महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1975, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंनैष गर्भत्वमापेदे न योन्यामवसत् प्रभुः ।।
आत्मनस्तेजसा कृष्णः सर्वेषां कुरुते गतिम् ।
ये प्रभु न तो किसीके गर्भमें आते हैं और न किसी योनिविशेषमें ही इनका आवास हुआ है अर्थात् ये अपने-आप ही प्रकट हो जाते हैं। श्रीकृष्ण अपने ही तेजसे सबकी सद्गति करते हैं।
यथा बुद्बुद उत्थाय तत्रैव प्रविलीयते ।।
चराचराणि भूतानि तथा नारायणे सदा ।
जैसे बुद्बुद पानीसे उठकर फिर उसीमें विलीन हो जाता है, उसी प्रकार समस्त चराचर भूत सदा भगवान् नारायणसे प्रकट होकर उन्हींमें विलीन हो जाते हैं।
न प्रमातुं महाबाहुः शक्यो भारत केशवः ।।
परं ह्यपरमेतस्माद् विश्वरूपान्न विद्यते ।
भारत! इन महाबाहु केशवकी कोई इतिश्री नहीं बतायी जा सकती। इन विश्वरूप परमेश्वरसे भिन्न पर और अपर कुछ भी नहीं है।
अयं तु पुरुषो बालः शिशुपालो न बुध्यते ।
सर्वत्र सर्वदा कृष्णं तस्मादेवं प्रभाषते ।। ३० ।।
यह शिशुपाल मूढ़बुद्धि पुरुष है, यह भगवान् श्रीकृष्णको सर्वत्र व्यापक तथा सर्वदा स्थिर नहीं जानता है, इसीलिये उनके सम्बन्धमें ऐसी बातें कहता है ।। ३० ।।
यो हि धर्मं विचिनुयादुत्कृष्टं मतिमान् नरः ।
स वै पश्येद् यथा धर्मं न तथा चेदिराडयम् ।। ३१ ।।
जो बुद्धिमान् मनुष्य उत्तम धर्मकी खोज करता है, वह धर्मके स्वरूपको जैसा समझता है, वैसा यह चेदिराज शिशुपाल नहीं समझता ।। ३१ ।।
सवृद्धबालेष्वथवा पार्थिवेषु महात्मसु ।
को नार्हं मन्यते कृष्णं को वाप्येनं न पूजयेत् ।।
अथवा वृद्धों और बालकोंसहित यहाँ बैठे हुए समस्त महात्मा राजाओंमें ऐसा कौन है, जो श्रीकृष्ण-को पूज्य न मानता हो या कौन है, जो इनकी पूजा न करता हो? ।। ३२ ।।
अथैनां दुष्कृतां पूजां शिशुपालो व्यवस्यति ।
दुष्कृतायां यथान्यायं तथायं कर्तुमर्हति ।। ३३ ।।
यदि शिशुपाल इस पूजाको अनुचित मानता है, तो अब उस अनुचित पूजाके विषयमें उसे जो उचित जान पड़े, वैसा करे ।। ३३ ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहरणपर्वणि भीष्मवाक्ये अष्टात्रिंशोऽध्यायः ।।
३८ ।।