महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1968, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुसंक्रुद्धो महातेजाः शङ्खचक्रगदाधरः । आससादोत्तरद्वारं शङ्करेणाभिपालितम् ॥ युधिष्ठिर! शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महातेजस्वी श्रीकृष्णने अत्यन्त कुपित हो पूर्वद्वारके रक्षकोंको बलपूर्वक जीतकर भगवान् शंकरके द्वारा सुरक्षित उत्तरद्वारपर आक्रमण किया।
तत्र तस्थौ महातेजाः शूलपाणिर्महेश्वरः । पिनाकं सशरं गृह्य बाणस्य हितकाम्यया ॥ ज्ञात्वा तमागतं कृष्णं व्यादितास्यमिवान्तकम् । महेश्वरो महाबाहुः कृष्णाभिमुखमाययौ ॥ वहाँ महान् तेजस्वी भगवान् महेश्वर हाथमें त्रिशूल लिये खड़े थे। जब उन्हें मालूम हुआ कि भगवान् श्रीकृष्ण मुँह बाये कालकी भाँति आ रहे हैं, तब वे महाबाहु महेश्वर बाणासुरके हित-साधनकी इच्छासे बाणसहित पिनाक नामक धनुष हाथमें लेकर श्रीकृष्णके सम्मुख आये।
ततस्तौ चक्रतुर्युद्धं वासुदेवमहेश्वरौ । तद् युद्धमभवद् घोरमचिन्त्यं रोमहर्षणम् ॥ तदनन्तर भगवान् वासुदेव और महेश्वर परस्पर युद्ध करने लगे। उनका वह युद्ध अचिन्त्य, रोमांचकारी तथा भयंकर था।
अन्योन्यं तौ ततक्षाते अन्योन्यजयकाङ्क्षिणौ । दिव्यास्त्राणि च तौ देवौ क्रुद्धौ मुमुचतुस्तदा ॥ वे दोनों देवता एक-दूसरेपर विजय पानेकी इच्छासे परस्पर प्रहार करने लगे। दोनों ही क्रोधमें भरकर एक-दूसरेपर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करते थे।
ततः कृष्णो रणं कृत्वा मुहूर्तं शूलपाणिना । विजित्य तं महादेवं ततो युद्धे जनार्दनः ॥ अन्यांश्च जित्वा द्वारस्थान् प्रविवेश पुरोत्तमम् । तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने शूलपाणि भगवान् शंकरके साथ दो घड़ीतक युद्ध करके महादेवजीको जीत लिया तथा द्वारपर खड़े हुए अन्य शिवगणोंको भी परास्त करके उस उत्तम नगरमें प्रवेश किया।
प्रविश्य बाणमासाद्य स तत्राथ जनार्दनः ॥ चक्रे युद्धं महाक्रुद्धस्तेन बाणेन पाण्डव । पाण्डुनन्दन! पुरीमें प्रवेश करके अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए श्रीजनार्दनने बाणासुरके पास पहुँचकर उसके साथ युद्ध छेड़ दिया।
बाणोऽपि सर्वशस्त्राणि शितानि भरतर्षभ ॥ सुसंक्रुद्धस्तदा युद्धे पातयामास केशवे ।