भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1967

नारदस्य वचः श्रुत्वा ततो राजन् जनार्दनः । आहूय बलदेवं वै प्रद्युम्नं च महाद्युतिम् ॥ आरुरोह गरुत्मन्तं ताभ्यां सह जनार्दनः । भीष्मजी कहते हैं— राजन्! ऐसा कहकर देवर्षि नारद बाणासुरकी राजधानी शोणितपुरको चले गये। नारदजीकी बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजी तथा महातेजस्वी प्रद्युम्नको बुलाया और उन दोनोंके साथ वे गरुड़पर आरूढ़ हुए। ततः सुपर्णमारुह्य त्रयस्ते पुरुषर्षभाः ॥ जग्मुः क्रुद्धा महावीर्या बाणस्य नगरं प्रति । तदनन्तर वे तीनों महापराक्रमी पुरुषरत्न गरुड़पर आरूढ़ हो क्रोधमें भरकर बाणासुरके नगरकी ओर चल दिये। अथासाद्य महाराज तत्पुरीं ददृशुश्च ते ॥ ताम्रप्राकारसंवीतां रूप्यद्वारैश्च शोभिताम् । महाराज! वहाँ जाकर उन्होंने बाणासुरकी पुरीको देखा, जो ताँबेकी चहारदीवारीसे घिरी हुई थी। चाँदीके बने हुए दरवाजे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। हेमप्रासादसम्बाधां मुक्तामणिविचित्रताम् ॥ उद्यानवनसम्पन्नां नृत्तगीतैश्च शोभिताम् । वह पुरी सुवर्णमय प्रासादोंसे भरी हुई थी और मुक्तामणियोंसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी। उसमें स्थान-स्थानपर उद्यान और वन शोभा पा रहे थे। वह नगरी नृत्य और गीतोंसे सुशोभित थी। तोरणैः पक्षिभिः कीर्णां पुष्करिण्या च शोभिताम् ॥ तां पुरीं स्वर्गसंकाशां हृष्टपुष्टजनाकुलाम् । दृष्ट्वा मुदा युतां हैमां विस्मयं परमं ययुः ॥ वहाँ अनेक सुन्दर फाटक बने थे। सब ओर भाँति-भाँतिके पक्षी चहचहाते थे। कमलोंसे भरी हुई पुष्करिणी उस पुरीकी शोभा बढ़ाती थी। उसमें हृष्ट-पुष्ट स्त्री-पुरुष निवास करते थे और वह पुरी स्वर्गके समान मनोहर दिखायी देती थी। प्रसन्नतासे भरी हुई उस सुवर्णमयी नगरीको देखकर श्रीकृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न तीनोंको बड़ा विस्मय हुआ। तस्य बाणपुरस्यासन् द्वारस्था देवताः सदा । महेश्वरो गुहश्चैव भद्रकाली च पावकः ॥ एता वै देवता राजन् ररक्षुस्तां पुरीं सदा । बाणासुरकी राजधानीमें कितने ही देवता सदा द्वारपर बैठकर पहरा देते थे। राजन्! भगवान् शंकर, कार्तिकेय, भद्रकालीदेवी और अग्नि—ये देवता सदा उस पुरीकी रक्षा करते थे।

अथ कृष्णो बलाज्जित्वा द्वारपालान् युधिष्ठिर ॥