महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1974, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवमेष महाबाहुः शास्ता सर्वदुरात्मनाम् ।।
कृत्वा देवार्थममितं स्वस्थानं प्रतिपत्स्यते ।
इस प्रकार सम्पूर्ण दुष्टोंका दमन करनेवाले ये महाबाहु भगवान् श्रीहरि अनन्त देवकार्य सिद्ध करके अपने परमधामको पधारेंगे।
एष भोगवतीं रम्यामृषिकान्तां महायशाः ।।
द्वारकामात्मसात् कृत्वा सागरं गमयिष्यति ।
ये महायशस्वी श्रीकृष्ण मुनिजनवांछित एवं भोगोंसे सम्पन्न रमणीय द्वारकापुरीको आत्मसात् करके समुद्रमें विलीन कर देंगे।
बहुपुण्यवतीं रम्यां चैत्ययूपवतीं शुभाम् ।।
द्वारकां वरुणावासं प्रवेश्यति सकाननाम् ।
ये चैत्य और यूपोंसे सम्पन्न, परम पुण्यवती, रमणीय एवं मंगलमयी द्वारकाको वन-उपवनोंसहित वरुणालयमें डुबा देंगे।
तां सूर्यसदनप्रख्यां मनोज्ञां शार्ङ्गधन्वना ।।
विश्लिष्टां वासुदेवेन सागरः प्लावयिष्यति ।
सूर्यलोकके समान कान्तिमती एवं मनोरम द्वारकापुरीको जब शार्ङ्गधन्वा वासुदेव त्याग देंगे, उस समय समुद्र इसे अपने भीतर ले लेगा।
सुरासुरमनुष्येषु नाभून्न भविता क्वचित् ।।
यस्तामध्यवसद् राजा अन्यत्र मधुसूदनात् ।
भगवान् मधुसूदनके सिवा देवताओं, असुरों और मनुष्योंमें ऐसा कोई राजा न हुआ और न होगा ही, जो द्वारकापुरीमें रहनेका संकल्प भी कर सके।
भ्राजमानास्तु शिशवो वृष्ण्यन्धकमहारथाः ।।
तज्जुष्टं प्रतिपत्स्यन्ते नाकपृष्ठं गतासवः ।
उस समय वृष्णि और अन्धकवंशके महारथी एवं उनके कान्तिमान् शिशु भी प्राण त्यागकर भगवत्सेवित परमधामको प्राप्त करेंगे।
एवमेव दशार्हाणां विधाय विधिना विधिम् ।।
विष्णुर्नारायणः सोमः सूर्यश्च सविता स्वयम् ।
इस प्रकार ये दशार्हवंशियोंके सब कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न करेंगे। ये स्वयं ही विष्णु, नारायण, सोम, सूर्य और सविता हैं।
अप्रमेयोऽनियोज्यश्च यत्रकामगमो वशी ।।
मोदते भगवान् भूतैर्बालः क्रीडनकैरिव ।
ये अप्रमेय हैं। इनपर किसीका नियन्त्रण नहीं चल सकता। ये इच्छानुसार चलनेवाले और सबको अपने वशमें रखनेवाले हैं। जैसे बालक खिलौनेसे खेलता है, उसी प्रकार ये भगवान् सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ आनन्दमयी क्रीड़ा करते हैं।