महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1965, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ें[भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा बाणासुरपर विजय और भीष्मके द्वारा श्रीकृष्ण-माहात्म्यका उपसंहार]
भीष्म उवाच
द्वारकायां ततः कृष्णः स्वदारेषु दिवानिशम् । सुखं लब्ध्वा महाराज प्रमुमोद महायशाः ॥
भीष्मजी कहते हैं—महाराज युधिष्ठिर! तदनन्तर महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्ण अपनी रानियोंके साथ दिन-रात सुखका अनुभव करते हुए द्वारकापुरीमें आनन्दपूर्वक रहने लगे।
पौत्रस्य कारणाच्चक्रे विबुधानां हितं तदा । सवासवैः सुरैः सर्वैर्दुष्करं भरतर्षभ ॥
भरतश्रेष्ठ! उन्होंने अपने पौत्र अनिरुद्धको निमित्त बनाकर देवताओंका जो हित-साधन किया, वह इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये अत्यन्त दुष्कर था।
बाणो नामाभवद् राजा बलेर्ज्येष्ठसुतो बली । वीर्यवान् भरतश्रेष्ठ स च बाहुसहस्रवान् ॥
भरतकुलभूषण! बाण नामक एक राजा हुआ था, जो बलिका ज्येष्ठ पुत्र था। वह महान् बलवान् और पराक्रमी होनेके साथ ही सहस्र भुजाओंसे सुशोभित था।
ततश्चक्रे तपस्तीव्रं सत्येन मनसा नृप । रुद्रमाराधयामास स च बाणः समा बहूः ॥
राजन्! बाणासुरने सच्चे मनसे बड़ी कठोर तपस्या की। उसने बहुत वर्षोंतक भगवान् शंकरकी आराधना की।
तस्मै बहुवरा दत्ताः शङ्करेण महात्मना । तस्माल्लब्ध्वा वरान् बाणो दुर्लभान् ससुरैरपि ॥ स शोणितपुरे राज्यं चकाराप्रतिमो बली ।
महात्मा शंकरने उसे अनेक वरदान दिये। भगवान् शंकरसे देवदुर्लभ वरदान पाकर बाणासुर अनुपम बलशाली हो गया और शोणितपुरमें राज्य करने लगा।
त्रासिताश्च सुराः सर्वे तेन बाणेन पाण्डव ॥ विजित्य विबुधान् सर्वान् सेन्द्रान् बाणः समा बहूः । अशासत महद् राज्यं कुबेर इव भारत ॥
भरतवंशी पाण्डुनन्दन! बाणासुरने सब देवताओंको आतंकित कर रखा था। उसने इन्द्र आदि सब देवताओंको जीतकर कुबेरकी भाँति दीर्घकालतक इस भूतलपर महान् राज्यका शासन किया।
ऋद्ध्यर्थं कुरुते यत्नं तस्य चैवोशना कविः ।