महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1983, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकचत्वारिंशोऽध्यायः
शिशुपालद्वारा भीष्मकी निन्दा
शिशुपाल उवाच
विभीषिकाभिर्बह्वीभिर्भीषयन् सर्वपार्थिवान् ।
न व्यपत्रपसे कस्माद् वृद्धः सन् कुलपांसन ॥ १ ॥
शिशुपाल बोला— कुलको कलंकित करनेवाले भीष्म! तुम अनेक प्रकारकी विभीषिकाओंद्वारा इन सब राजाओंको डरानेकी चेष्टा कर रहे हो। बड़े-बूढ़े होकर भी तुम्हें अपने इस कृत्यपर लज्जा क्यों नहीं आती? ॥ १ ॥
युक्तमेतत् तृतीयायां प्रकृतौ वर्तता त्वया ।
वक्तुं धर्मादपेतार्थं त्वं हि सर्वकुरूत्तमः ॥ २ ॥
तुम तीसरी प्रकृतिमें स्थित (नपुंसक) हो, अतः तुम्हारे लिये इस प्रकार धर्मविरुद्ध बातें कहना उचित ही है। फिर भी यह आश्चर्य है कि तुम समूचे कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष कहे जाते हो ॥ २ ॥
नावि नौरिव सम्बद्धा यथान्धो बान्धमन्वियात् ।
तथाभूता हि कौरव्या येषां भीष्म त्वमग्रणीः ॥ ३ ॥
भीष्म! जैसे एक नाव दूसरी नावमें बाँध दी जाय, एक अंधा दूसरे अंधेके पीछे चले; वही दशा इन सब कौरवोंकी है, जिन्हें तुम-जैसा अगुआ मिला है ॥ ३ ॥
पूतनाघातपूर्वाणि कर्माण्यस्य विशेषतः ।
त्वया कीर्तयतास्माकं भूयः प्रव्यथितं मनः ॥ ४ ॥
तुमने श्रीकृष्णके पूतना-वध आदि कर्मोंका जो विशेषरूपसे वर्णन किया है, उससे हमारे मनको पुनः बहुत बड़ी चोट पहुँची है ॥ ४ ॥
अवलिप्तस्य मूर्खस्य केशवं स्तोतुमिच्छतः ।
कथं भीष्म न ते जिह्वा शतधेयं विदीर्यते ॥ ५ ॥
भीष्म! तुम्हें अपने ज्ञानीपनका बड़ा घमंड है, परंतु तुम हो वास्तवमें बड़े मूर्ख! ओह! इस केशवकी स्तुति करनेकी इच्छा होते ही तुम्हारी जीभके सैकड़ों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते? ॥ ५ ॥
यत्र कुत्सा प्रयोक्तव्या भीष्म बालतरैर्नरैः ।
तमिमं ज्ञानवृद्धः सन् गोपं संस्तोतुमिच्छसि ॥ ६ ॥
भीष्म! जिसके प्रति मूर्ख-से-मूर्ख मनुष्योंको भी घृणा करनी चाहिये, उसी ग्वालियेकी तुम ज्ञानवृद्ध होकर भी स्तुति करना चाहते हो (यह आश्चर्य है!) ॥ ६ ॥
यद्यनेन हतो बाल्ये शकुनिश्चित्रमत्र किम् ।