥ ९॥

वैशम्पायन उवाच

पूजयित्वा च पूजार्हान् ब्रह्मक्षत्रविशेषवित्।
सहदेवो नृणां देवः समापद्यत कर्म तत्॥ १०॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वहाँ आये हुए ब्राह्मणों और क्षत्रियोंमें विशिष्ट व्यक्तियोंको पहचानने-वाले नरदेव सहदेवने क्रमशः पूज्य व्यक्तियोंकी पूजा करके वह अर्घ्यनिवेदनका कार्य पूरा कर दिया॥ १०॥

तस्मिन्नभ्यर्चिते कृष्णे सुनीथः शत्रुकर्षणः।
अतिताम्रेक्षणः कोपादुवाच मनुजाधिपान्॥ ११॥
इस प्रकार श्रीकृष्णका पूजन सम्पन्न हो जानेपर शत्रुविजयी शिशुपालने क्रोधसे अत्यन्त लाल आँखें करके समस्त राजाओंसे कहा—॥ ११॥

स्थितः सेनापतिर्योऽहं मन्यध्वं किं तु साम्प्रतम्।
युधि तिष्ठाम संनह्य समेतान् वृष्णिपाण्डवान्॥ १२॥
'भूमिपालो! मैं सबका सेनापति बनकर खड़ा हूँ। अब तुमलोग किस चिन्तामें पड़े हो। आओ, हम सब लोग युद्धके लिये सुसज्जित हो पाण्डवों और यादवोंकी सम्मिलित सेनाका सामना करनेके लिये डट जायँ'॥ १२॥

इति सर्वान् समुत्साह्य राज्ञस्तांश्चेदिपुङ्गवः।
यज्ञोपघाताय ततः सोऽमन्त्रयत राजभिः॥ १३॥
तत्राहूता गताः सर्वे सुनीथप्रमुखा गणाः।
समदृश्यन्त संक्रुद्धा विवर्णवदनास्तथा॥ १४॥

इस प्रकार उन सब राजाओंको युद्धके लिये उत्साहित करके चेदिराजने युधिष्ठिरके यज्ञमें विघ्न डालनेके उद्देश्यसे राजाओंसे सलाह की। शिशुपालके इस प्रकार बुलानेपर उसके सेनापतित्वमें सुनीथ आदि कुछ प्रमुख नरेशगण चले आये। वे सब-के-सब अत्यन्त क्रोधसे भर रहे थे एवं उनके मुखकी कान्ति बदली हुई दिखायी देती थी ॥ १३-१४ ॥

युधिष्ठिराभिषेकं च वासुदेवस्य चार्हणम् ।
न स्याद् यथा तथा कार्यमेवं सर्वे तदाब्रुवन् ॥ १५ ॥

उन सबने यह कहा कि 'युधिष्ठिरके अभिषेक और श्रीकृष्णकी पूजाका कार्य सफल न हो, वैसा प्रयत्न करना चाहिये' ॥ १५ ॥

निष्कर्षात्रिश्शयात् सर्वे राजानः क्रोधमूर्च्छिताः ।
अब्रुवंस्तत्र राजानो निर्वेदादात्मनिश्चयात् ॥ १६ ॥

इस निर्णय एवं निष्कर्षपर पहुँचकर वे सभी नरेश क्रोधसे मोहित हो गये। सहदेवकी बातोंसे अपमानका अनुभव करके अपनी शक्तिकी प्रबलताका विश्वास करके राजाओंने उपर्युक्त बातें कही थीं ॥ १६ ॥

सुहृद्भिर्वार्यमाणानां तेषां हि वपुराबभौ ।
आमिषादपकृष्टानां सिंहानामिव गर्जताम् ॥ १७ ॥

अपने सगे-सम्बन्धियोंके मना करनेपर भी उनका क्रोधसे तमतमाता हुआ शरीर उन सिंहोंके समान सुशोभित हुआ, जो मांससे वंचित कर दिये जानेके कारण दहाड़ रहे हों।

तं बलौघमपर्यन्तं राजसागरमक्षयम् ।
कुर्वाणं समयं कृष्णो युद्धाय बुबुधे तदा ॥ १८ ॥

राजाओंका वह समुदाय अक्षय समुद्रकी भाँति उमड़ रहा था। उसका कहीं अन्त नहीं दिखायी देता था। सेनाएँ ही उसकी अपार जलराशि थीं। उसे इस प्रकार शपथ करते देख भगवान् श्रीकृष्णने यह समझ लिया कि अब ये नरेश युद्धके लिये तैयार हैं ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहरणपर्वणि राजमन्त्रणे
एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत अर्घाभिहरणपर्वमें राजाओंकी मन्त्रणाविषयक उन्तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥

(शिशुपालवधपर्व)

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(शिशुपालवधपर्व)

