महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1973, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंइतना ही नहीं; मधुसूदनने वेणुदारिके वशमें पड़ी हुई घोड़ों, हाथियों एवं रथोंसहित
सम्पूर्ण पृथ्वीको भी जीत लिया।
अवाप्य तपसा वीर्यं बलमोजश्च भारत ।।
त्रासिताः सगणाः सर्वे बाणेन विबुधाधिपाः ।
वज्राशनिगदापाशैस्त्रासयद्भिरनेकशः ।।
तस्य नासीद् रणे मृत्युर्देवैरपि सवासवैः ।
सोऽभिभूतश्च कृष्णेन निहतश्च महात्मना ।।
छित्त्वा बाहुसहस्रं तद् गोविन्देन महात्मना।
भारत! जिस बाणासुरने तपस्याद्वारा बल, वीर्य और ओज पाकर समस्त देवेश्वरोंको
उनके गणोंसहित भयभीत कर दिया था, इन्द्र आदि देवताओंके द्वारा बारंबार वज्र, अशनि,
गदा और पाशोंका प्रहार करके त्रास दिये जानेपर भी समरांगणमें जिसकी मृत्यु न हो सकी,
उसी दैत्यराज बाणासुरको महामना भगवान् गोविन्दने उसकी सहस्र भुजाएँ काटकर
पराजित एवं क्षत-विक्षत कर दिया।
एष पीठं महाबाहुः कंसं च मधुसूदनः ।।
पैठकं चातिलोमानं निजघान जनार्दनः ।
मधु दैत्यका विनाश करनेवाले इन महाबाहु जनार्दनने पीठ, कंस, पैठक और
अतिलोमा नामक असुरोंको भी मार दिया।
जम्भमैरावतं चैव विरूपं च महायशाः ।।
जघान भरतश्रेष्ठ शम्बरं चारिमर्दनम् ।
भरतश्रेष्ठ! इन महायशस्वी श्रीकृष्णने जम्भ, ऐरावत, विरूप और शत्रुमर्दन
शम्बरासुरको भी (अपनी विभूतियों-द्वारा) मरवा डाला।
एष भोगवतीं गत्वा वासुकिं भरतर्षभ ।।
निर्जित्य पुण्डरीकाक्षो रौहिणेयममोचयत् ।
भरतकुलभूषण! इन कमलनयन श्रीहरिने भोगवती-पुरीमें जाकर वासुकि नागको
हराकर रोहिणीनन्दनको* बन्धनसे छुड़ाया।
एवं बहूनि कर्माणि शिशुरेव जनार्दनः ।।
कृतवान् पुण्डरीकाक्षः संकर्षणसहायवान् ।
इस प्रकार संकर्षणसहित कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने बाल्यावस्थामें ही बहुत-से
अद्भुत कर्म किये थे।
एवमेषोऽसुराणां च सुराणां चापि सर्वशः ।।
भयाभयकरः कृष्णः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ।
ये ही देवताओं और असुरोंको सर्वथा अभय तथा भय देनेवाले हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ही
सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर हैं।