महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1972, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरतश्रेष्ठ! जो बलमें अग्नि और सूर्यके समान थे और वरुणदेवताके उभय पार्श्वमें विचरण करते तथा जिनमें पलक मारते-मारते एक स्थानसे दूसरे स्थानमें पहुँच जानेकी शक्ति थी, वे गोपति और तालकेतु भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा महेन्द्र पर्वतके शिखरपर इरावती नदीके किनारे पकड़े और मारे गये।
अक्षप्रपतने चैव नेमिहंसपथेषु च ।। उभौ तावपि कृष्णेन स्वराष्ट्रे विनिपातितौ ।
अक्षप्रपतनके अन्तर्गत नेमिहंसपथ नामक स्थानमें, जो उनके अपने ही राज्यमें पड़ता था, उन दोनोंको भगवान् श्रीकृष्णने मारा था।
प्राग्ज्योतिषं पुरश्रेष्ठमसुरैर्बहुभिर्वृतम् । प्राप्य लोहितकूटानि कृष्णेन वरुणो जितः ।। अजेयो दुष्प्रधर्षश्च लोकपालो महाद्युतिः ।
बहुतेरे असुरोंसे घिरे हुए पुरश्रेष्ठ प्राग्ज्योतिषमें पहुँचकर वहाँकी पर्वतमालाके लाल शिखरोंपर जाकर श्रीकृष्णने उन लोकपाल वरुणदेवतापर विजय पायी, जो दूसरोंके लिये दुर्धर्ष, अजेय एवं अत्यन्त तेजस्वी हैं।
इन्द्रद्वीपो महेन्द्रेण गुप्तो मघवता स्वयम् ।। पारिजातो हृतः पार्थ केशवेन बलीयसा ।
पार्थ! यद्यपि इन्द्र पारिजातके लिये द्वीप (रक्षक) बने हुए थे, स्वयं ही उसकी रक्षा करते थे, तथापि महाबली केशवने उस वृक्षका अपहरण कर लिया।
पाण्ड्यं पौण्ड्रं च मात्स्यं च कलिङ्गं च जनार्दनः ।। जघान सहितान् सर्वानङ्गराजं च माधवः ।
लक्ष्मीपति जनार्दनने पाण्ड्य, पौण्ड्र, मत्स्य, कलिंग और अंग आदि देशोंके समस्त राजाओंको एक साथ पराजित किया।
एष चैकशतां हत्वा रथेन क्षत्रपुङ्गवान् ।। गान्धारीमवहत् कृष्णो महिषीं यादवर्षभः ।
यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने केवल एक रथपर चढ़कर अपने विरोधमें खड़े हुए सौ क्षत्रियनरेशोंको मौतके घाट उतारकर गान्धारराजकुमारी शिंशुमाको अपनी महारानी बनाया।
बभ्रोश्च प्रियमन्विच्छन्नेष चक्रगदाधरः ।। वेणुदारिहतां भार्यामुन्ममाथ युधिष्ठिर ।
युधिष्ठिर! चक्र और गदा धारण करनेवाले इन भगवान्ने बभ्रुका प्रिय करनेकी इच्छासे वेणुदारिके द्वारा अपहृत की हुई उनकी भार्याका उद्धार किया था।
पर्याप्तां पृथिवीं सर्वां साश्वां सरथकुञ्जराम् ।। वेणुदारिवशे युक्तां जिगाय मधुसूदनः ।