चत्वारिंंशोऽध्यायः

युधिष्ठिरकी चिन्ता और भीष्मजीका उन्हें सान्त्वना देना

वैशम्पायन उवाच

ततः सागरसंकाशं दृष्ट्वा नृपतिमण्डलम् ।
संवर्तवाताभिहतं भीमं क्षुब्धमिवार्णवम् ॥ १ ॥
रोषात् प्रचलितं सर्वमिदमाह युधिष्ठिरः ।
भीष्मं मतिमतां मुख्यं वृद्धं कुरुपितामहम् ।
बृहस्पतिं बृहत्तेजाः पुरुहूत इवारिहा ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर प्रलयकालीन महावायुके थपेड़ोंसे क्षुब्ध हुए भयंकर महासागरकी भाँति राजाओंके उस समुदायको क्रोधसे चंचल हुआ देख धर्मराज युधिष्ठिर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्मजीसे उसी प्रकार बोले, जैसे शत्रुहन्ता महातेजस्वी इन्द्र बृहस्पतिजीसे कोई बात पूछते हैं— ॥ १-२ ॥
असौ रोषात् प्रचलितो महान् नृपतिसागरः ।
अत्र यत् प्रतिपत्तव्यं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ३ ॥
'पितामह! यह देखिये, राजाओंका महासमुद्र रोषसे अत्यन्त चंचल हो उठा है। अब यहाँ इन सबको शान्त करनेका जो उचित उपाय जान पड़े, वह मुझे बताइये ॥ ३ ॥
यज्ञस्य च न विघ्नः स्यात् प्रजानां च हितं भवेत् ।
यथा सर्वत्र तत् सर्वं ब्रूहि मेऽद्य पितामह ॥ ४ ॥
'दादाजी! यज्ञमें विघ्न न पड़े और प्रजाओंका हित हो तथा जिस प्रकार सर्वत्र शान्ति भी बनी रहे, वह सब उपाय अब मुझे बतानेकी कृपा करें' ॥ ४ ॥
इत्युक्तवति धर्मज्ञे धर्मराजे युधिष्ठिरे ।
उवाचेदं वचो भीष्मस्ततः कुरुपितामहः ॥ ५ ॥
धर्मके ज्ञाता धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर कुरुकुलपितामह भीष्मजी इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥
मा भैस्त्वं कुरुशार्दूल श्वा सिंहं हन्तुमर्हति ।
शिवः पन्थाः सुनीतोऽत्र मया पूर्वतरं वृतः ॥ ६ ॥

‘कुरुवंशके वीर! तुम डरो मत, क्या कुत्ता कभी सिंहको मार सकता है? हमने कल्याणमय मार्ग पहले ही चुन लिया है (श्रीकृष्णका आश्रय ही वह मार्ग है जिसका मैंने वरण कर लिया है)॥ ६॥

प्रसुप्ते हि यथा सिंहे श्वानस्तस्मिन् समागताः।
भषेयुः सहिताः सर्वे तथेमे वसुधाधिपाः॥ ७॥
वृष्णिसिंहस्य सुप्तस्य तथामी प्रमुखे स्थिताः।
‘जैसे सिंहके सो जानेपर बहुत-से कुत्ते उसके निकट आकर एक साथ भूँकने लगते हैं, उसी प्रकार ये सामने खड़े हुए राजा भी तभीतक भूँक रहे हैं, जबतक वृष्णिवंशका सिंह सो रहा है॥ ७ १/२॥

भषन्ते तात संक्रुद्धाः श्वानः सिंहस्य संनिधौ॥ ८॥
न हि सम्बुध्यते यावत् सुप्तः सिंह इवाच्युतः।
तेन सिंहीकरोत्येतान् नृसिंहश्चेदिपुङ्गवः॥ ९॥
पार्थिवान् पार्थिवश्रेष्ठः शिशुपालोऽप्यचेतनः।
सर्वान् सर्वात्मना तात नेतुकामो यमक्षयम्॥ १०॥
‘क्रोधमें भरे हुए कुत्तोंके समान ये लोग सिंहके निकट तभीतक कोलाहल मचा रहे हैं, जबतक भगवान् श्रीकृष्ण सिंहकी तरह जाग नहीं उठते—इन्हें दण्ड देनेके लिये उद्यत नहीं हो जाते। राजाओंमें श्रेष्ठ चेदिकुलभूषण नृसिंह शिशुपाल भी अपनी विवेकशक्ति खो बैठा है, तभी इन सब नरेशोंको यमलोकमें भेज देनेकी इच्छासे कुत्तेसे सिंह बनानेकी कोशिश कर रहा है॥ ८—१०॥

नूनमेतत् समादातुं पुनरिच्छत्यधोक्षजः।
यदस्य शिशुपालस्य तेजस्तिष्ठति भारत॥ ११॥
‘भारत! अवश्य ही भगवान् श्रीकृष्ण इस शिशुपालके भीतर उनका जो तेज है, उसे पुनः समेट लेना चाहते हैं॥ ११॥

विप्लुता चास्य भद्रं ते बुद्धिर्बुद्धिमतां वर।
चेदिराजस्य कौन्तेय सर्वेषां च महीक्षिताम्॥ १२॥
‘बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! तुम्हारा कल्याण हो। अवश्य ही इस चेदिराज शिशुपालकी तथा इन समस्त भूपालोंकी बुद्धि मारी गयी है॥ १२॥

आदातुं च नरव्याघ्रो यं यमिच्छत्ययं तदा।
तस्य विप्लवते बुद्धिरेवं चेदिपतेर्यथा॥ १३॥
‘क्योंकि नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण जिस-जिसको अपनेमें विलीन कर लेना चाहते हैं, उस-उस मनुष्यकी बुद्धि इसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जैसे इस चेदिराज शिशुपालकी॥ १३॥

चतुर्विधानां भूतानां त्रिषु लोकेषु माधवः।
प्रभवश्चैव सर्वेषां निधनं च युधिष्ठिरः॥ १४॥

‘युधिष्ठिर! माधव श्रीकृष्ण तीनों लोकोंमें जो स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज और जरायुज—ये चार प्रकारके प्राणी हैं, उन सबकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं ।। १४ ।।

वैशम्पायन उवाच

इति तस्य वचः श्रुत्वा ततश्चेदिपतिर्नृपः ।
भीष्मं रूक्षाक्षरा वाचः श्रावयामास भारत ।। १५ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीष्मजीकी यह बात सुनकर चेदिराज शिशुपाल उनको बड़ी कठोर बातें सुनाने लगा ।। १५ ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि युधिष्ठिराश्वासने
चत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें युधिष्ठिरको आश्वासन नामक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४० ।।