महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानी विद्वान् शुक्राचार्य उसकी समृद्धि बढ़ानेके लिये प्रयत्न करते रहते थे।
ततो राजन्नुषा नाम बाणस्य दुहिता तथा ।।
रूपेणाप्रतिमा लोके मेनकायाः सुता यथा ।
राजन्! बाणासुरके एक पुत्री थी, जिसका नाम उषा था। संसारमें उसके रूपकी तुलना करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी। वह मेनका अप्सराकी पुत्री-सी प्रतीत होती थी।
अथोपायेन कौन्तेय अनिरुद्धो महाद्युतिः ।।
प्राद्युम्निस्तामुषां प्राप्य प्रच्छन्नः प्रमुमोद ह ।
कुन्तीनन्दन! महान् तेजस्वी प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्ध किसी उपायसे उषातक पहुँचकर छिपे रहकर उसके साथ आनन्दका उपभोग करने लगे।
अथ बाणो महातेजास्तदा तत्र युधिष्ठिर ।।
तं गुह्यनिलयं ज्ञात्वा प्राद्युम्निं सुतया सह ।
गृहीत्वा कारयामास वस्तुं कारागृहे बलात् ।।
युधिष्ठिर! महातेजस्वी बाणासुरने गुप्तरूपसे छिपे हुए प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धका अपनी पुत्रीके साथ रहना जान लिया और उन्हें अपनी पुत्रीसहित बलपूर्वक कारागारमें ठूँस देनेके लिये बंदी बना लिया।
सुकुमारः सुखार्होऽथ तदा दुःखमवाप सः ।
बाणेन खेदितो राजन्ननिरुद्धो मुमोह च ।।
राजन्! वे सुकुमार एवं सुख भोगनेके योग्य थे, तो भी उन्हें उस समय दुःख उठाना पड़ा। बाणासुरके द्वारा भाँति-भाँतिके कष्ट दिये जानेपर अनिरुद्ध मूर्च्छित हो गये।
एतस्मिन्नेव काले तु नारदो मुनिपुङ्गवः ।
द्वारकां प्राप्य कौन्तेय कृष्णं दृष्ट्वा वचोऽब्रवीत् ।।
कुन्तीकुमार! इसी समय मुनिप्रवर नारदजी द्वारकामें आकर श्रीकृष्णसे मिले और इस प्रकार बोले।
नारद उवाच
कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां कीर्तिवर्धन ।
त्वत्पौत्रो बाध्यमानोऽथ बाणेनामिततेजसा ।।
कृच्छ्रं प्राप्तोऽनिरुद्धो वै शेते कारागृहे सदा ।
**नारदजीने कहा—**महाबाहु श्रीकृष्ण! आप यदुवंशियोंकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। इस समय अमित-तेजस्वी बाणासुर आपके पौत्र अनिरुद्धको बहुत कष्ट दे रहा है। वे संकटमें पड़े हैं और सदा कारागारमें निवास कर रहे हैं।
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा सुरर्षिर्वै बाणस्याथ पुरं ययौ ।।