भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1984

तौ वाश्ववृषभौ भीष्म यौ न युद्धविशारदौ ॥ ७ ॥ भीष्म! यदि इसने बचपनमें एक पक्षी (बकासुर)-को अथवा जो युद्धकी कलासे सर्वथा अनभिज्ञ थे, उन अश्व (केशी) और वृषभ (अरिष्टासुर) नामक पशुओंको मार डाला तो इसमें क्या आश्चर्यकी बात हो गयी? ॥ ७ ॥

चेतनारहितं काष्ठं यद्यनेन निपातितम् । पादेन शकटं भीष्म तत्र किं कृतमद्भुतम् ॥ ८ ॥ भीष्म! छकड़ा क्या है, चेतनाशून्य लकड़ियोंका ढेर ही तो, यदि इसने पैरसे उसको उलट ही दिया तो कौन अनोखी करामात कर डाली? ॥ ८ ॥

(अर्कप्रमाणौ तौ वृक्षौ यद्यनेन निपातितौ । नागश्च पातितोऽनेन तत्र को विस्मयः कृतः ॥) आकके पौधोंके बराबर दो अर्जुन वृक्षोंको यदि श्रीकृष्णने गिरा दिया अथवा एक नागको ही मार गिराया तो कौन बड़े आश्चर्यका काम कर डाला?।

वल्मीकमात्रः सप्ताहं यद्यनेन धृतोऽचलः । तदा गोवर्धनो भीष्म न तच्चित्रं मतं मम ॥ ९ ॥ भीष्म! यदि इसने गोवर्धनपर्वतको सात दिनतक अपने हाथपर उठाये रखा तो उसमें भी मुझे कोई आश्चर्यकी बात नहीं जान पड़ती; क्योंकि गोवर्धन तो दीमकोंकी खोदी हुई मिट्टीका ढेरमात्र है ॥ ९ ॥

भुक्तमेतेन बह्वन्नं क्रीडता नगमूर्धनि । इति ते भीष्म शृण्वानाः परे विस्मयमागताः ॥ १० ॥ भीष्म! कृष्णने गोवर्धनपर्वतके शिखरपर खेलते हुए अकेले ही बहुत-सा अन्न खा लिया, यह बात भी तुम्हारे मुँहसे सुनकर दूसरे लोगोंको ही आश्चर्य हुआ होगा (मुझे नहीं) ॥ १० ॥

यस्य चानेन धर्मज्ञ भुक्तमन्नं बलीयसः । स चानेन हतः कंस इत्येतन्न महाद्भुतम् ॥ ११ ॥ धर्मज्ञ भीष्म! जिस महाबली कंसका अन्न खाकर यह पला था, उसीको इसने मार डाला। यह भी इसके लिये कोई बड़ी अद्भुत बात नहीं है ॥ ११ ॥

न ते श्रुतमिदं भीष्म नूनं कथयतां सताम् । यद् वक्ष्ये त्वामधर्मज्ञं वाक्यं कुरुकुलाधम ॥ १२ ॥ कुरुकुलाधम भीष्म! तुम धर्मको बिल्कुल नहीं जानते। मैं तुमसे धर्मकी जो बात कहूँगा, वह तुमने संत-महात्माओंके मुखसे भी नहीं सुनी होगी ॥ १२ ॥

स्त्रीषु गोषु न शस्त्राणि पातयेद् ब्राह्मणेषु च । यस्य चान्नानि भुञ्जीत यत्र च स्यात् प्रतिश्रयः ॥ १३ ॥